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बहरैन में शिया मामलों में हस्तक्षेप तानाशाही का एक रूप है।

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बहरैन में शिया मामलों में हस्तक्षेप तानाशाही का एक रूप है।

 बहरैन के शिया धर्मगुरु हुज्जतुल इस्लाम शेख आदिल अल-शुअला ने कहा है कि इन दिनों बहरैन में शियाओं के मामलों और उनके हितों पर कब्ज़ा करने तथा शिया उलमा को परेशान करने की जो नीति अपनाई जा रही है, वह शासन में तानाशाही और सरकशी का एक रूप है।

शेख आदिल अल-शुअला ने खलीफा शासन द्वारा धार्मिक मामलों और उन धार्मिक संस्थाओं पर नियंत्रण की निंदा की, जिन्हें स्वतंत्र रहना चाहिए। इनमें जाफरी वक्फ, हुसैनियाएं और सभी मस्जिदें शामिल हैं।

उन्होंने धार्मिक संवाद, उपदेश देने के दायित्व, हुसैनी मंच और जनकल्याणकारी गतिविधियों के संबंध में उठाए गए कदमों की भी निंदा की और कहा कि ये सभी कार्रवाइयां शरीयत और कानून के विरुद्ध हैं।

शेख अल-शुअला के अनुसार, शिया फ़िक़्ह की विशेषताओं के विरोध में होने के कारण ये कदम अमान्य हैं। साथ ही, वे उन कानूनी समझौतों और शासन के प्रमुखों द्वारा शिया मरजए तक़लीद से किए गए वादों का भी उल्लंघन हैं, जिनमें शिया धार्मिक अनुष्ठानों और मान्यताओं की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करने की बात कही गई थी।

उन्होंने अल-खलीफा शासन द्वारा गिरफ्तार किए गए दर्जनों शिया उलमा के खिलाफ मुकदमों की निंदा की और इसकी तुलना शेख अली सलमान पर क़तर के साथ साजिश के आरोप में चलाए गए मुकदमे से की।

शेख अल-शुअला ने कहा कि बहरैन का अल-खलीफा शासन ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की कार्रवाइयों का इस्तेमाल धार्मिक उलमा पर आरोप लगाने और उन्हें ‘विलायत-ए-फ़क़ीह’ की विचारधारा स्वीकार करने के आरोप में मुकदमा चलाने तथा जनता के राजनीतिक अधिकारों को छीनने के लिए कर रहा है। उनके अनुसार, इसे शियाओं के धार्मिक अधिकारों पर मुकदमा चलाने और क्षेत्र में पैदा हुई सुरक्षा स्थिति का लाभ उठाने के रूप में देखा जा रहा है।

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