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फ़ितनों के दौर में बसीरत की अहमियत और जंगे-जमल से मिलने वाले सबक़ः

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फ़ितनों के दौर में बसीरत की अहमियत और जंगे-जमल से मिलने वाले सबक़ः

छजुपुरा सादात मे 16 अक्टूबर 2026 को हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना सय्यद महदी अब्बास ज़ैदी साहब ने नमाज़ ए जुमा के खुत्बे मे इस्लामी इतिहास की एक अहम घटना, यानी जंगे-जमल, पर चर्चा करेंगे। यह घटना हमें बताती है कि फ़ितनों के दौर में हक़ को पहचानने के लिए बसीरत, तक़वा और सही मापदंडों की कितनी ज़रूरत होती है।

छजुपुरा सादात मे 16 अक्टूबर 2026 को हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना सय्यद महदी अब्बास ज़ैदी साहब ने नमाज़ ए जुमा के खुत्बे मे इस्लामी इतिहास की एक अहम घटना, यानी जंगे-जमल, पर चर्चा करेंगे। यह घटना हमें बताती है कि फ़ितनों के दौर में हक़ को पहचानने के लिए बसीरत, तक़वा और सही मापदंडों की कितनी ज़रूरत होती है।

इमाम जुमा ने कहा कि पिछले ख़ुत्बों में हमने प्रोपेगेंडा, फ़ितनों और बसीरत की अहमियत पर चर्चा की थी। इस सिलसिले में अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के उस फ़रमान को भी सामने रखा था, जिसमें बताया गया है कि फ़ितना उस समय पैदा होता है, जब हक़ और बातिल को इस तरह मिला दिया जाता है कि दोनों के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है।

आज इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए इस्लामी इतिहास की एक अहम घटना, यानी जंगे-जमल, पर चर्चा करेंगे। यह घटना हमें बताती है कि फ़ितनों के दौर में हक़ को पहचानने के लिए बसीरत, तक़वा और सही मापदंडों की कितनी ज़रूरत होती है।

जंगे-जमल: हक़ की पहचान का ऐतिहासिक इम्तिहान

36 हिजरी में होने वाली जंगे-जमल इस्लामी इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। इस युद्ध में एक ओर अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम थे, जबकि दूसरी ओर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि की पत्नी आयशा तथा प्रसिद्ध सहाबी तल्हा और ज़ुबैर मौजूद थे।

उस समय एक आम मुसलमान की मानसिक स्थिति की कल्पना कीजिए। उसके सामने जानी-मानी हस्तियां थीं। दोनों ओर इस्लाम का नाम लिया जा रहा था और अपने-अपने मौक़िफ़ के समर्थन में दलीलें पेश की जा रही थीं। ऐसे हालात में बहुत से लोगों के लिए यह तय करना आसान नहीं था कि हक़ किसके साथ है।

फ़ितनों की एक बड़ी मुश्किल यही है कि कभी हक़ के मुक़ाबले में ऐसी हस्तियां खड़ी होती हैं, जिन्हें समाज में इज़्ज़त और सम्मान प्राप्त होता है। लोग उनके सामाजिक स्थान, शोहरत और पिछली सेवाओं से प्रभावित होकर असल मुद्दे को नज़रअंदाज़ करने लगते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी हस्ती का बड़ा मुक़ाम इस बात की गारंटी है कि उसका हर मौक़िफ़ सही होगा? क्या किसी की पिछली सेवाएं उसे ग़लती से सुरक्षित कर देती हैं? क्या किसी की शोहरत उसकी बात को दलील और जांच-पड़ताल से ऊपर कर सकती है? जंगे-जमल हमें इन्हीं सवालों पर गंभीरता से विचार करने की दावत देती है।

हारिस बिन हौवत का सवाल और अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम का जवाब

नहजुल बलाग़ा में उल्लेख मिलता है कि हारिस बिन हौवत ने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम से सवाल किया:

أَتَرَانِي أَظُنُّ أَصْحَابَ الْجَمَلِ كَانُوا عَلَى ضَلَالَةٍ؟ “क्या आप समझते हैं कि मैं असहाबे-जमल को गुमराही पर मान सकता हूं?”

