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कुरआन का संदेश किसी विशेष कौम, क्षेत्र या युग तक सीमित नहीं

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कुरआन का संदेश किसी विशेष कौम, क्षेत्र या युग तक सीमित नहीं

बिहार की राजधानी पटना में मदरसा सुलैमानीयह के पूर्व प्रतिष्ठित विद्वान और कुरआन के अनुवादक हाफिज़ मौलाना फरमान अली की 150वीं जयंती के अवसर पर एक भव्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वानों, बुद्धिजीवियों तथा धार्मिक और शैक्षणिक हस्तियों ने भाग लिया। इस अवसर पर मदरसा सुलैमानीयह पटना के इतिहास पर आधारित एक विस्तृत पुस्तक ‘तारीख़ मदरसा सुलैमानीयह पटना’ का भी गरिमापूर्ण समारोह में विमोचन किया गया।

 बिहार की राजधानी पटना में मदरसा सुलैमानीयह के पूर्व प्रतिष्ठित विद्वान और कुरआन के अनुवादक हाफिज़ मौलाना फरमान अली की 150वीं जयंती के अवसर पर एक भव्य संगोष्ठी आयोजित की गई। इसमें भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वानों, बुद्धिजीवियों तथा धार्मिक और शैक्षणिक हस्तियों ने भाग लिया। इस अवसर पर मदरसा सुलैमानीयह पटना के इतिहास पर आधारित विस्तृत पुस्तक ‘तारीख़ मदरसा सुलैमानीयह पटना’ का भी गरिमापूर्ण समारोह में विमोचन किया गया।

कुरआन का संदेश किसी विशेष कौम, क्षेत्र या युग तक सीमित नहीं, बल्कि कयामत तक पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है: डॉ. हकीम इलाही

यह संगोष्ठी 1 नवंबर 2026, रविवार को सुबह 10 बजे मदरसा सुलैमानीयह पटना में आयोजित हुई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और विशेष वक्ता भारत में प्रतिनिधि वली-ए-फकीह हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही थे।

कुरआन का संदेश किसी विशेष कौम, क्षेत्र या युग तक सीमित नहीं, बल्कि कयामत तक पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है: डॉ. हकीम इलाही

अपने संबोधन में डॉ. हकीम इलाही ने कुरआन की सार्वभौमिकता और मानव निर्माण में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कुरआन मजीद पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शन, दया, बरकत और प्रकाश का संदेश है। यह ईश्वरीय ग्रंथ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र और हर चरण में मनुष्य का मार्गदर्शन करता है। कुरआन दिलों को सुकून, मन को शांति तथा आंतरिक और बाहरी बीमारियों के लिए उपचार और रहमत प्रदान करता है। यह ऐसा मापदंड है, जो सत्य और असत्य के बीच अंतर स्पष्ट करता है। कुरआन का संदेश किसी विशेष कौम, देश, क्षेत्र या युग तक सीमित नहीं है, बल्कि कयामत तक पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शक है।

उन्होंने हाफिज़ मौलाना फरमान अली की शैक्षणिक, धार्मिक और साहित्यिक सेवाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि मरहूम एक प्रतिष्ठित धर्मगुरु और बेहतरीन वक्ता होने के साथ-साथ चिकित्सा विज्ञान में भी महारत रखते थे। हालांकि, कुरआन के उर्दू अनुवाद के कारण उन्हें शैक्षणिक जगत में एक विशिष्ट पहचान और स्थान प्राप्त हुआ।

कुरआन का संदेश किसी विशेष कौम, क्षेत्र या युग तक सीमित नहीं, बल्कि कयामत तक पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है: डॉ. हकीम इलाही

डॉ. हकीम इलाही ने कुरआन के संदेश को आम लोगों तक पहुंचाने के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कुरआन मजीद का प्रचार-प्रसार करना और उसका संदेश लोगों तक पहुंचाना पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफा (स.) का प्रमुख दायित्व था। आपने उम्मत को भी इसकी विशेष ताकीद फरमाई। इसी संदर्भ में आपका प्रसिद्ध कथन है, "मेरी ओर से लोगों तक पहुंचाओ, चाहे वह एक ही आयत क्यों न हो।"

