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ईरानी जनता धैर्य, सतर्कता और अल्लाह पर भरोसे के साथ चुनौतियों का सामना कर रही हैः

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ईरानी जनता धैर्य, सतर्कता और अल्लाह पर भरोसे के साथ चुनौतियों का सामना कर रही हैः

केंद्रीय प्रांत में वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि आयतुल्लाह दरी नजफ़ाबादी ने अपने दरस ए खारिज़-ए-फ़िक़्ह के दौरान कहा कि इतिहास गवाह है कि साम्राज्यवादी शक्तियां अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि ईरानी जनता को दुश्मन को कमतर नहीं आंकना चाहिए और देश तथा राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सतर्कता और राष्ट्रीय एकजुटता बनाए रखना ज़रूरी है।

केंद्रीय प्रांत में वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि आयतुल्लाह दरी नजफ़ाबादी ने अपने दरस ए खारिज़-ए-फ़िक़्ह के दौरान कहा कि इतिहास गवाह है कि साम्राज्यवादी शक्तियां अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि ईरानी जनता को दुश्मन को कमतर नहीं आंकना चाहिए और देश तथा राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सतर्कता और राष्ट्रीय एकजुटता बनाए रखना ज़रूरी है।

उन्होंने कहा कि ईरान अहले-बैत (अ.स.) और इमाम रज़ा (अ.) की सरज़मीन है और उसकी गहरी इस्लामी व ऐतिहासिक पहचान है। ईरानी जनता ने अलग-अलग दौर में दबाव और धमकियों के सामने अपने धैर्य और दृढ़ता का प्रदर्शन किया है।

उन्होंने ईरानी जनता, सशस्त्र बलों, उलमा और सभी ईमानदार लोगों से अपील की कि वे बदलते हालात पर केवल सतही नजर न रखें, बल्कि दूरदर्शिता और समझदारी के साथ परिस्थितियों का जायजा लें।

आयतुल्लाह दरी नजफ़ाबादी ने राष्ट्रीय एकता और एकजुटता की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि यदि पर्याप्त सतर्कता और तैयारी न हो तो दुश्मन नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकता है।

उन्होंने कहा कि देश, राष्ट्रीय हितों और सार्वजनिक हितों की रक्षा में समाज के सभी वर्गों की भूमिका है और देश को विभाजित तथा कमजोर करने के उद्देश्य से तैयार की जाने वाली साजिशों को सफल नहीं होने देना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि धैर्य और दृढ़ता का परिणाम अंततः सफलता और सम्मान है। इसलिए ईश्वर पर भरोसा रखते हुए एकता बनाए रखना और आवश्यक तैयारियों को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि ईरानी राष्ट्र को मौजूदा परिस्थितियों में संयम, जागरूकता और राष्ट्रीय एकजुटता के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

अपने तौहीदी विषय पर आधारित धार्मिक पाठ के दौरान आयतुल्लाह दरी नजफ़ाबादी ने अहले-बैत (अ.स.) की रिवायतों का हवाला देते हुए तौहीद की अहमियत पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ की गवाही अत्यंत महान आध्यात्मिक मूल्य रखती है, क्योंकि तौहीद सभी इलाही शिक्षाओं की बुनियाद है। उन्होंने कुरआन की आयत «لَیْسَ کَمِثْلِهِ شَیْءٌ» और «لَمْ یَلِدْ وَلَمْ یُولَدْ، وَلَمْ یَکُنْ لَهُ کُفُوًا أَحَدٌ» का उल्लेख करते हुए बताया कि अल्लाह का कोई समकक्ष नहीं है।

उन्होंने कहा कि अल्लाह की पहचान इंसान के लिए सबसे ऊंचे ज्ञान के दर्जों में से है। तौहीद, नबूवत, इमामत और इलाही फ़राइज़ पर अमल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और मोमिन को इन शिक्षाओं को केवल ज्ञान तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि अपनी जिंदगी में लागू करना चाहिए।

उन्होंने दुआ-ए-अरफ़ा, दुआ-ए-कुमैल, मुनाजात-ए-शाबानिया और दुआ-ए-जौशन-ए-कबीर जैसी अहले-बैत (अ.स.) की दुआओं में मौजूद तौहीदी शिक्षाओं पर गौर करने की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि इनका अध्ययन इंसान को इस हकीकत तक पहुंचाता है कि
«الله لا إله إلا هو الحي القيوم»
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वही हमेशा जिंदा और पूरी कायनात को कायम रखने वाला है।

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