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ईरानी राष्ट्र शहीद रहबर के खून का बदला लेने के लिए दृढ़ संकल्पित हैः आयतुल्लाह आराफ़ी

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ईरानी राष्ट्र शहीद रहबर के खून का बदला लेने के लिए दृढ़ संकल्पित हैः आयतुल्लाह आराफ़ी

ईरान के हौज़ा-ए-इल्मिया के प्रमुख आयतुल्लाह अली रज़ा आराफ़ी ने कहा है कि शहीद रहबर ने ईरान के लिए विभिन्न क्षेत्रों में शक्ति और आत्मनिर्भरता की बुनियाद रखी, विशेष रूप से ज्ञान और तकनीक तथा रक्षा के क्षेत्र में देश को मजबूत बनाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि शहीद रहबर और अन्य शहीदों के खून का क़िसास और बदला कोई व्यक्तिगत या भावनात्मक मामला नहीं है, बल्कि पूरी उम्मत-ए-इस्लामिया और दुनिया के मज़लूमों की मांग है और ईरानी राष्ट्र इस उद्देश्य से पीछे नहीं हटेगा।

आयतुल्लाह आराफ़ी ने हज़रत फ़ातिमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के पवित्र हरम के शबिस्तान इमाम ख़ुमैनी में शहीद रहबर की दफ़्न के चालीसवें दिन के अवसर पर आयोजित मजलिस में भाषण देते हुए कहा कि शहीद रहबर ने अपने चालीस वर्ष के नेतृत्व के दौरान एक स्वतंत्र रास्ता अपनाया और ईरान के लिए वैज्ञानिक एवं तकनीकी शक्ति पैदा करने को मूल प्राथमिकता दी।

उन्होंने कहा कि उम्मत-ए-इस्लामिया पिछले दो सौ वर्षों से ज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में पिछड़ती रही है और लंबे समय तक उसके वैज्ञानिक एवं तकनीकी मामलों में पश्चिम पर निर्भरता रही। लेकिन शहीद रहबर ने इस निर्भरता को समाप्त करने और ईरान को वैज्ञानिक एवं तकनीकी दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए लगातार प्रयास किया।

ईरान के हौज़ा-ए-इल्मिया के प्रमुख ने रक्षा और सैन्य क्षेत्र में भी शहीद रहबर की सेवाओं को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि उन्होंने आधुनिक और प्रभावी रक्षा सिद्धांत के आधार पर ईरान की रक्षा शक्ति को मजबूत किया। उनकी दूरदर्शिता, रणनीति और मार्गदर्शन के परिणामस्वरूप ईरान क्षेत्र की एक प्रभावी शक्ति बन गया और उसने ऐसी क्षमता हासिल कर ली जो दुनिया की बड़ी शक्तियों के सामने खड़ी हो सकती है।

उन्होंने कहा कि सर्वोच्च रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी के मार्गदर्शन और सशस्त्र बलों की कुर्बानियों के कारण दुश्मन के मुकाबले ईरान का प्रतिरोध जारी रहेगा। हम युद्ध शुरू करने वाले नहीं हैं, लेकिन रक्षा के चरण में पूरी ताकत से जवाब देंगे और दुश्मन के लिए परिस्थितियों को कठिन बना देंगे।

आयतुल्लाह आराफ़ी ने आगे कहा कि शहीद इमाम और अन्य शहीदों के खून का बदला किसी व्यक्ति या व्यक्तिगत भावनाओं का मामला नहीं है, बल्कि उम्मत-ए-इस्लामिया और दुनिया के मज़लूमों के अधिकार की मांग है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरानी राष्ट्र अपने शहीद रहबर के खून का बदला लेने के संकल्प पर कायम है, चाहे इसके लिए कई वर्ष ही क्यों न गुजर जाएं।

ईरान के हौज़ा-ए-इल्मिया के प्रमुख ने कहा कि शहीद रहबर एक व्यापक व्यक्तित्व के मालिक थे, जिन्होंने इस्लामी विचारों को व्यावहारिक क्षेत्र में लागू करने के साथ-साथ ईरान और उम्मत-ए-इस्लामिया के लिए विभिन्न क्षेत्रों में शक्ति की बुनियाद रखी। उन्होंने जोर देकर कहा कि शहीद इमाम के विचारों, उनकी वैज्ञानिक और व्यावहारिक कोशिशों तथा नेतृत्व की शैली को और अधिक सामने लाने के लिए गंभीर वैज्ञानिक अध्ययन और बैठकों की आवश्यकता है।