फ़ितनों के दौर में बसीरत की अहमियत और जंगे-जमल से मिलने वाले सबक़

इस सवाल में उस दौर के बहुत से मुसलमानों की मानसिक उलझन और बेचैनी छिपी हुई थी। हारिस बिन हौवत के सामने जानी-मानी हस्तियां थीं और उनके बारे में फ़ैसला करना उसके लिए मुश्किल था।

यह सवाल हमें एक बुनियादी सिद्धांत की ओर ध्यान दिलाता है: हक़ को पहचानने के लिए हस्तियों को मापदंड बनाने के बजाय हक़ को मापदंड बनाना चाहिए। किसी व्यक्ति की शोहरत, सामाजिक हैसियत या पिछली सेवाओं को देखकर उसके हर मौक़िफ़ को सही नहीं माना जा सकता। इसी तरह, किसी से मतभेद होने के कारण उसकी हर बात को ग़लत समझ लेना भी इंसाफ़ के ख़िलाफ़ है।

बसीरत रखने वाला व्यक्ति भावनाओं, पक्षपात और हस्तियों के प्रभाव से ऊपर उठकर दलील, तथ्यों और शरई सिद्धांतों की रोशनी में फ़ैसला करने की कोशिश करता है।

प्रोपेगेंडा और प्रसिद्ध हस्तियों का प्रभाव

जंगे-जमल से मिलने वाला एक अहम सबक़ यह भी है कि किसी मौक़िफ़ के समर्थन में प्रसिद्ध हस्तियों की मौजूदगी लोगों के फ़ैसलों पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।

यह इंसानी फ़ितरत है कि हम अपने पसंदीदा और सम्मानित लोगों की बात आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। उनकी पिछली सेवाओं और शोहरत से प्रभावित होकर कभी-कभी हम उनके मौजूदा मौक़िफ़ की निष्पक्ष समीक्षा करना भी ज़रूरी नहीं समझते। यही प्रवृत्ति कई बार ग़लत फ़ैसलों का कारण बन जाती है।

आज प्रोपेगेंडा के ज़रिए भी इंसान की इस कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया जाता है। कभी किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का नाम इस्तेमाल करके किसी बात को विश्वसनीय साबित करने की कोशिश की जाती है। कभी किसी की पिछली सेवाओं का हवाला देकर उसके वर्तमान कार्यों पर सवाल उठाने से रोका जाता है। और कभी किसी हस्ती के ख़िलाफ़ ऐसा नकारात्मक माहौल बनाया जाता है कि लोग उसकी सही बात सुनने के लिए भी तैयार नहीं होते।

इसलिए हमें दो बातें हमेशा याद रखनी चाहिए: किसी की शोहरत उसकी बात के सही होने की दलील नहीं है और किसी के ख़िलाफ़ प्रोपेगेंडा उसके ग़लत होने का प्रमाण नहीं है।

फ़ैसला हमेशा दलील, जांच-पड़ताल और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल पसंद और नापसंद के आधार पर।

आज के दौर में बसीरत की ज़रूरत

जंगे-जमल को गुज़रे लगभग चौदह शताब्दियां बीत चुकी हैं, लेकिन उससे मिलने वाले सबक़ आज भी हमारी व्यक्तिगत और सामाजिक ज़िंदगी के लिए महत्वपूर्ण हैं। आज भी हमारे सामने विभिन्न हस्तियां, संगठन, विचारधाराएं और तरह-तरह के दावे मौजूद हैं। हर कोई अपनी बात को सही साबित करने की कोशिश करता है, जबकि आम इंसान के लिए इन दावों के बीच हक़ और बातिल में अंतर करना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है।

सोशल मीडिया ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। एक छोटी-सी वीडियो, किसी भाषण का टुकड़ा या सनसनीख़ेज़ ख़बर कुछ ही पलों में हज़ारों लोगों की राय बदल सकती है। कई बार किसी बयान को उसके असल संदर्भ से अलग करके पेश किया जाता है, जिससे ग़लतफ़हमियां पैदा होती हैं और लोग पूरी सच्चाई जाने बिना किसी के समर्थन या विरोध में फ़ैसला कर लेते हैं।

ऐसे माहौल में हमें केवल यह नहीं देखना चाहिए कि कौन बोल रहा है, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि उसकी बात कितनी सही है। क्या उसके पास विश्वसनीय दलील है? क्या हमने उसकी पूरी बात सुनी है? क्या हमने संबंधित तथ्यों की जांच की है? क्या हम विरोधी पक्ष की बात को भी समझने की कोशिश करते हैं?

