जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर स्थित जामिया मस्जिद इमाम रजा, गुंड हसी बट में जुमे की नमाज के खुतबे के दौरान आगा सैयद लियाकत हुसैन मूसवी ने तकवा, कुरआन और इतरत से जुड़ाव तथा अहले बैत (अलैहिमुस्सलाम) की सीरत अपनाने के महत्व पर जोर दिया।
जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर स्थित जामिया मस्जिद इमाम रजा, गुंड हसी बट में जुमे की नमाज के खुतबे के दौरान आगा सैयद लियाकत हुसैन मूसवी ने तकवा, कुरआन और इतरत से जुड़ाव तथा अहले बैत (अलैहिमुस्सलाम) की सीरत अपनाने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उम्मते मुस्लिम के वैचारिक, सामाजिक और राजनीतिक पतन के प्रमुख कारणों में कुरआन और इतरत की शिक्षाओं से दूरी शामिल है। मौजूदा हालात पर चर्चा करते हुए उन्होंने यमन, सऊदी अरब और फिलिस्तीन की स्थिति का उल्लेख किया तथा मुसलमानों से बसीरत, एकता और हक व बातिल के बीच अंतर समझने की अपील की।
कुरआन और अहले बैत की शिक्षाएं हिदायत का संपूर्ण स्रोत
आगा सय्यद लियाकत हुसैन मूसवी ने अल्लाह की हम्द व सना के बाद उसकी बंदगी और तकवा अपनाने पर जोर देते हुए कहा कि सभी इबादतों और आध्यात्मिक साधनाओं का मूल उद्देश्य इंसान को तकवा के दर्जे तक पहुंचाना है। अल्लाह तआला ने इंसान को अपनी इबादत और उच्च मानवीय गुणों को प्राप्त करने के लिए पैदा किया है।
कुरआन और उसके व्यावहारिक स्वरूप पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कुरआन मजीद में ऐसे आदर्श प्रस्तुत किए गए हैं, जो हर दौर में इंसानों के लिए हिदायत का जरिया रहे हैं। पैगंबरों और उनके उत्तराधिकारियों (अलैहिमुस्सलाम) का जीवन ईश्वरीय आयतों की व्यावहारिक व्याख्या और सीधे रास्ते की स्पष्ट मिसाल है। इंसान उनके जीवन से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता है।
उन्होंने कुरआन की इस आयत का हवाला दिया, “निस्संदेह हमने उसे रास्ता दिखा दिया, चाहे वह शुक्रगुजार बने या नाशुक्रा।” उन्होंने कहा कि अल्लाह तआला ने इंसान के सामने हिदायत और गुमराही के रास्ते स्पष्ट कर दिए हैं। हर दौर में हक और बातिल के प्रतिनिधि मौजूद रहे हैं, ताकि इंसान अपने विवेक और अधिकार से सही रास्ते का चुनाव कर सके।
उन्होंने एक अन्य कुरआनी आयत के हवाले से कहा कि पैगंबरों और उनके उत्तराधिकारियों का जीवन ईश्वरीय निशानियों का व्यावहारिक स्वरूप है। कुरआन मजीद रसूले अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम) के पवित्र हृदय पर नाजिल हुआ और आपकी सीरत, कथनी तथा करनी में उसकी शिक्षाएं पूरी तरह प्रकट हुईं।
पैगंबर-ए-अकरम और अहले बैत इंसानियत के आदर्श
जुमे की नमाज के खतीब ने अमीरुल मोमिनीन हजरत अली अलैहिस्सलाम के स्थान और महानता का उल्लेख करते हुए हदीस-ए-मंजिलत का हवाला दिया। इस हदीस में रसूले अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम) ने हजरत अली (अलैहिस्सलाम) की तुलना हजरत हारून (अलैहिस्सलाम) से की है, सिवाय इसके कि आपके बाद कोई पैगंबर नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि हजरत अली (अलैहिस्सलाम) ने पैगंबर की शिक्षाओं और कुरआन मजीद को अपने जीवन और चरित्र में इस तरह उतारा कि आप पैगंबरी ज्ञान और ईश्वरीय शिक्षाओं के महान प्रतीक बन गए।
