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ईद उल अज़हा अल्लाह की बंदगी और ज़रूरतमंदों की मदद का प्रतीक है

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ईद उल अज़हा अल्लाह की बंदगी और ज़रूरतमंदों की मदद का प्रतीक है

गुरगान के इमाम ए जुमआ ने कहा, ईद उल अज़हा और ईदुल-फित्र केवल खुशी के दिन नहीं हैं, बल्कि ये अल्लाह की बंदगी और ज़रूरतमंदों की मदद का प्रतीक हैं, और आज सभी शक्ति, ज्ञान और धन के धनी लोग जनता और ज़रूरतमंदों के प्रति ज़िम्मेदार हैं।

 आयतुल्लाह सैयद काज़िम नूर मुफीदी ने बकरीद के खुत्बे में इस्लामी त्योहारों के महत्व की ओर इशारा करते हुए कहा, ईदुल-फित्र और बकरीद इस्लामी दुनिया के सबसे बड़े त्योहार हैं, और दुनिया भर के मुसलमान ईद की नमाज़ अदा करके और क़ुरबानी का प्रबंध करके बंदगी और उम्मत-ए-इस्लामिया के एकता का दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

उन्होंने कहा,इस्लामी त्योहारों और आम त्योहारों के बीच मूलभूत अंतर यह है कि इनमें खुशी और उल्लास के साथ-साथ दो महत्वपूर्ण वास्तविकताएँ छिपी हैं। पहला, नमाज़ और बंदगी के माध्यम से इंसान और अल्लाह के बीच संबंध, और दूसरा, लोगों से संबंध और ज़रूरतमंदों की मदद करना।

गुरगान के जुमा इमाम ने कहा,ईद की नमाज़ मुसलमानों का अल्लाह की बारगाह में बंदगी का एलान है। आज लगभग दो अरब मुसलमान ईद-उल-फित्र और बकरीद की नमाज़ अदा करके यह एलान करते हैं कि वे केवल अल्लाह के बंदे हैं और दुनिया और साम्राज्यवादी ताकतों के सामने सिर नहीं झुकाते।

आयतुल्लाह नूर मुफीदी ने क़ुरबानी के फलसफ़े को समझाते हुए पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम की एक हदीस का हवाला दिया और कहा,क़ुर्बानी का फलसफ़ा यह है कि ज़रूरतमंद और वंचित लोग क़ुर्बानी के मांस से लाभान्वित हों, और समाज में कोई भूखा न रहे। वर्तमान परिस्थितियों में यह मुद्दा और भी महत्वपूर्ण हो गया है, और सभी सामर्थ्यवान लोगों को जनता और कमज़ोरों का ख्याल रखना चाहिए।

उन्होंने कहा, इस्लाम ऐसा धर्म है जो इबादत के साथ-साथ सामाजिक ज़िम्मेदारी पर विशेष ध्यान देता है, और मुसलमानों से कहता है कि वे समाज और लोगों की समस्याओं से लापरवाह न रहें।

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