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अल्लाह की बंदगी में ही है इंसान की वास्तविक इज़्ज़त और सम्मान हैं

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अल्लाह की बंदगी में ही है इंसान की वास्तविक इज़्ज़त और सम्मान हैं

 हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन ईसा सैफ़ी ने कहा कि इंसान की असली इज़्ज़त, प्रतिष्ठा और महानता धन-दौलत या सामाजिक पद से नहीं, बल्कि अल्लाह की इबादत और आज्ञापालन से प्राप्त होती है।

 हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन ईसा सैफ़ी ने कहा कि इंसान की असली इज़्ज़त, प्रतिष्ठा और महानता धन दौलत या सामाजिक पद से नहीं, बल्कि अल्लाह की इबादत और आज्ञापालन से प्राप्त होती है।

उन्होंने सहीफ़ा-ए-सज्जादिया की 35वीं दुआ का हवाला देते हुए बताया कि इमाम सज्जाद (अ.स.) अल्लाह से दुआ करते हैं,ऐ अल्लाह! मुझे इस बात से सुरक्षित रख कि मैं किसी गरीब व्यक्ति को उसकी गरीबी के कारण तुच्छ समझूँ और किसी अमीर को केवल उसकी दौलत की वजह से श्रेष्ठ मानूँ।

उन्होंने कहा कि यह शिक्षा बताती है कि किसी इंसान का मूल्य उसके धन से नहीं, बल्कि उसके ईमान, तक़वा और अच्छे कर्मों से तय होता है।
ईसा सैफ़ी ने कहा कि आज बहुत से लोग सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के लिए धन और पद के पीछे भागते हैं, जबकि वास्तविक सम्मान केवल अल्लाह की बंदगी में है। जो व्यक्ति अल्लाह का आज्ञाकारी बनता है, वही सच्चे अर्थों में सम्मानित होता है।

उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) की एक हदीस का उल्लेख करते हुए कहा,जो व्यक्ति बिना कबीले के सम्मान, बिना धन के समृद्धि और बिना सत्ता के प्रभाव चाहता है, उसे चाहिए कि वह अल्लाह की नाफ़रमानी की बेइज़्ज़ती से निकलकर उसकी आज्ञाकारिता की इज़्ज़त में प्रवेश करे।

उन्होंने इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) के जीवन की एक घटना का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, हारून रशीद ने इमाम (अ.) को क़त्ल कराने के लिए कई लोगों को नियुक्त किया था, लेकिन जब वे इमाम के सामने पहुँचे तो उनकी महान आध्यात्मिक शख्सियत से इतने प्रभावित हुए कि उनके सामने विनम्र हो गए और रो पड़े।

उन्होंने कहा कि स्वयं हारून रशीद ने स्वीकार किया था कि इमाम को यह सम्मान अल्लाह ने दिया है। इससे स्पष्ट होता है कि यदि अल्लाह किसी को सम्मान देना चाहे, तो दुनिया की कोई ताक़त उसे अपमानित नहीं कर सकती।

अंत में उन्होंने कहा कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, यदि इंसान अल्लाह पर भरोसा रखे और उसकी बंदगी का रास्ता अपनाए, तो उसकी इज़्ज़त, गरिमा और आत्मिक शांति हमेशा सुरक्षित रहती है।

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