आयतुल्लाह आराफ़ी ने अपने भाषण में कहा कि इतिहास में कुछ व्यक्तित्व किसी एक क्षेत्र में प्रमुख होते हैं, लेकिन शहीद रहबर ज्ञान और बुद्धिमत्ता, प्रबंधन, नेतृत्व, विचार निर्माण और व्यावहारिक संघर्ष सहित कई क्षेत्रों में विशिष्ट स्थान रखते थे। उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू इतने व्यापक हैं कि उन पर विस्तृत शोध और चर्चा की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि शहीद रहबर की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि उन्होंने विचार और व्यवहार को एक-दूसरे से अलग नहीं किया। बहुत से नेता वैचारिक क्षेत्र में मजबूत होते हैं, लेकिन व्यावहारिक प्रशासन और नेतृत्व में कमजोर साबित होते हैं। जबकि कुछ लोग व्यावहारिक क्षेत्र में सफल होते हैं, लेकिन उनके पास मजबूत वैचारिक और बौद्धिक आधार नहीं होता। शहीद इमाम उन व्यक्तित्वों में शामिल थे जिन्होंने विचार निर्माण और व्यावहारिक नेतृत्व, दोनों को एक साथ जोड़ा।

आयतुल्लाह आराफ़ी के अनुसार, शहीद इमाम के व्यक्तित्व में तीन प्रमुख विशेषताएं मौजूद थीं। पहली विशेषता इस्लामी विचार निर्माण थी। उन्होंने इस्लामी शासन, समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनीति सहित विभिन्न क्षेत्रों में गहरी वैचारिक बुनियाद प्रस्तुत की। दूसरी विशेषता इन विचारों को व्यावहारिक क्षेत्र में लागू करने की क्षमता थी। उन्होंने केवल विचार प्रस्तुत नहीं किए, बल्कि उन्हें लागू करने के लिए व्यावहारिक ढांचे और प्रभावी व्यवस्थाएं बनाने का प्रयास भी किया।

उन्होंने तीसरी विशेषता को शक्ति निर्माण बताते हुए कहा कि शहीद रहबर ने विचार और व्यावहारिक नेतृत्व को राष्ट्रीय शक्ति में बदल दिया। उनके नेतृत्व में ईरान ने वैज्ञानिक, रक्षा, राजनीतिक, सांस्कृतिक और अन्य क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं को मजबूत किया और एक स्वतंत्र रास्ता अपनाया।

आयतुल्लाह आराफ़ी ने कहा कि ईरान के विकास का एक महत्वपूर्ण पहलू वैज्ञानिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता है। अतीत में देश लंबे समय तक वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से दूसरों पर निर्भर रहा, लेकिन शहीद इमाम ने वैज्ञानिक विकास, देश के विशेषज्ञों की क्षमताओं से लाभ उठाने, प्रतिभाशाली लोगों का समर्थन करने और विश्व स्तर पर ज्ञान की सीमाओं तक पहुंच को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार वैज्ञानिक विकास के लिए तेज और लगातार प्रयास आवश्यक था।

उन्होंने आगे कहा कि इस नीति के परिणामस्वरूप ईरान ने परमाणु ऊर्जा, नैनो तकनीक, बुनियादी विज्ञान, दवाओं और अन्य आधुनिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की। आयतुल्लाह आराफ़ी ने युवाओं और विश्वविद्यालयों से जोर देकर कहा कि वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता की इस यात्रा को जारी रखते हुए देश को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में और आगे ले जाएं।

ईरान के हौज़ा-ए-इल्मिया के प्रमुख ने रक्षा आत्मनिर्भरता को भी शहीद इमाम के नेतृत्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा कि उन्होंने ऐसी रक्षा व्यवस्था बनाने पर ध्यान दिया जो वैज्ञानिक आधार, आंतरिक क्षमताओं, प्रशिक्षित मानव संसाधन और जनता की भागीदारी पर आधारित हो। उनके नेतृत्व में रक्षा उद्योगों की आंतरिक बुनियाद मजबूत हुई और देश ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान की नीति युद्ध की इच्छा पर आधारित नहीं है, बल्कि प्रभावी रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा पर आधारित है। उनके अनुसार रक्षा शक्ति का उद्देश्य किसी देश पर हमला करना नहीं, बल्कि दुश्मन के मुकाबले देश को मजबूत और स्वतंत्र बनाना है।

आयतुल्लाह आराफ़ी ने अंत में सभी सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों, हौज़ा-ए-इल्मिया और समाज के विभिन्न वर्गों से जोर देकर कहा कि वे ईरान की वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और रक्षा संबंधी आत्मनिर्भरता के रास्ते को आगे बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय विकास और शक्ति की इस यात्रा को एकता, मजबूत संकल्प और लगातार प्रयास के माध्यम से जारी रखना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

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