सऊदी अरब के ईरान के प्रति रुख में आए बदलाव ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस देश के धार्मिक वर्गों की भूमिका पर एक बार फिर ध्यान केंद्रित किया है। यही वे धार्मिक वर्ग थे, जिन्होंने सांप्रदायिक भाषा का इस्तेमाल करके तेहरान के साथ राजनीतिक मतभेदों को धार्मिक दुश्मनी में बदल दिया। इसका प्रभाव क्षेत्रीय संघर्षों, विशेष रूप से यमन में, स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
यमनी मीडिया कर्मी मोहसिन अली अल-जमाल ने एक लेख में सऊदी मुफ्तियों के रुख की आलोचना की है।
कुछ सऊदी मुफ्तियों और धर्म प्रचारकों ने ईरान विरोधी फतवों और प्रचार के माध्यम से ईरान को ‘मजूस’ जैसे आरोपों से जोड़ा और तेहरान के साथ दुश्मनी को धार्मिक रंग दिया। लेकिन आज, जब सऊदी अरब ईरान के साथ बातचीत की मेज पर बैठा है, तो यह सवाल उठता है कि अतीत के वे तमाम आरोप और दुश्मनी का माहौल आखिर कहां चले गए?
वर्षों तक लोगों के मन में यह बात बैठाई जाती रही कि ईरान के साथ मतभेद केवल राजनीतिक खींचतान नहीं, बल्कि आस्था से जुड़ा टकराव है। इस विचारधारा के तहत तेहरान के साथ बातचीत को राजनीतिक विकल्प के बजाय धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध कदम के रूप में पेश किया जाता था। हालांकि, आज वही सऊदी अरब, जो ईरान विरोधी माहौल बनाने में भूमिका निभाता रहा, ईरान के साथ संबंधों में सहयोग और समझौते का रास्ता अपना रहा है।
इस बदले हुए रुख ने कुछ सऊदी मुफ्तियों और धर्म प्रचारकों की भूमिका पर सवाल और गंभीर कर दिए हैं। इन लोगों ने सांप्रदायिक भाषा के जरिए राजनीतिक मतभेदों को धार्मिक खाई में बदलने में मदद की और ऐसा माहौल बनाया, जिसमें ईरान से दुश्मनी को राजनीतिक दृष्टिकोण के बजाय धार्मिक कर्तव्य के रूप में पेश किया जाने लगा।
इस माहौल का प्रभाव केवल तेहरान और रियाद के संबंधों तक सीमित नहीं रहा। यमन में भी सांप्रदायिक नारों ने मतभेदों को बढ़ाने और दक्षिणी क्षेत्रों के युवाओं को अपने ही देशवासियों के खिलाफ युद्ध में धकेलने के लिए जमीन तैयार की। इन युवाओं को इन लड़ाइयों की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी, जबकि अनेक परिवार अपने प्रियजनों के शोक में डूब गए।
आज, जब राजनीतिक हित सामने आए हैं और बातचीत का रास्ता खुल गया है, तब भी यह सवाल बरकरार है कि यदि ईरान के साथ संबंध बनाए रखना और बातचीत करना संभव है, तो वर्षों तक उसके खिलाफ आरोपों और नफरत भरी भाषा का इस्तेमाल क्यों किया जाता रहा?
सरकारें परिस्थितियों के बदलने के साथ अपना रुख बदल सकती हैं, लेकिन सांप्रदायिक प्रचार के प्रभाव लोगों के मन और जीवन से इतनी आसानी से समाप्त नहीं होते। युद्ध के घाव, शोकाकुल परिवार और समाजों के बीच पैदा हुई दूरियां केवल राजनीतिक भाषा बदलने से खत्म नहीं हो जातीं।
बीते कल के नारों और आज की बातचीत के बीच का यह विरोधाभास उन विचारों की समीक्षा करने की आवश्यकता को उजागर करता है, जिन्होंने राजनीतिक मतभेदों को धार्मिक दुश्मनी में बदल दिया। अंततः इन विचारों के कारण आम लोगों को ऐसी प्रतिद्वंद्विता की कीमत चुकानी पड़ी, जिसके प्रमुख निर्णयकर्ता आज एक अलग रास्ता अपनाने की स्थिति में हैं।
स्रोत: उफुक न्यूज़, यमन