ख़ुरासान रज़वी प्रांत में वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि और मशहद मुक़द्दस के इमाम जुमा आयतुल्लाह सय्यद अहमद अलमुलहुदा ने कहा कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष केवल एक राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि कुरआन और इस्लाम की शिक्षाओं के अनुसार प्रत्येक मुसलमान की निश्चित धार्मिक और सामाजिक ज़िम्मेदारी है। अत्याचारियों और साम्राज्यवादी शक्तियों के सामने ख़ामोश रहना या उनके विरुद्ध संघर्ष से पीछे हटना वास्तव में उनकी शक्ति और वर्चस्व को मज़बूत करने के समान है।
आयतुल्लाह अलमुलहुदा ने हरम इमाम रज़ा (अ) के सम्मेलन हॉल में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘शहीद इमाम की विचारधारा में साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष’ को संबोधित करते हुए कहा कि ईश्वर के मार्ग में शहीद होने वाले मुजाहिदों की कुर्बानियां हमें दुश्मन के मुकाबले में डटे रहने और इस संघर्ष को लगातार जारी रखने का पाठ पढ़ाती हैं। साम्राज्यवाद के विरुद्ध आंदोलन में किसी भी स्तर पर ठहराव नहीं आना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इस्लाम में सामाजिक ज़िम्मेदारियों और धार्मिक कर्तव्यों का बहुत अधिक महत्व है, लेकिन कभी-कभी मुसलमान व्यक्तिगत इबादत और अपने निजी शरई मसलों पर अधिक ध्यान देते हैं, जबकि धर्म और समाज की रक्षा से जुड़ी अपनी सामूहिक ज़िम्मेदारियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
मशहद के इमाम जुमा ने कुरआन मजीद की इस आयत का हवाला देते हुए कहा:
“और उन लोगों की ओर न झुको, जिन्होंने अत्याचार किया है, अन्यथा तुम्हें भी आग आ पकड़ेगी।”
उन्होंने कहा कि इस आयत में अत्याचारियों की ओर झुकाव रखने से मना किया गया है। इसका अर्थ केवल अत्याचारियों पर भरोसा न करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी शक्ति और सत्ता को मज़बूत करने या उन्हें समाज पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का अवसर देने से बचना भी इसमें शामिल है।
आयतुल्लाह अलमुलहुदा ने आगे कहा कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष से पीछे हटना वास्तव में अत्याचारियों की शक्ति को मज़बूत करने के समान है। इसलिए मुसलमानों को हर परिस्थिति में इस धार्मिक कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
उन्होंने इस्लामी क्रांति के संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि इमाम ख़ुमैनी (रह.) ने ऐसे समय में अमेरिका के विरुद्ध आवाज़ उठाई, जब वह पूरी दुनिया में अत्यंत शक्तिशाली था। लेकिन लगातार संघर्ष के परिणामस्वरूप आज उसकी वैश्विक स्थिति पहले जैसी नहीं रही। यह अल्लाह की सुन्नत है कि जब राष्ट्र अत्याचारी शक्तियों के सामने झुकने से इनकार कर देते हैं, तो अंततः उनका संघर्ष सफलता प्राप्त करता है।
उन्होंने कहा कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष की शुरुआत एक नारे से भी हो सकती है, लेकिन यदि कोई राष्ट्र अपने संकल्प और इरादे पर अडिग रहे, तो यही संघर्ष बड़ी सफलता का माध्यम बन सकता है।
अंत में आयतुल्लाह अलमुलहुदा ने सम्मेलन में शामिल विद्वानों, बुद्धिजीवियों और विभिन्न देशों से आए प्रतिरोध मोर्चे के प्रतिनिधियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने इमाम महदी (अ.ज.) के प्रकट होने तथा इस्लामी क्रांति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी (रह.) और शहीद रहबर की आत्माओं की शांति के लिए भी दुआ की।