बगदाद के इमाम-ए-जुमआ आयतुल्लाह सैय्यद यासीन मूसवी ने कहा कि अरबईन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अत्याचार, उपनिवेशवाद और तानाशाही के विरुद्ध मुस्लिम उम्मत की एकता और जागरूकता का जीवंत प्रतीक है।
आयतुल्लाह सैय्यद यासीन मूसवी ने कहा कि अरबईन का विशाल समागम केवल एक धार्मिक इबादत नहीं, बल्कि एक ईश्वरीय आंदोलन है, जिसके धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम पूरी दुनिया के सामने इस्लाम के संदेश, इमाम हुसैन (अ.स.) के आंदोलन और अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध को उजागर करता हैं।
उन्होंने कहा कि अहलेबैत (अ.स.) की रिवायतों में ज़ियारत-ए-अरबईन और इमाम हुसैन (अ.) के रौज़े तक पैदल जाने की अत्यधिक फ़ज़ीलत बयान की गई है। यहाँ तक कि ज़ियारत-ए-अरबईन को मोमिन की पहचानों में शामिल किया गया है। उनके अनुसार, अरबईन का इतिहास केवल जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी और अहलेबैत (अ.स.) के कर्बला लौटने तक सीमित नहीं, बल्कि यह त्याग, बलिदान और सत्य के लिए संघर्ष का शाश्वत संदेश है।
आयतुल्लाह मूसवी ने कहा कि इतिहास गवाह है कि कर्बला का रौज़ा हमेशा अत्याचारी सरकारों के विरुद्ध जागरण और क्रांतिकारी आंदोलनों का केंद्र रहा है। उन्होंने 1977 में बाथ शासन द्वारा ज़ियारत-ए-अरबईन पर लगाए गए प्रतिबंध तथा ज़ायरीन की हत्या और गिरफ्तारियों का उल्लेख करते हुए कहा कि सद्दाम की सरकार जनता के संकल्प को तोड़ने में असफल रही।
उन्होंने आगे कहा कि 2003 के बाद भी अरबईन ने इराक की राजनीतिक दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अनुसार, लाखों ज़ायरीन की मौजूदगी और आयतुल्लाहिल उज़्मा सैय्यद अली सिस्तानी के मार्गदर्शन ने अमेरिका को इराक के संविधान के मुद्दे पर अपनी नीति बदलने के लिए मजबूर कर दिया, जिससे यह सिद्ध हुआ कि जनशक्ति के सामने बाहरी शक्तियाँ असहाय हो जाती हैं।
बगदाद के इमाम-ए-जुमआ ने कहा कि दुनिया आज अरबईन को इमाम हुसैन (अ.स.) के प्रति वफ़ादारी, अत्याचार और उपनिवेशवाद के विरोध तथा मुस्लिम उम्मत की एकता के प्रतीक के रूप में देखती है। उन्होंने शलमचे में ज़ायरीन पर हुए हमले की निंदा करते हुए कहा कि यह हमला शआइर-ए-हुसैनी को निशाना बनाने का प्रयास था, लेकिन ऐसी कार्रवाइयाँ अरबईन के वैश्विक संदेश को कमज़ोर नहीं कर सकतीं।
उन्होंने कुछ इराकी अधिकारियों के इस दावे को भी खारिज किया कि दाइश (आईएसआईएस) के विरुद्ध युद्ध में अमेरिका ने इराक की मदद की थी। उनके अनुसार, वास्तविक सहायता इस्लामी गणराज्य ईरान के सलाहकारों और शहीदों ने की, जबकि अमेरिका की नीतियाँ दाइश के पक्ष में थीं।
अंत में आयतुल्लाह मूसवी ने कहा कि जिस प्रकार सद्दाम शआइर-ए-हुसैनी को समाप्त करने में विफल रहा, उसी प्रकार अमेरिका भी कभी अरबईन मार्च को सीमित करने या उसे अपने उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने में सफल नहीं होगा। उन्होंने कहा कि इराक, ईरान, लेबनान, यमन और क्षेत्र के अन्य देशों की जनता एक साझा दुश्मन के मुकाबले में एकजुट है और भविष्य सत्य तथा प्रतिरोध की विजय का है।