मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी दौर-ए-हाज़िर की मुश्किलात, परेशानियों और बेचैनी की तरफ़ इशारा करते हुए मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने फ़रमाया,मुश्किलात, परेशानियों और बेचैनी की एक अहम वजह ख़ुदा से दूरी है। यही दूरी इंसान को डिप्रेशन का शिकार बना देती है और बाज़ औक़ात वह ख़ुदकुशी तक कर लेता है। ख़बरों के मुताबिक़ इस्राइली फ़ौजियों में ख़ुदकुशी के वाक़ियात बढ़ रहे हैं। इससे वाज़ेह होता है कि इंसान को हक़ीक़ी सुकून दौलत और ताक़त से नहीं बल्कि याद-ए-ख़ुदा से हासिल होता है।
शाही आसिफ़ी मस्जिद में 29 मई 2026 को नमाज़-ए-जुमा हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी साहब क़िब्ला, प्रिंसिपल हौज़ा-ए-इल्मिया ग़ुफ़रानमआब रहमतुल्लाह अलैह, लखनऊ की इक़्तिदा में अदा की गई।
मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने नमाज़ियों को तक़वा-ए-इलाही की नसीहत करते हुए फ़रमाया,परवरदिगार से दुआ है कि मुहम्मद व आले मुहम्मद अलैहिमुस्सलाम के सदक़े में हम सबको तौफ़ीक़ अता फ़रमाए कि हमारा रास्ता मुत्तक़ीन का रास्ता हो। हम उसी रास्ते पर चलें जिसकी हिदायत क़ुरआन-ए-मजीद और अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम ने फ़रमाई है।
नमाज़-ए-जुमा की अज़मत बयान करते हुए मौलाना ने फ़रमाया: “रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की हदीस-ए-शरीफ़ है कि ‘हमारी उम्मत के ग़रीब लोगों का हज नमाज़-ए-जुमा है।’ हज की सआदत जो कसीर माल ख़र्च करके हासिल होती है, वह नमाज़-ए-जुमा के ज़रिये भी नसीब हो जाती है।
इस साल ईद-ए-ग़दीर (18 ज़िलहिज्जा 1447 हिजरी) के जुमा के दिन वाक़े होने का ज़िक्र करते हुए मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम के ख़ुत्बे का यह फ़िक्रा नक़्ल किया: “अल्लाह तआला ने आज के दिन तुम मोमिनीन के लिए दो अज़ीम और बड़ी ईदें जमा कर दी हैं, जिनमें से एक दूसरी के बग़ैर मुकम्मल नहीं होती।
मौलाना ने फ़रमाया,इस साल अल्लाह तआला ने दो अज़ीम और करीम ईदों को एक ही दिन में जमा फ़रमा दिया है, जो एक-दूसरे के बग़ैर मुकम्मल नहीं हैं।
उन्होंने मज़ीद फ़रमाया: “जुमा और ग़दीर में चोली-दामन का साथ है, मगर अफ़सोस कि कुछ लोगों ने जुमा को इख़्तियार कर लिया और ग़दीर को छोड़ दिया, जबकि कुछ ने ग़दीर को अपनाया और जुमा से दूर हो गए।
अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम के ख़ुत्बे के हवाले से मौलाना ने फ़रमाया,विलायत और नमाज़ एक-दूसरे के लिए लाज़िम व मलज़ूम हैं। विलायत मरकज़ है और उस तक पहुँचने का रास्ता नमाज़-ए-जुमा है। नमाज़-ए-जुमा बेहद अहम इबादत है।
दौर-ए-हाज़िर की मुश्किलात, परेशानियों और बेचैनी की तरफ़ इशारा करते हुए मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने फ़रमाया,मुश्किलात, परेशानियों और बेचैनी की एक अहम वजह ख़ुदा से दूरी है। यही दूरी इंसान को डिप्रेशन का शिकार बना देती है और बाज़ औक़ात वह ख़ुदकुशी तक कर लेता है। ख़बरों के मुताबिक़ इस्राइली फ़ौजियों में ख़ुदकुशी के वाक़ियात बढ़ रहे हैं। इससे वाज़ेह होता है कि इंसान को हक़ीक़ी सुकून दौलत और ताक़त से नहीं बल्कि याद-ए-ख़ुदा से हासिल होता है।
उन्होंने ज़ुल्म को भी मौजूदा मुश्किलात और इज़्तिराब की एक बड़ी वजह क़रार देते हुए फ़रमाया: “मुशाहदा करें कि ज़ुल्म किस क़दर बढ़ चुका है। लेबनान की बस्तियाँ उजाड़ दी गई हैं और ग़ज़्ज़ा में हज़ारों बच्चों को क़त्ल कर दिया गया है। याद रखें कि ज़ुल्म की बुनियाद पर मुआशरे में इस्लाह नहीं हो सकती; हक़ीक़ी इस्लाह सिर्फ़ अद्ल व इंसाफ़ की बुनियाद पर मुमकिन है।”
अख़लाक़ी ज़वाल की तरफ़ इशारा करते हुए मौलाना ने फ़रमाया,झूठ, मक्कारी, ख़ियानत, हसद, चुग़लख़ोरी और माद्दापरस्ती आम ज़िंदगी का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जिसके बाइस इंसानियत शदीद परेशानी का शिकार है।
उन्होंने मज़ीद फ़रमाया,कोई इंसान किसी के झूठ को पकड़ पाए या न पकड़ पाए, लेकिन अल्लाह तआला से न झूठ पोशीदा है और न सच, और उसी की बारगाह में सबको जवाबदेह होना है।
ख़ानदानी निज़ाम की तबाही को भी मुआशरती बे-सुकूनी की एक अहम वजह क़रार देते हुए मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने फ़रमाया:
“आज तलाक़ की शरह में ख़तरनाक हद तक इज़ाफ़ा हो गया है। वालिदैन का एहतराम कमज़ोर पड़ गया है और औलाद नाफ़रमानी व गुमराही का शिकार हो रही है। घरों के बिखरने से इंसानी सुकून और इत्मिनान ख़त्म होता जा रहा है।
जहालत और गुमराही के मौज़ू पर गुफ़्तगू करते हुए उन्होंने फ़रमाया,आज की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि जाहिल ख़ुद को आलिम ज़ाहिर कर रहा है और गुमराह शख़्स ख़ुद को हिदायतयाफ़्ता समझ रहा है।
मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने वज़ाहत करते हुए फ़रमाया:ग़दीर के दिन खाना खिलाने की ताकीद वारिद हुई है, जबकि सोम और चालीसवें में खाना खिलाने का कोई हुक्म नहीं है। बल्कि रिवायत में आया है कि अहले-मुसीबत के घर खाना खाना अमल-ए-जाहिलियत है।
उन्होंने मज़ीद फ़रमाया,ख़ास तौर पर नए दौलतमंद लोग कहते हैं कि हम सोम और चालीसवें में खाना खिलाएँगे और इमाम अलैहिस्सलाम की हदीस की तावील करते हैं।
आख़िर में मौलाना ने कहा,कहाँ है तुम्हारी इंसानियत कि एक यतीम सिसकियाँ ले रहा हो और तुम उसी के दस्तरख़्वान पर बैठकर रोटियाँ तोड़ रहे हो।”