हुज्जतुल-इस्लाम मुहम्मद हसन अंसारी ने मस्जिदों को केवल नमाज़ अदा करने की जगह नहीं, बल्कि लोगों की सामाजिक और व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान का केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि नमाज़ियों को अपनी समस्याओं के समाधान और सही मार्गदर्शन के लिए मस्जिद के इमाम-ए-जमाअत से सलाह लेनी चाहिए।
कशान में आयोजित इमाम-ए-जमाअत, मस्जिदों के पदाधिकारियों और बेसिज प्रतिनिधियों की बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मस्जिद अल्लाह का घर है और इमाम-ए-जमाअत को इसकी जिम्मेदारी दी गई है। इसलिए उसे मस्जिद का प्रभावी और व्यवस्थित प्रबंधन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मस्जिद समाज का ऐसा स्थान है जहां हर वर्ग और तबके के लोग चाहे उनके पद, प्रतिष्ठा या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो एक ही सफ में खड़े होते हैं। यही मस्जिद की सामाजिक एकता और समानता की महत्वपूर्ण विशेषता है।
उन्होंने शहीद जनरल क़ासिम सुलेमानी के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि इमाम-ए-जमाअत की जिम्मेदारी केवल मस्जिद में आने वाले नमाज़ियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे मस्जिद के आसपास लगभग 40 घरों तक के लोगों से भी संपर्क रखना चाहिए और यदि कोई नमाज़ी अचानक मस्जिद आना बंद कर दे तो उसके हालचाल की जानकारी लेनी चाहिए।
हुज्जतुल-इस्लाम अंसारी ने अपने लगभग 35 वर्षों के इमाम-ए-जमाअत के अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक पृष्ठभूमि वाले लोग मस्जिदों से जुड़े होते हैं। इसलिए इमाम को विभिन्न आयु और विचारधारा के लोगों के साथ धैर्य और समझदारी से व्यवहार करना चाहिए।
उन्होंने इमाम खुमैनी के प्रसिद्ध कथन “मस्जिदें किले हैं और इन किलों की रक्षा करनी चाहिए” का उल्लेख करते हुए कहा कि मस्जिद का प्रबंधन भी एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसका उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को मस्जिद से जोड़ना और समाज में धार्मिक एवं नैतिक चेतना को मजबूत करना होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मस्जिद में बच्चे, किशोर, युवा, वयस्क और बुजुर्ग साथ ही महिलाएं और पुरुष—सभी जुड़े होते हैं। एक आदर्श इमाम-ए-जमाअत को इन सभी वर्गों की आवश्यकताओं को समझना चाहिए। इसके लिए उसमें विनम्रता, जनसंपर्क और लोगों के बीच रहने की भावना होना जरूरी है।
अंत में उन्होंने कहा कि मस्जिद आने वाली नई पीढ़ी के निर्माण और सामाजिक बदलाव का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकती है। इमाम-ए-जमाअत को नमाज़ियों और पड़ोसियों के हालचाल से अवगत रहना चाहिए, उनकी समस्याओं को सुनना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर उनका मार्गदर्शन करना चाहिए। मस्जिद केवल इबादत की जगह नहीं, बल्कि लोगों के लिए सलाह, सहयोग और समस्याओं के समाधान का भरोसेमंद केंद्र भी होनी चाहिए।