उन्होंने इस्लामी शिक्षण संस्थानों और धार्मिक मदरसों के शिक्षकों, विद्यार्थियों तथा विद्वानों को संबोधित करते हुए कहा कि कुरआन के हिफ्ज़ और अनुवाद पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। किसी भी भाषा में कुरआन के पुराने अनुवादों को पर्याप्त नहीं समझना चाहिए, बल्कि हर वर्ष नए अनुवाद और नई व्याख्याएं सामने आनी चाहिए। इसका कारण यह है कि समय के साथ भाषा और साहित्य में बदलाव आते रहते हैं। इसलिए प्रत्येक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप कुरआन का संदेश लोगों तक पहुंचाना जरूरी है।

कुरआन के अनुवादों के इतिहास का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विभिन्न युगों में अनेक भाषाओं में कुरआन का अनुवाद किया गया है। फारसी भाषा में हज़रत सलमान फारसी (रज़ि.) ने प्रारंभिक दौर में अनुवाद की व्यवस्था की थी। इस्लाम के शुरुआती दौर में जब कुछ गैर-अरब मुसलमानों ने नमाज़ में पढ़ी जाने वाली सूरह अल-हम्द का अर्थ समझने की इच्छा व्यक्त की, तो हज़रत सलमान फारसी (रज़ि.) ने उनके लिए इसका फारसी अनुवाद किया।

उन्होंने आगे कहा कि फारसी भाषा में शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी की पुस्तक ‘फत्हुर्रहमान’ कुरआन के महत्वपूर्ण अनुवादों में शामिल है। उर्दू भाषा में शाह रफीउद्दीन देहलवी ने 1786 में शब्दशः अनुवाद किया, जबकि शाह अब्दुल कादिर देहलवी ने 1790 में मुहावरेदार अनुवाद प्रस्तुत किया, जो ‘मौज़ेहुल कुरआन’ के नाम से प्रसिद्ध है।

कुरआन का संदेश किसी विशेष कौम, क्षेत्र या युग तक सीमित नहीं, बल्कि कयामत तक पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है: डॉ. हकीम इलाही

डॉ. हकीम इलाही ने सवाल उठाया कि दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है, जिनकी मातृभाषा अरबी नहीं है। ऐसे में वे कुरआन पर चिंतन-मनन और उसके संदेश पर विचार कैसे करेंगे? इसलिए विभिन्न भाषाओं में कुरआन का अनुवाद और उसके संदेश का प्रचार-प्रसार अत्यंत आवश्यक है।

अपने संबोधन के अंतिम भाग में उन्होंने अय्याम-ए-अज़ाए फातिमिया के अवसर पर हज़रत फातिमा ज़हरा (स.) के गुणों और श्रेष्ठताओं का कुरआन, हदीस और ऐतिहासिक साक्ष्यों के प्रकाश में उल्लेख किया। उन्होंने आपकी जीवनी, प्रतिष्ठा और शहादत की घटना को अत्यंत मार्मिक और प्रभावशाली अंदाज में प्रस्तुत किया, जिसे सुनकर उपस्थित लोगों की आंखें नम हो गईं।

डॉ. हकीम इलाही के विद्वत्तापूर्ण और शोधपरक भाषण का उर्दू अनुवाद हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद तकी हैदर नकवी, ईरान कल्चर हाउस, दिल्ली ने प्रस्तुत किया।

संगोष्ठी की अन्य गतिविधियां और वक्ता

कार्यक्रम का शुभारंभ मदरसा सुलैमानीयह पटना के पूर्व शिक्षक हाफिज़ मुहम्मद उमैर की तिलावत-ए-कुरआन से हुआ, जबकि रसूल अहमद ने नात-ए-रसूल पेश की। मदरसा सुलैमानीयह पटना के वर्तमान प्रभारी प्रधानाचार्य मौलाना समर अब्बास गोपालपुरी ने स्वागत भाषण दिया।

हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद रज़ी हैदर फंदीड़वी ने इंटरनेशनल नूर माइक्रोफिल्म सेंटर, दिल्ली की गतिविधियों और शैक्षणिक सेवाओं का परिचय देते हुए ‘तारीख़ मदरसा सुलैमानीयह पटना’ पुस्तक के लेखन, संपादन, मुद्रण और प्रकाशन की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला।

