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सूरह कौसर के ऐजाज़ का रहस्य

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सूरह कौसर के ऐजाज़ का रहस्य

क़ुरआन की सबसे छोटी सूरह सूरह कौसर, पैग़म्बरे इस्लाम (स) के दुश्मनों द्वारा दिए जाने वाले तानों का ईश्वरीय उत्तर थी। यह सूरह अनेक गहन धार्मिक शिक्षाओं से परिपूर्ण है। इसमें पैग़म्बर (स) को कौसर प्रदान किए जाने और इस ईश्वरीय वादे के निश्चित रूप से पूरा होने का उल्लेख है, जो क़ुरआन की महानता और उसके चमत्कार का एक पहलू उजागर करता है।

क़ुम के हौज़ा इल्मिया के उपप्रमुख हुज्जतुल इस्लाम मलिकी ने सूरह मुबारका कौसर की शिक्षाओं और क़ुरआन में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) के उच्च स्थान पर प्रकाश डाला।

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) से विशेष रूप से संबंधित सूरह और निशानियों में से एक सूरह मुबारका कौसर है। यह क़ुरआन की सबसे छोटी सूरह है, लेकिन अपने विषयवस्तु की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। इसके समृद्ध होने का कारण यह है कि इस सूरह का मुख्य विषय हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) हैं।

इस सूरह के नाज़िल होने और इसके शाने नुज़ूल के बारे में शिया और सुन्नी, दोनों समुदायों के सभी मुफ़स्सिरों के बीच सहमति पाई जाती है। इस संबंध में जो मतभेद हैं, वे मामूली हैं। इसका संबंध उन तानों से है, जो आस बिन वाइल और उसके जैसे लोग पैग़म्बरे इस्लाम (स) के प्रति अपने मन में दुश्मनी रखने के कारण उन्हें दिया करते थे।

पैग़म्बरे इस्लाम (स) के दो बेटे, अब्दुल्लाह और इब्राहीम, इस दुनिया से रुख़्सत हो गए थे। उनके विरोधी इस बात को आधार बनाकर पैग़म्बर (स) को ताने देते और कहते थे कि अब उनका वंश आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं रहा। वे उन्हें ‘अब्तर’ कहते थे, जिसका अर्थ है ऐसा व्यक्ति जिसकी नस्ल और वंश आगे न बढ़े तथा जिसका कोई उत्तराधिकारी न हो।

अल्लाह तआला ने अपने प्यारे पैग़म्बर (स) के दिल को सुकून देने के लिए यह सूरह नाज़िल की और फ़रमाया:

“इन्ना आअतैनाकल कौसर।”

इस आयत की पहली विशेषता यह है कि इसमें ‘इन्ना’ शब्द का प्रयोग हुआ है, जो अरबी भाषा में बहुवचन के रूप में आता है। सभी मुफ़स्सिरों के अनुसार, जब किसी महान विषय का उल्लेख करना होता है, तो अल्लाह तआला इस प्रकार की अभिव्यक्ति का प्रयोग करता है। ‘इन्ना’ का अर्थ है ‘निस्संदेह हमने’। अर्थात हमने तुम्हें कौसर प्रदान किया।

शब्दों के अर्थ और प्रयोग की दृष्टि से ‘अअतैना’ और ‘आतैना’ में महत्वपूर्ण अंतर है। किसी चीज़ को केवल देने और विशेष रूप से प्रदान करने की अभिव्यक्ति में अर्थ तथा भाव की दृष्टि से अंतर होता है। इसलिए ‘अअतैना’ शब्द का प्रयोग भी इस प्रदान की महानता को दर्शाता है।

इस आयत में ‘इन्ना अअतैनाका’ अर्थात ‘निस्संदेह हमने तुम्हें प्रदान किया’ की अभिव्यक्ति भी विशेष महत्व रखती है। यह महानता और व्यापकता का भाव प्रकट करती है। मानो अल्लाह तआला फ़रमा रहा हो कि मैंने, मेरे फ़रिश्तों ने और मेरे आदेश के अधीन कार्य करने वाले सभी माध्यमों ने तुम्हें यह प्रदान किया है। सवाल यह है कि क्या प्रदान किया गया? कौसर। यह प्रदान इसलिए किया गया, ताकि दुश्मनों के वे ताने, जो कभी-कभी तलवार के वार से भी अधिक पीड़ादायक होते हैं, पैग़म्बर (स) के दिल को प्रभावित न कर सकें।

इस आयत का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ‘इन्ना अअतैनाकल कौसर’ में भूतकाल की क्रिया का प्रयोग किया गया है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हमने तुम्हें कौसर प्रदान कर दिया, जबकि उस समय हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) का जन्म भी नहीं हुआ था।

क़ुरआन मजीद में कभी-कभी भविष्य में घटित होने वाली किसी निश्चित घटना को व्यक्त करने के लिए भूतकाल की क्रिया का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के तौर पर, ‘अता अम्रुल्लाह’ अर्थात ‘अल्लाह का आदेश आ गया’। जबकि क़यामत अभी घटित नहीं हुई है, फिर भी क़ुरआन में उसका उल्लेख भूतकाल की क्रिया के साथ किया गया है। इसका आशय यह है कि वह घटना निश्चित रूप से घटित होकर रहेगी।

इसलिए जब अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हमने तुम्हें पहले ही प्रदान कर दिया, तो इसका अर्थ यह है कि यह प्रदान निश्चित रूप से पूरी होकर रहेगी। इसी आधार पर इस सूरह के चमत्कार का एक पहलू इसकी ग़ैबी ख़बर भी है। यह वह ख़बर है, जो अल्लाह तआला ने अपने पैग़म्बर (स) को पहले ही दे दी थी। उसने फ़रमाया कि हमने तुम्हें प्रदान कर दिया, अर्थात हम निश्चित रूप से तुम्हें प्रदान करेंगे। अब सवाल यह है कि क्या प्रदान किया जाएगा? कौसर।

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