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इस्लामी उम्मत की एकता की रक्षा में उलेमा की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है

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इस्लामी उम्मत की एकता की रक्षा में उलेमा की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद जलाल रिज़वी मेहर ने कहा कि इस्लामी उम्मत की एकता और एकजुटता की रक्षा करना धार्मिक विद्वानों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि उलेमा को पवित्र कुरआन की शिक्षाओं को स्पष्ट रूप से पेश करने, विभिन्न इस्लामी मसलकों के बीच वैज्ञानिक एवं धार्मिक संवाद को बढ़ावा देने और साझा धार्मिक सिद्धांतों पर जोर देने के माध्यम से मुसलमानों के बीच आपसी प्रेम और एकजुटता को मज़बूत करना चाहिए, ताकि दुश्मनों की साजिशों का हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद जलाल रिज़वी मेहर ने कहा कि इस्लामी उम्मत की एकता और एकजुटता की रक्षा करना धार्मिक विद्वानों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि उलेमा को पवित्र कुरआन की शिक्षाओं को स्पष्ट रूप से पेश करने, विभिन्न इस्लामी मसलकों के बीच वैज्ञानिक एवं धार्मिक संवाद को बढ़ावा देने और साझा धार्मिक सिद्धांतों पर जोर देने के माध्यम से मुसलमानों के बीच आपसी प्रेम और एकजुटता को मज़बूत करना चाहिए, ताकि दुश्मनों की साजिशों का मुकाबला किया जा सके।

क़ुम के धार्मिक शिक्षा केंद्र हौज़ा ए इल्मिया के छात्रों और विद्वानों की प्रतिनिधि परिषद के अध्यक्ष हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद जलाल रज़वी मेहर ने हमदान में हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के संवाददाता से बातचीत करते हुए विदेशी शक्तियों की फूट डालने वाली साजिशों के प्रति धार्मिक विद्वानों को सतर्क रहने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि इस्लामी उम्मत की एकता और एकजुटता दुश्मनों के प्रभाव और हस्तक्षेप का मुकाबला करने के सबसे महत्वपूर्ण साधनों में से एक है। इस मूल्यवान एकता की रक्षा करना उलमा की अहम ज़िम्मेदारी है।

उन्होंने मिस्र के प्रसिद्ध विद्वान तंतावी से जुड़ी एक कथित टिप्पणी का उल्लेख किया, जिसमें अंग्रेज़ एडवर्ड ब्राउन को मुसलमानों के बीच एकता की संभावनाओं का अध्ययन करने का कार्य सौंपे जाने की बात कही गई है। रिज़वी मेहर के अनुसार, इस कथन में बताया गया है कि ब्रिटिश सरकार ने ब्राउन से इस्लामी उम्मत की स्थिति का जायजा लेने और यह पता लगाने को कहा था कि क्या मुसलमान एकता स्थापित कर सकते हैं या उनके आंतरिक मतभेद आपसी सहयोग में बाधा बनेंगे।

हुज्जतुल इस्लाम रिज़वी मेहर ने कहा कि ब्राउन ने सुल्तान अब्दुल हमीद के शासनकाल के दौरान तुर्की और ईरान जैसे देशों की यात्रा करके मुसलमानों की स्थिति का अध्ययन किया था। इस दौरान उन्होंने कुछ धार्मिक विद्वानों और विभिन्न इस्लामी मसलकों के अनुयायियों के बीच मौजूद मतभेदों का उल्लेख किया और इन्हें मुसलमानों की एकता की राह में बाधा बताया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि इस ऐतिहासिक कथन की प्रामाणिकता और इसके सही संदर्भ की जांच आवश्यक है, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण वास्तविकता की ओर ध्यान आकर्षित करता है। वह यह कि जब धार्मिक मतभेद दुश्मनी, तकफीर और एक-दूसरे पर आरोप लगाने का रूप ले लेते हैं, तो विदेशी शक्तियों को उनका फायदा उठाने का अवसर मिल जाता है। इसलिए फूट डालने के तरीकों को पहचानना और उनका मुकाबला करना धार्मिक विद्वानों के महत्वपूर्ण कर्तव्यों में शामिल है।

क़ुम के हौज़ा ए इल्मिया के छात्रों और विद्वानों की प्रतिनिधि परिषद के अध्यक्ष ने इस्लामी एकता को मजबूत करने में धार्मिक शिक्षा केंद्रों की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि उलमा को पवित्र कुरआन की शिक्षाओं को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना चाहिए, विभिन्न इस्लामी मसलकों के बीच विद्वतापूर्ण संवाद को बढ़ावा देना चाहिए, मतभेदों को भड़काने से बचना चाहिए और साझा आस्थाओं एवं धार्मिक मूल्यों को प्रमुखता देनी चाहिए। इससे मुसलमानों के बीच आपसी समझ, प्रेम और एकजुटता को बढ़ावा मिलेगा।

अंत में उन्होंने इस्लामी उम्मत की एकता की रक्षा और फूट डालने वाली साजिशों के प्रति सतर्कता को एक रणनीतिक आवश्यकता बताया। उन्होंने कहा कि इतिहास के अनुभवों से पता चलता है कि मुसलमान जितनी अधिक जागरूकता के साथ मतभेद पैदा करने वाली कोशिशों का सामना करेंगे और अपने साझा धार्मिक सिद्धांतों पर भरोसा रखेंगे, उतनी ही अधिक सफलता से दुश्मनों की साजिशों को नाकाम कर सकेंगे और इस्लामी दुनिया की शक्ति एवं प्रतिष्ठा को मजबूत बना सकेंगे।

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