अरबईन का पैदल सफर महज़ एक शारीरिक मशक़्क़त या बड़े इज्तिमा का नाम नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक सफर और आत्मिक उन्नति की व्यावहारिक निशानी है। इस सफर में ज़ाइर अपनी शारीरिक थकान को आध्यात्मिक रोशनी में बदल सकता है, बशर्ते वह नैतिक सिद्धांतों को अपनाए। एक सच्चा ज़ाइर वही है जो शिष्टाचार का पालन करे, गीबत से बचे, ईसार को अपनाए और अनुशासन का पाबंद हो। यही वे गुण हैं जो एक आम राहगीर को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुँचा देते हैं।
प्रोफेसर अली अहमद पनाही, जो हौज़ा और यूनिवर्सिटी रिसर्च इंस्टिट्यूट के एसोसिएट प्रोफेसर और वैज्ञानिक समिति के सदस्य हैं, ने हौज़ा न्यूज़ एजेंसी को दिए अपने बयान में कहा:
"अरबईन का सफर महज़ नजफ़ और कर्बला के बीच का एक भौगोलिक रास्ता नहीं है, बल्कि यह मानवता और हक़ (सत्य) के बीच एक आध्यात्मिक पुल है। इस रास्ते पर हर क़दम को आत्म-पहचान, आत्म-निर्माण और रूह (आत्मा) की पुनर्निर्मिति का ज़रिया बनाना चाहिए।"
इस आध्यात्मिक सफर में "अदब" (शिष्टाचार) की अहमियत
प्रोफेसर पनाही ने ज़ोर दिया कि इस महान जमावड़े में "अदब" वह कसौटी है जो एक आम राह चलने वाले और सच्चे ज़ाइर में फ़र्क पैदा करती है। अरबईन का रास्ता इमाम हुसैन (अ.स.) से जुड़ा एक पवित्र हरम है, इसलिए इसमें इस्लामी शिष्टाचार का पालन करना न सिर्फ एक क़ानूनी पाबंदी है, बल्कि एक धार्मिक ज़िम्मेदारी और ईमानी माँग है।
उन्होंने आगे कहा:
"ज़ाइर को चाहिए कि वह अपनी ज़बान को गीबत, फिज़ूल बातचीत और दुनियावी (संसारिक) बातों से बचाए, क्योंकि हर लफ़्ज़ इस आध्यात्मिक सफर के माहौल को प्रभावित करता है। अच्छा व्यवहार, संयमित वस्त्र, दूसरों के साथ विनम्रता और नर्मी, और नैतिक सीमाओं का ख़्याल रखना, यही वे गुण हैं जो कर्बला के धैर्य और स्थिरता की झलक पेश करते हैं।"
नैतिक परीक्षा के दो मूल सिद्धांत
प्रोफेसर पनाही ने इस सफर को नैतिक परीक्षा का मैदान करार देते हुए कहा कि थकान, भूख और भीड़ इंसान के धैर्य को परखती है, लेकिन यहीं मौका होता है जब धार्मिक नैतिकता की असली रूह (आत्मा) प्रकट होती है। उन्होंने दो बुनियादी सिद्धांतों पर बल दिया:
1. ईसार और दरगुज़र:
"जिस तरह रास्ते के ख़ादिम बेमिसाल ईसार के ज़रिए कर्बला की याद ताज़ा करते हैं, उसी तरह ज़ाइर को भी अपने ग़ुस्से पर क़ाबू पाकर, साथी यात्रियों के साथ मोहब्बत, नरमी और दरगुज़र का रवैया अपनाना चाहिए।"
2. अनुशासन और व्यवस्था:
"क़तार की पाबंदी, सार्वजनिक अधिकारों का सम्मान और गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार से बचना इस्लामी न्याय और अनुशासन की माँग है। बद-निज़ामी इस पवित्र आंदोलन की खूबसूरती और महानता को नुक़सान पहुँचाती है।"
समापन संदेश:
प्रोफेसर पनाही ने अपने बयान को इन शब्दों में समाप्त किया:
"आओ हम इस सफर में महज़ मुसाफ़िर न बनें, बल्कि मुहाजिर बनें—यानी अपनी निम्न आत्मा से ऊँची आध्यात्मिक मंज़िल की ओर हिजरत करें। ईश्वरीय वही और अहले-बैत (अ.स.) की नैतिक शिक्षाओं से रहनुमाई लेते हुए ऐसे क़दम बढ़ाएँ कि हर क़दम अल्लाह की रज़ा और सत्य की पहचान का इज़हार बन जाए। अरबईन इस सच्चाई को साबित करने का बेहतरीन मौका है कि धर्म सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि अदब, अख़लाक़, धार्मिक वफ़ादारी और उच्च मानवीय मूल्यों की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है।"