आयतुल्लाह सैयद अहमद ख़ातमी ने कहा कि ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ईरान के सामने आत्मसमर्पण करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। ईरानी राष्ट्र भी इसके जवाब में “हैहात मिन्नज़िल्लह (हम हरगिज़ ज़िल्लत स्वीकार नहीं करेंगे) को अपना रास्ता मानता है। इसलिए हम कहते हैं कि ट्रंप ईरान के आत्मसमर्पण की अपनी इच्छा को लेकर ही कब्र में जाएगा।
कशान में मस्जिद-ए-सादिक़िया में आयोजित माहे सफ़र के अंतिम दस दिनों के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आयतुल्लाह सैयद अहमद ख़ातमी ने कहा कि ईरान की शक्ति, दृढ़ता और सम्मान, हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.ल.) के स्पष्ट चमत्कारों की एक झलक है।
शूराए निगहबान के. सदस्य ने कहा कि इस्लामी क्रांति की महानता हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.ल.) की देन है। इस व्यवस्था की प्रतिष्ठा हज़रत फ़ातिमा (स.ल.) की प्रतिष्ठा से जुड़ी हुई है और अगर हम इमाम ख़ुमैनी (रह.) के मार्ग पर चलने वाले हैं तो यह भी हज़रत फ़ातिमा (स.ल.) की कोशिशों का परिणाम है।
मजलिस-ए-ख़ुनबरेगान के सदस्य ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) की सफलता के कारणों का उल्लेख करते हुए कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) का व्यवहार उनकी सफलता का सबसे महत्वपूर्ण कारण था।
आयतुल्लाह ख़ातमी ने कहा कि जिन लोगों ने हज़रत अली (अ.स.) को उनका उचित स्थान नहीं दिया, उन्होंने अवसर को बर्बाद किया। नहजुल बलाग़ा में हज़रत अली (अ.स.) के कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यदि उन लोगों ने मुझे अपना कार्य करने का अवसर दिया होता तो मैं बहुत-सी चीज़ों को बदल देता, लेकिन उन्होंने अवसर गँवा दिया।
आयतुल्लाह ख़ातमी ने कहा कि इमाम हसन मुजतबा (अ.स.) ने संकट को अवसर में बदल दिया। इमाम हसन (अ.स.) के लिए विद्रोह की परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं, क्योंकि उनकी सेना थकी हुई और बिखरी हुई थी।
शूराए निगहबान के फ़ुक़हा के सदस्य ने कहा कि कुछ लोग सुलह के मुद्दे पर क़ुरआन का गलत और साधनात्मक इस्तेमाल करते हैं, जबकि क़ुरआन में सुलह की चर्चा पारिवारिक विवादों के संदर्भ में है। इसलिए पारिवारिक विवादों में सुलह से संबंधित आयतों को युद्ध के संदर्भ में इस्तेमाल करना क़ुरआन का साधनात्मक उपयोग है।
आयतुल्लाह ख़ातमी ने ज़ोर देते हुए कहा कि अमेरिका कभी भी ईरान के साथ वास्तविक शांति नहीं चाहता, बल्कि वह ईरान को आत्मसमर्पण कराने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा है कि एकमात्र रास्ता ईरान का आत्मसमर्पण है, जबकि ईरानी राष्ट्र इसके जवाब में “हैहात मिन्नज़िल्लह” को अपना रास्ता मानता है। इसलिए हम कहते हैं कि ट्रंप ईरान के आत्मसमर्पण की अपनी इच्छा को लेकर ही कब्र में जाएगा।