नजफ़ अशरफ़ के इमामे जुमा हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सय्यद सदरुद्दीन क़ब्बांची ने इराक से अंतरराष्ट्रीय गठबंधन की सेनाओं की वापसी के सरकारी फ़ैसले को इराक की संप्रभुता की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम बताते हुए कहा है कि इस फ़ैसले पर हर हाल में अमल होना चाहिए।
उन्होंने नमाज़े जुमा के ख़ुत्बे में कहा कि 30 सितंबर को इराक से गठबंधन सेनाओं की मौजूदगी समाप्त करने का फ़ैसला पहले ही संसद में मंज़ूर हो चुका है, इसलिए इसके क्रियान्वयन में किसी देरी या पीछे हटने की गुंजाइश नहीं है। उन्होंने कहा कि इस मामले को हथियार डालने के मुद्दे से जोड़ना सही नहीं है, क्योंकि दोनों अलग-अलग विषय हैं।
सैयद क़ब्बानची ने हशदुश्शाबी के घायल जवानों के अधिकारों का भी समर्थन किया और कहा कि जिन लोगों ने देश की रक्षा में अपनी जान या शरीर का कोई अंग क़ुर्बान किया है, वे पेंशन के साथ-साथ विकलांगता भत्ते के भी हक़दार हैं। उन्होंने संबंधित संस्थाओं से माँग की कि इस समस्या को मानवीय आधार पर हल किया जाए।
मक्का मुकर्रमा में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते के बारे में उन्होंने कहा कि इसके उद्देश्य अभी स्पष्ट नहीं हैं। उनका कहना था कि क्षेत्र के लिए वास्तविक ख़तरा इज़राइल और अमेरिका की ओर से राजनीतिक नक़्शे को बदलने का प्रयास है। इसलिए क्षेत्रीय देशों को अपने पड़ोसी देशों के बजाय साझा दुश्मन इज़राइल के मुक़ाबले में एकजुट होना चाहिए।
नजफ़ के इमामे जुमा ने पैग़म्बरे अकरम (स) की वफ़ात के अवसर पर अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) की ज़ियारत के लिए आने वाले पचास लाख ज़ायरीन का उल्लेख किया और व्यवस्थाओं की सराहना की। साथ ही उन्होंने जनता, उलमा, मोकिबों और सरकारी संस्थाओं का शुक्रिया अदा किया।
उन्होंने कहा कि रसूले अकरम (स) की वफ़ात के बाद अहले बैत (अ) से जुड़ाव वास्तव में पैग़म्बरी की शिक्षाओं और इस्लामी शरीअत की निरंतरता से जुड़ाव है। उन्होंने मुसलमानों से ज़ोर देकर कहा कि वे रसूले अकरम (स) के बाद अहले बैत (अ) पर होने वाले अत्याचारों को भी याद रखें।