इस अवसर पर हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद मुराद रज़ा, अध्यक्ष, मुहिब्बाने उम्मुल अइम्मा एजुकेशनल एंड वेलफेयर ट्रस्ट, पटना; हुज्जतुल इस्लाम मौलाना शमशाद अली, मदरसा सुलैमानीयह पटना के पूर्व प्रधानाचार्य; हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद वफा हैदर सरियावी, बिहार; हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद इतरत हुसैन नदीम, इमामे जुमा, कमरा मोहल्ला, मुजफ्फरपुर; तथा प्रसिद्ध शोधकर्ता, लेखक और प्रचारक हुज्जतुल इस्लाम मौलाना इब्ने हसन अमलवी वाएज़, संस्थापक एवं संरक्षक, हसन इस्लामिक रिसर्च सेंटर, अमलू, मुबारकपुर ने संक्षिप्त संबोधन किए।

मदरसा सुलैमानीयह पटना के पूर्व प्रधानाचार्य हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद असद रज़ा रिज़वी गोपालपुरी ने प्रतिनिधि वली-ए-फकीह तथा अन्य अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया, जबकि मदरसा सुलैमानीयह के पूर्व प्रधानाचार्य हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद अमानत हुसैन रिज़वी गोपालपुरी ने सम्मान-पत्र प्रस्तुत किया।

प्रतिनिधि वली-ए-फकीह डॉ. हकीम इलाही की इमामत में नमाज़े ज़ोहरैन जमात के साथ अदा की गई। इसके बाद कार्यक्रम का दूसरा सत्र आयोजित हुआ। इस सत्र में रसूल अहमद ने नात प्रस्तुत की। वहीं हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद फरीदुल हसन, प्रधानाचार्य जामिया नाज़मिया, लखनऊ; सैयद इरशाद अली आज़ाद, अध्यक्ष, शिया वक्फ बोर्ड, बिहार; तथा हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद तकी हैदर, ईरान कल्चर हाउस, दिल्ली ने अपने विचार और अनुभव व्यक्त किए।

कुरआन का संदेश किसी विशेष कौम, क्षेत्र या युग तक सीमित नहीं, बल्कि कयामत तक पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है: डॉ. हकीम इलाही

कार्यक्रम का संचालन हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद तहज़ीबुल हसन, इमामे जुमा, रांची, झारखंड ने किया।

‘तारीख़ मदरसा सुलैमानीयह पटना’ पुस्तक का विमोचन और डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन

संगोष्ठी का एक महत्वपूर्ण आकर्षण प्रसिद्ध शोधकर्ता और लेखक हुज्जतुल इस्लाम मौलाना इब्ने हसन अमलवी वाएज़ द्वारा लिखित विस्तृत और आकर्षक पुस्तक ‘तारीख़ मदरसा सुलैमानीयह पटना’ का विमोचन था। यह पुस्तक सेंटर इंटरनेशनल नूर माइक्रोफिल्म, ईरान कल्चर हाउस, नई दिल्ली के तत्वावधान में प्रकाशित की गई है। डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही और अन्य विद्वानों एवं बुद्धिजीवियों ने संयुक्त रूप से पुस्तक का विमोचन किया।

इस अवसर पर इंटरनेशनल नूर माइक्रोफिल्म सेंटर, ईरान कल्चर हाउस, नई दिल्ली की ओर से हाफिज़ सैयद फरमान अली के जीवन और शैक्षणिक सेवाओं पर तैयार की गई आधुनिक तकनीक से सुसज्जित डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बड़ी स्क्रीन पर प्रदर्शित की गई, जिसे उपस्थित लोगों ने खूब सराहा।

कुरआन का संदेश किसी विशेष कौम, क्षेत्र या युग तक सीमित नहीं, बल्कि कयामत तक पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है: डॉ. हकीम इलाही

विद्वानों और धार्मिक विद्यार्थियों की विशेष बैठक

कार्यक्रम के समापन पर मदरसा सुलैमानीयह के पुस्तकालय सभागार में बिहार के विद्वानों और इमामिया खतीबों की एक विशेष बैठक भी आयोजित की गई। इस बैठक में डॉ. हकीम इलाही ने विद्वानों, धार्मिक शिक्षा प्राप्त कर चुके लोगों और विद्यार्थियों को उनके शैक्षणिक, धार्मिक तथा सामाजिक कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के संबंध में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया।

कुल मिलाकर, यह संगोष्ठी हाफिज़ मौलाना फरमान अली की शैक्षणिक और धार्मिक सेवाओं को श्रद्धांजलि अर्पित करने, मदरसा सुलैमानीयह पटना के शैक्षणिक इतिहास को सुरक्षित रखने तथा कुरआन मजीद के संदेश को आम लोगों तक पहुंचाने की दिशा में एक सफल और यादगार आयोजन साबित हुई।

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