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शेख़ अलअज़हर द्वारा मज़हब ए जाफ़री का बचाव करना, फ़िक़्हे अहलेबैत (अ.स.) की सच्चाई की स्वीकारोक्ति है।

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शेख़ अलअज़हर द्वारा मज़हब ए जाफ़री का बचाव करना, फ़िक़्हे अहलेबैत (अ.स.) की सच्चाई की स्वीकारोक्ति है।

इमाम ए जुमआ नजफ़ अशरफ़ हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद सदरुद्दीन क़बानची ने कहा कि मज़हबे जाफ़री के संबंध में शेख़ अल अज़हर का रुख़ इस मज़हब के फ़िक़्ही अहकाम और उलमा-ए-अहलेबैत (अ.स.) के फ़तवों के महत्व एवं विश्वसनीयता को दर्शाता है।

 हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद सदरुद्दीन क़बानची ने नजफ़ अशरफ़ के हुसैनिया आज़म फ़ातिमिया में नमाज़े जुमा के ख़ुत्बों के दौरान इराक़, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय हालात पर चर्चा करते हुए विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए।

मज़हब ए जाफ़री और व्यक्तिगत स्थिति के क़ानून का बचाव:

उन्होंने इराक़ की संसद में पारित क़ानून-ए-अहवाल-ए-शख़्सिया-ए-जाफ़री के संबंध में मीडिया में उठाई जा रही आपत्तियों का ज़िक्र करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर बेवजह विवाद खड़ा किया जा रहा है, जबकि शेख़ुल अज़हर पहले ही मज़हबे जाफ़री को इस्लाम का पाँचवाँ फ़िक़्ही मज़हब घोषित कर चुके हैं।

उन्होंने कहा कि दारुल इफ़्ता में भी कुछ पारिवारिक समस्याओं के समाधान और परिवारों को टूटने से बचाने के लिए मज़हबे जाफ़री के फ़तवों से मदद ली जाती है। यह बात अहलेबैत (अ.स.) के फ़िक़्ही अहकाम की वास्तविकता और उनकी सही होने की पुष्टि करती है।

इराक़ की हवाई संप्रभुता का उल्लंघन:

इमाम जुमआ नजफ़ अशरफ़ ने इराक़ के हवाई क्षेत्र में ज़ायोनी शासन के लड़ाकू और ईंधन आपूर्ति करने वाले विमानों की लगातार उड़ानों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह इराक़ की राष्ट्रीय संप्रभुता का खुला उल्लंघन है। इसके ख़िलाफ़ इराक़ी सरकार को स्पष्ट और मज़बूत रुख़ अपनाना चाहिए।

ईरान से संबंध समाप्त करना इराक़ के हित में नहीं:

उन्होंने ईरान के साथ संबंध समाप्त करने के लिए बाहरी दबावों का ज़िक्र करते हुए कहा कि ईरान एक स्थायी देश है। इसलिए उसके साथ संबंध तोड़कर या उसकी नाकाबंदी करके अपने ही हितों को नुक़सान नहीं पहुँचाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह भी नहीं है कि इराक़ अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ अपने संबंध समाप्त करना चाहता है। तेहरान में आयोजित चार देशों की बैठक का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान बाहरी हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय देशों के आपसी सहयोग से संभव है।

उन्होंने कुवैत के साथ संबंधों को साझा पहचान, पड़ोसी होने और आपसी हितों पर आधारित बताया तथा मज़हबे जाफ़री के ख़िलाफ़ लिए गए फ़ैसलों पर पुनर्विचार करने की मांग की।

यमन के प्रतिरोध और दृढ़ता को सलाम:

सैयद सदरुद्दीन क़बानची ने यमन की जनता और अंसारुल्लाह के दृढ़ संकल्प की सराहना करते हुए कहा कि 24 घंटे के भीतर 119 हमलों और कई देशों की भागीदारी के बावजूद अंसारुल्लाह की प्रगति उल्लेखनीय है।

उन्होंने सवाल उठाया कि इस युद्ध से आख़िर किसे फ़ायदा पहुँच रहा है? उनके अनुसार, इसका लाभ केवल इस्लाम के दुश्मनों को मिल रहा है। उन्होंने सऊदी अरब से भी अपील की कि वह टकराव के बजाय बातचीत और वार्ता का रास्ता अपनाए।

शुक्रगुज़ारी नेमतों में वृद्धि का ज़रिया है:

इमाम जुमआ नजफ़ अशरफ़ ने अपने धार्मिक ख़िताब में क़ुरआने करीम और आइम्मा-ए-मासूमीन (अ.स.) की रिवायतों की रोशनी में शुक्रगुज़ारी के महत्व को बयान करते हुए कहा कि अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करना उनमें वृद्धि और महान सवाब प्राप्त करने का ज़रिया है।

उन्होंने मोमिनों को अल्लाह की नेमतों की क़द्र करने और अपनी ज़िंदगी में शुक्रगुज़ारी को अपनाने की दावत दी।

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