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हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा शहीद-ए-विलायत हैं

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हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा शहीद-ए-विलायत हैं

आयतुल्लाह सैयद अहमद खातमी ने कहा,अमेरिका बातचीत का इच्छुक नहीं है बल्कि ईरान को झुकाना चाहता है। 47 साल से हम मर्ग बा अमेरिका अमेरिका मुर्दाबाद कहते आ रहे हैं और जब तक अमेरिका की शैतानीयत जारी है, यह नारा जनता की जुबान से मिटने वाला नहीं है।

मजलिस ए ख़बरगान के सदस्य आयतुल्लाह खातमी ने मसलाए इमाम ख़ुमैनी (रह) पाकदश्त में हज़रत फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शब-ए-शहादत (शहादत की रात) की मजलिस-ए-अज़ा को संबोधित करते हुए कहा, अगर आज की रात को "शब-ए-अशुराए फातिमा" कहा जाए तो मुबालगा नहीं होगा।

उन्होंने कहा,यह अमीरुलमोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम की ज़िंदगी की सख़्त रातों में से एक है। जंगों में सख़्त रातें आई हैं, शब-ए-लैलतुल-हरीर में पूरी रात जंग की, लेकिन कोई रात भी इस रात की तरह सख़्त नहीं थी। नहजुल बलाग़ा के ख़ुतबा नंबर 202 में फ़रमाते हैं कि "मेरा गम सदियों तक रहने वाला है और मेरी रातें बिना नींद की हैं।

आयतुल्लाह खातमी ने हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के मकाम (दर्जे) का ज़िक्र करते हुए कहा, इमाम ख़ुमैनी (रह) ने फ़रमाया था कि अगर हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा मर्द होतीं तो नबी होतीं। इमाम ज़माना अजलल्लाहु तआला फरजहुश शरीफ भी फ़रमाते हैं कि मैं दुख़्तर-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही व सल्लम की इक्तिदा करता हूं। इसका मतलब यह है कि हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा हर ज़माने के लिए कामिल और मुतलक नमूना हैं।

उन्होंने आयत "इन्ना आतैनाकल कौसर" के तहत कहा,हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा "शहीद-ए-विलायत" हैं। फख़्र-ए-राज़ी ने ख़ैर-ए-कसीर" (बहुत अच्छाई) को हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की औलाद की कसरत से ताबीर किया है।

इसके बावजूद कि बहुत से औलाद-ए-फातिमा सलामुल्लाह अलैहा को शहीद किया गया, आज भी दुनिया औलाद-ए-फातिमा सलामुल्लाह अलैहा से भरी हुई है। लेकिन कौसर का मफ़हूम (अर्थ) इससे बहुत बुलंद है, यह सिर्फ औलाद की तादाद नहीं बल्कि हज़रत सिद्दीक़ा ताहिरा सलामुल्लाह अलैहा की अठारह साल की बरकत वाली ज़िंदगी और उनके बाकी रहने वाले दुरूस (सबक) का मजमूआ है।

 

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