और सबसे अहम सवाल यह है कि अगर सच्चाई हमारी पसंद और इच्छा के ख़िलाफ़ हो, तो क्या हम उसे स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? यही सवाल हमारी बसीरत की असली परीक्षा है।

नौजवानों की तरबियत और हमारी ज़िम्मेदारी

आज के दौर में बसीरत की सख़्त ज़रूरत है, ख़ास तौर पर हमारी नौजवान नस्ल को इसकी अहमियत समझना चाहिए। नौजवानों को केवल ऐतिहासिक घटनाएं सुनाना काफ़ी नहीं है, बल्कि उन्हें यह भी समझाना ज़रूरी है कि उन घटनाओं में हक़ की पहचान कैसे की गई, ग़लत फ़ैसले किन कारणों से हुए और प्रोपेगेंडा से किस तरह सुरक्षित रहा जा सकता है।

नौजवानों में जांच-पड़ताल, दलील, तक़वा और निष्पक्ष अध्ययन की आदत पैदा करनी चाहिए। उन्हें सिखाना होगा कि किसी ख़बर को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सच्चाई की जांच करें, किसी वीडियो या बयान पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय उसका पूरा संदर्भ समझें और किसी हस्ती से मोहब्बत या दुश्मनी को सच्चाई पहचानने में रुकावट न बनने दें।

इतिहास का वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब हम उसके घटनाक्रम से सबक़ लेकर आज के अपने फ़ैसलों को बेहतर बनाएं। अगर हम ऐतिहासिक घटनाओं को पढ़ें, लेकिन उनसे बसीरत हासिल न करें, तो इतिहास का अध्ययन हमारी व्यावहारिक ज़िंदगी में अपेक्षित बदलाव नहीं ला सकेगा।

अपनी बसीरत को जागृत करें और हक़ को मापदंड बनाएं

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने विवेक और चेतना को जागृत करें तथा प्रसिद्ध हस्तियों की मोहब्बत या मुख़ालफ़त में अपनी बसीरत क़ुर्बान न करें। हमें अपने ज्ञान, तक़वा और बसीरत के ज़रिए ख़ुद भी जागरूक रहना चाहिए और अपने दीन व ईमान के भाइयों को भी जागरूक करना चाहिए।

समाज के हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है कि वह तथ्यों की जांच करे, अफ़वाहों और बेबुनियाद प्रोपेगेंडा से बचे तथा दूसरों को भी इनसे सुरक्षित रहने की प्रेरणा दे। मतभेद के माहौल में इंसाफ़, जांच-पड़ताल और दलील को प्राथमिकता देना ही बसीरत का तक़ाज़ा है।

क़ुरआन मजीद की उपर्युक्त आयत हमें याद दिलाती है कि तक़वा इंसान के भीतर हक़ और बातिल में अंतर करने की क्षमता पैदा करने का माध्यम है। इसलिए यदि हम फ़ितनों के दौर में सही रास्ते पर क़ायम रहना चाहते हैं, तो हमें अपने ज्ञान में वृद्धि करनी होगी, तक़वे को मज़बूत बनाना होगा और अपनी बसीरत को परिपक्व करना होगा।

जंगे-जमल का ऐतिहासिक वाक़या हमें यह पैग़ाम देता है कि हस्तियों के बजाय हक़ को मापदंड बनाएं, भावनाओं के बजाय दलील से काम लें और प्रोपेगेंडा के बजाय जांच-पड़ताल को महत्व दें। यही सोच हमें फ़ितनों के नकारात्मक प्रभावों से बचाने और अपनी धार्मिक, नैतिक तथा सामाजिक ज़िम्मेदारियों को बेहतर ढंग से निभाने में मदद कर सकती है।

अल्लाह तआला हमें हक़ को पहचानने, उस पर अमल करने और अपने समाज में बसीरत व जागरूकता फैलाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

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