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ईद ए ग़दीर को तबईन ए विलायत का असरदार ज़रिया बनाया जाना चाहिए।आयतुल्लाह आलमुल होदा

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ईद ए ग़दीर को तबईन ए विलायत का असरदार ज़रिया बनाया जाना चाहिए।आयतुल्लाह आलमुल होदा

आयतुल्लाह सैयद अहमद आलमुलहोदा ने ईद-ए-ग़दीर ख़ुम और इमाम ख़ुमैनी की बरसी के एक साथ आने को बहुत अहम मौक़ा क़रार देते हुए ताकीद की है कि इस साल “अशरा-ए-विलायत” के प्रोग्राम ज़्यादा असरदार, बामक़सद और शायान-ए-शान अंदाज़ में मुनअक़िद किए जाएँ, ताकि ग़दीर के पैग़ाम-ए-विलायत और इंक़िलाब-ए-इस्लामी के अफ़कार को अवाम तक बेहतर तरीक़े से पहुँचाया जा सके।

,हौज़ा-ए-इल्मिया ख़ुरासान रिज़वी में रहबर-ए-मुअज़्ज़म के नुमाइंदे और इमामे जुमा मशहद आयतुल्लाह सैयद अहमद आलमुलहोदा ने कहा कि ईद-ए-ग़दीर सिर्फ़ एक मज़हबी त्योहार नहीं है, बल्कि तारीख़-ए-इस्लाम में इमामत और विलायत के तसल्सुल की अज़ीम अलामत है। लिहाज़ा इस ईद की ताज़ीम गहरे फ़िक्री, साक़ाफ़ती और अवामी अंदाज़ में होनी चाहिए।

मशहद मुक़द्दस में “जश्न-ए-ग़दीर” की तैयारियों से मुताल्लिक़ एक इजलास से ख़िताब करते हुए उन्होंने कहा कि मौजूदा समाजी और साक़ाफ़ती हालात को देखते हुए ज़रूरी है कि इस साल अशरा-ए-विलायत के प्रोग्राम पिछले सालों के मुक़ाबले में ज़्यादा मयारी, मुनज़्ज़म और असरअंदाज़ हों, ताकि नई नस्ल तक ग़दीर का असली पैग़ाम मोअस्सिर अंदाज़ में मुन्तक़िल किया जा सके।

उन्होंने ताकीद की कि अवामी इज्तिमाआत, मज़हबी महाफ़िल और साक़ाफ़ती सरगर्मियों के साथ-साथ ग़दीर के मआरिफ़ती, तर्बियती और फ़िक्री पहलुओं को भी वाज़ेह करना ज़रूरी है, क्योंकि सिर्फ़ जश्न मनाना काफ़ी नहीं बल्कि विलायत की हक़ीक़त को समझाना भी अहम ज़िम्मेदारी है।

उन्होंने ईद-ए-ग़दीर के अय्याम के साथ इमाम ख़ुमैनी की बरसी के तक़ारुन की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि यह मौक़ा बानी-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी के अफ़कार, इंक़िलाबी जद्दोजहद और निज़ाम-ए-विलायत-ए-फ़क़ीह के साथ उनके गहरे ताल्लुक़ को उजागर करने के लिए निहायत क़ीमती है।

रहबर-ए-मुअज़्ज़म के नुमाइंदे ने कहा कि इन प्रोग्रामों में इमाम ख़ुमैनी की दीनी, फ़िक्री और तारीखी ख़िदमात को भी अवाम के सामने पेश किया जाना चाहिए, ताकि नई नस्ल इंक़िलाब-ए-इस्लामी के बुनियादी अहदाफ़ और विलायत के नज़रिये से बेहतर तौर पर आशना हो सके।

उन्होंने जश्न-ए-ग़दीर को मुकम्मल तौर पर अवामी बनाने पर ज़ोर देते हुए कहा कि तमाम सरकारी इदारे, साक़ाफ़ती तंजीमें, मज़हबी मराकिज़ और समाजी हल्के बाहमी तआवुन के साथ इस अज़ीम ईद की तक़रीबात को कामयाब बनाने में अपना किरदार अदा करें।

आयतुल्लाह आलमुलहोदा ने मज़ीद कहा कि मवाकिब के क़ियाम, सुन्नत-ए-इतआम, समाजी ख़िदमात और साक़ाफ़ती प्रोग्रामों को पूरे सूबे में वसीअ पैमाने पर फ़रोग़ दिया जाए, ताकि मुआशरे के तमाम तबक़ात इस ईद की बरकतों से मुस्तफ़ीद हो सकें।

उन्होंने उलमा और हौज़ात-ए-इल्मिया के किरदार को निहायत अहम क़रार देते हुए कहा कि आज “जिहाद-ए-तबीयीन” के मैदान में रूहानियत की ज़िम्मेदारी पहले से ज़्यादा बढ़ गई है और ग़दीर, विलायत और इमाम ख़ुमैनी के अफ़कार की तरवीज में किसी क़िस्म की कोताही क़ाबिले-क़ुबूल नहीं होगी।

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