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मराजए किराम के दुश्मन इस दौर के ख़वारिज हैं

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मराजए किराम के दुश्मन इस दौर के ख़वारिज हैं

मौलाना सैयद ताबिश हसन खुरासानी ने खुत्बा-ए-जुमआ में कहा कि मरजए किराम के विरोधी वर्तमान दौर के ख़वारिज हैं, जो अज़ादारी के नाम पर टकराव और मतभेद पैदा कर रहे हैं। उन्होंने इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की नसीहत बयान करते हुए पाँच प्रकार के लोगों की संगत से बचने की ताकीद की हैं।

महाराष्ट्र के ठाणे ज़िले के कल्याण में इमाम ए जुमा मौलाना सैयद ताबिश हसन खुरासानी ने अपने खुत्बे में कहा कि मरजए किराम के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले लोग वर्तमान दौर के ख़वारिज हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह ख़वारिज ने अल्लाह का नाम लेकर अमीरुल मोमिनीन हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम का विरोध किया था, उसी तरह आज कुछ लोग अज़ादारी के नाम पर मरजए किराम के खिलाफ मतभेदों को बढ़ावा दे रहे हैं। जबकि धार्मिक रस्मों और मज़हबी शिआर को आपसी फूट और टकराव का माध्यम नहीं बनाना चाहिए।

अपने संबोधन में मौलाना ताबिश खुरासानी ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन हज़रत अली इब्ने हुसैन अलैहिस्सलाम की एक प्रसिद्ध रिवायत बयान की और उसका अनुवाद भी पेश किया। उन्होंने कहा कि इमाम अलैहिस्सलाम ने अपने एक बेटे को नसीहत करते हुए फरमाया,ऐ मेरे बेटे! पाँच प्रकार के लोगों की न तो संगत करना, न उनके साथ बे तकल्लुफ़ होकर बातचीत करना और न ही उनके साथ सफ़र करना।

इस रिवायत की व्याख्या करते हुए मौलाना ने बताया कि इमाम अलैहिस्सलाम ने सबसे पहले झूठ बोलने वाले व्यक्ति से दूर रहने की नसीहत की, क्योंकि वह मरीचिका की तरह हक़ीक़त को बदलकर पेश करता है और इंसान को धोखे में डाल देता है। इसके बाद फ़ासिक़ व्यक्ति से बचने की ताकीद की, जो मामूली लाभ के लिए भी वफ़ादारी का सौदा कर सकता है।

उन्होंने आगे कहा कि इमाम अलैहिस्सलाम ने कंजूस व्यक्ति की संगत से भी मना किया है, क्योंकि वह ज़रूरत के समय साथ छोड़ देता है। इसी तरह मूर्ख व्यक्ति से दूर रहने की नसीहत की गई है। ऐसा व्यक्ति भले ही दूसरों का भला चाहता हो, लेकिन अपनी नासमझी के कारण नुकसान पहुँचा सकता है।

मौलाना ने बताया कि इमाम अलैहिस्सलाम ने रिश्तेदारी तोड़ने वाले व्यक्ति से भी दूर रहने की ताकीद की है। ऐसे व्यक्ति के बारे में अल्लाह की किताब में लानत का उल्लेख किया गया है।

मौलाना सैयद ताबिश हसन खुरासानी ने कहा कि इस रिवायत में इंसान की सामाजिक और नैतिक ज़िंदगी के लिए एक व्यापक मार्गदर्शन मौजूद है। इससे यह सबक मिलता है कि इंसान को अपनी संगत चुनते समय सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि अच्छी संगत चरित्र को सँवारती है, जबकि बुरी संगत इंसान को गुमराही और नुकसान की ओर ले जा सकती है।

अपने खुत्बे के अंत में उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि धार्मिक मामलों में भावनाओं के बजाय बसीरत, अच्छे अख़लाक़ और ज़िम्मेदारी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही, अज़ादारी जैसे पवित्र धार्मिक शिआर को आपसी मतभेद और फूट का माध्यम बनाने से बचना चाहिए।

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