हजरत फातिमा जहरा (सलामुल्लाह अलैहा), हजरत इमाम हसन (अलैहिस्सलाम) और हजरत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) के गुणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने आयत-ए-मवद्दत और आयत-ए-ततहीर का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति वास्तव में एक आदर्श इंसान बनना चाहता है, उसे अहले बैत (अलैहिमुस्सलाम) की सीरत और शिक्षाओं से जुड़ना चाहिए।
आगा सय्यद लियाकत हुसैन मूसवी ने हजरत फातिमा जहरा (सलामुल्लाह अलैहा) के घराने की महानता बयान करते हुए रसूले अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम) की इस हदीस का उल्लेख किया, “फातिमा मेरे अस्तित्व का हिस्सा हैं।” उन्होंने कहा कि इस घराने में पैगंबरी शिक्षाओं, पवित्रता और उच्च मानवीय गुणों का ऐसा संगम था, जो हमेशा उम्मते मुस्लिम के लिए मार्गदर्शन का स्रोत रहेगा।
हदीस-ए-सकलैन का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि रसूले अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम) ने कुरआन मजीद और अहले बैत (अलैहिमुस्सलाम) से जुड़े रहने को गुमराही से सुरक्षित रहने का माध्यम बताया है। उनके अनुसार, उम्मते मुस्लिम के वैचारिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पतन का एक महत्वपूर्ण कारण कुरआन और इतरत की शिक्षाओं से दूरी है। इसलिए मुसलमानों को अपने व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में इन दोनों स्रोतों से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए।
यमन, सऊदी अरब और फिलिस्तीन की स्थिति पर चर्चा, मुस्लिम एकता पर जोर
मौजूदा परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए आगा सैयद लियाकत हुसैन मूसवी ने यमन और सऊदी अरब के बीच विवाद का उल्लेख किया। उन्होंने इसे अपने दृष्टिकोण से कमजोर और वंचित लोगों तथा साम्राज्यवादी ताकतों के बीच संघर्ष बताया। उन्होंने मुसलमानों से अपील की कि वे क्षेत्रीय परिस्थितियों का व्यापक परिप्रेक्ष्य में जायजा लें और घटनाओं को समझने में बसीरत से काम लें।
उन्होंने अंसारुल्लाह की ओर से सऊदी अरब के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाइयों को आत्मरक्षा बताते हुए कहा कि अंसारुल्लाह उन ठिकानों को निशाना बना रहा है, जहां से उस पर हमले किए जाते हैं। उन्होंने कुछ मुस्लिम विद्वानों द्वारा यमन के अंसारुल्लाह के खिलाफ गलत जानकारी प्रस्तुत किए जाने की आलोचना की और कहा कि मुसलमानों को परिस्थितियों का व्यापक संदर्भ में विश्लेषण करना चाहिए।
फिलिस्तीन में हुए जान-माल के नुकसान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब फिलिस्तीनी जनता पर भीषण हमले हो रहे थे और हजारों बच्चे तथा अन्य लोग मारे गए, उस समय कुछ विद्वानों और खतीबों की ओर से वैसी ही तीव्र प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। उन्होंने सऊदी सरकार की भूमिका की भी आलोचना की और आरोप लगाया कि उसने कुछ मौकों पर पर्दे के पीछे से इजराइली सरकार का समर्थन किया।
अंत में आगा सय्यद लियाकत हुसैन मूसवी ने मुसलमानों से अपील की कि वर्तमान दौर में सूचनाओं की प्रचुरता के बावजूद लापरवाही और संकीर्ण सोच से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को हक और बातिल के बीच अंतर समझते हुए यह महसूस करना चाहिए कि उनका वास्तविक हित एकता और आपसी सहयोग में है। उन्होंने उम्मते मुस्लिम को कुरआन और इतरत से जुड़ाव, बसीरत तथा आपसी एकता अपनाने की नसीहत की।