हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मुहम्मद शरीफियान ने कहा कि कठिन परिस्थितियों और दुश्मनों के मुकाबले के समय इंसान के ईमान की वास्तविकता सामने आती है। कुछ लोग दबाव और धमकियों के सामने संदेह में पड़ जाते हैं, जबकि सच्चे मोमिन अल्लाह के साथ किए गए अपने वादे पर मज़बूती से कायम रहते हैं।
हुज्जतुल इस्लाम शरीफियान ने सोमवार की रात हरम-ए-हज़रत फातिमा मासूमा (स.ल.) में आयोजित धार्मिक सभा को संबोधित करते हुए हक और बातिल के बीच संघर्ष का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मोमिनों की सफलता के सबसे महत्वपूर्ण आधारों में इस्तिकामत (दृढ़ता) और अल्लाह पर भरोसा शामिल हैं। मोमिनों और दुश्मनों के बीच मूल अंतर केवल भौतिक संसाधनों और ताकत का नहीं, बल्कि ईश्वरीय शक्ति पर भरोसे का है।
उन्होंने वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों और इस्लामी जगत के विरुद्ध दुश्मनों के गठबंधन की तुलना इस्लाम के शुरुआती दौर की जंगे अहज़ाब से करते हुए कहा कि जिस तरह उस समय दुश्मनों ने पैगंबर-ए-इस्लाम (स.ल.) का मुकाबला करने के लिए एकजुट होकर मोर्चा बनाया था, उसी तरह आज भी इस्लाम के विस्तार और इस्लामी क्रांति के प्रभाव से चिंतित शक्तियां अपने तमाम संसाधनों के साथ हक के मोर्चे का मुकाबला कर रही हैं।
सूरह अहज़ाब की आयतों की व्याख्या करते हुए उन्होंने मुस्लिम समाज को तीन वर्गों में विभाजित किया—मुनाफिक, कमजोर ईमान वाले और दृढ़ विश्वास रखने वाले मोमिन। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों और दुश्मनों के सामने आने पर इंसान के ईमान की असलियत उजागर होती है।
कुछ लोग दबाव देखकर संदेह में पड़ जाते हैं, जबकि सच्चे मोमिन अपने ईश्वरीय वादे से पीछे नहीं हटते। उन्होंने सूरह अहज़ाब की आयत 21 का हवाला देते हुए पैगंबर-ए-अकरम (स.ल.) को प्रतिरोध और दृढ़ता का सर्वोत्तम आदर्श बताया तथा जंगे बद्र की विजय का उल्लेख करते हुए कहा कि अल्लाह की सहायता केवल भौतिक गणनाओं और सैन्य ताकत पर निर्भर नहीं होती। अल्लाह कठिन परिस्थितियों में अपने ईमान वाले बंदों की मदद करता है।
हुज्जतुल इस्लाम शरीफियान ने कहा कि विजय के लिए ईमान, सब्र और इस्तिकामत आवश्यक हैं। अल्लाह अपने बंदों को विभिन्न परीक्षाओं से गुजारता है, ताकि उनके ईमान और वादे के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट हो सके। उन्होंने हज़रत फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ.स.) के समर्थन और उनकी इमामत की रक्षा में निभाई गई भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि हज़रत ज़हरा (स.ल.) ने केवल अपनी आस्था का इज़हार नहीं किया, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी अपने वादे पर कायम रहीं।
आज के समाज को भी हक के मोर्चे का समर्थन करने और मोमिनों की सहायता के लिए अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि अल्लाह की मदद का वादा निश्चित है, लेकिन इसके लिए मोमिनों का दबावों और धमकियों के सामने मजबूती से डटे रहना और सत्य के रास्ते से पीछे न हटना जरूरी है।