लेबनान के उम्मत आंदोलन के महासचिव शेख़ अब्दुल्लाह जबरी ने एक बयान जारी कर आज़रबाइजान गणराज्य में इस्लामी हिजाब को निशाना बनाने वाले कदमों और व्यवहारों की निंदा की है।
शेख़ अब्दुल्लाह जबरी ने अपने बयान में उन कार्रवाइयों की निंदा की, जिनके माध्यम से मुस्लिम महिलाओं की धार्मिक पोशाक अपनाने की स्वतंत्रता को सीमित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हिजाब पर रोक लगाने या उस पर मनमाने प्रतिबंध लागू करने वाला कोई भी फैसला धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हिजाब केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि एक धार्मिक प्रतीक और इस्लामी पहचान की निशानी है। महिलाओं की स्वतंत्रता का सम्मान करने का अर्थ उनके हिजाब पहनने के अधिकार की रक्षा करना है, न कि आधुनिकता, धर्मनिरपेक्षता या सार्वजनिक जीवन को व्यवस्थित करने के नाम पर उन्हें हिजाब छोड़ने के लिए मजबूर करना।
शेख़ जबरी ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि अज़रबैजान जैसे मुस्लिम बहुल देश में धार्मिक प्रतीकों पर दबाव डालने वाली कार्रवाइयाँ सामने आ रही हैं, जबकि दूसरी ओर बहुलतावाद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सम्मान के नारे लगाए जाते हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसी महिला पर अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन करने के कारण दबाव डाला जाता है, तो फिर महिला की स्वतंत्रता की बात कैसे की जा सकती है? इसी तरह, जब हिजाब के कारण भेदभाव किया जाए या किसी महिला को शिक्षा और रोज़गार से वंचित किया जाए, तो मानवाधिकारों के सम्मान का क्या अर्थ रह जाता है?
शेख़ जबरी के अनुसार, इस्लामी प्रतीकों को निशाना बनाने से समाज में स्थिरता स्थापित करने में मदद नहीं मिलती, बल्कि इससे सामाजिक विभाजन बढ़ता है और अन्याय तथा उपेक्षा की भावना और गहरी होती है।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकारों की ताकत धार्मिक प्रतीकों के विरुद्ध कार्रवाई करने से नहीं, बल्कि नागरिकों की गरिमा की रक्षा करने और उनकी मान्यताओं का सम्मान करने की क्षमता से मापी जाती है।
शेख़ जबरी ने अज़रबैजान के अधिकारियों से आग्रह किया कि वे हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगाने वाली किसी भी कार्रवाई पर पुनर्विचार करें और बिना किसी दबाव या भेदभाव के धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करें।
उन्होंने इस्लामी और मानवाधिकार संगठनों से भी अपील की कि वे शांतिपूर्ण और कानूनी तरीकों से इन स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए आगे आएँ।
अंत में शेख़ जबरी ने ज़ोर देकर कहा कि महिलाओं की स्वतंत्रता उनके सिर से जबरन हिजाब हटाने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि उनकी इच्छा, गरिमा और अपनी पसंद के अनुसार निर्णय लेने के अधिकार का सम्मान करने से प्राप्त होती है।