हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद अब्दुन्नबी मौसवीफर्द ने कहा कि इंसान के विवेक और नैतिक चेतना को कमजोर करना उसे अत्याचार और निर्दोष लोगों के नरसंहार के प्रति उदासीन बना देता है। अमेरिका और इजराइली शासन के अपराधों की जड़ भी ईश्वरीय प्रकृति से दूरी और अक्ल व नैतिक विवेक की रोकने वाली शक्ति को दबाने में निहित है।
हुज्जतुल इस्लाम मौसवीफर्द ने इमाम रज़ा अ.स. के पवित्र आस्ताने कुद्स रिज़वी के इस्लामी अनुसंधान फाउंडेशन के शेख बहाई हॉल में आयोजित पश्चिम में संघर्षरत लोगों के सम्मेलन के अवसर पर दुश्मन के अमेरिका-इजराइल गठबंधन के अपराधों के दस्तावेजीकरण और कानूनी कार्रवाई के उपायों पर आयोजित एक परिचर्चा में कहा कि अल्लाह ने इंसान के भीतर अच्छाई और बुराई को पहचानने की क्षमता रखी है।
इंसान को सत्य और असत्य की पहचान के लिए किसी बाहरी मार्गदर्शक की आवश्यकता से पहले ही आंतरिक मार्गदर्शन यानी अक्ल की नेमत प्रदान की गई है। उन्होंने कहा कि अल्लाह ने दुनिया के दूर-दराज इलाकों में रहने वाले इंसानों को भी यह आंतरिक क्षमता दी है, इसलिए कोई व्यक्ति अत्याचार और न्याय के बीच अंतर पहचानने में पूरी तरह असमर्थ होने का दावा नहीं कर सकता।
उन्होंने इमाम जाफर सादिक (अ.स.) की एक हदीस का हवाला देते हुए बताया कि इमाम ने अक्ल की वास्तविकता बताते हुए फरमाया कि अक्ल वह शक्ति है जिसके माध्यम से इंसान रहमान अल्लाह की इबादत करता है और जन्नत प्राप्त करता है। उन्होंने कहा कि अक्ल का काम केवल सही और गलत की पहचान करना नहीं, बल्कि उस पहचान को व्यावहारिक जीवन में उतारना भी है।
पहले इंसान अपनी सैद्धांतिक बुद्धि से सत्य और असत्य को पहचानता है, फिर व्यावहारिक बुद्धि उसे अच्छे कार्यों की ओर ले जाती है। इसके बाद इंसान के भीतर मौजूद नफ्से लौव्वामा यानी आत्म-भर्त्सना करने वाला विवेक उसके कार्यों का हिसाब करता है। उन्होंने कहा कि इंसान बाहरी अदालतों और न्यायाधीशों को रिश्वत या प्रभाव से धोखा दे सकता है, लेकिन अपने अंतरात्मा के फैसले से नहीं बच सकता। नेक काम करने पर दिल को सुकून मिलता है, जबकि गलत काम करने पर अंतरात्मा इंसान को जवाबदेह ठहराती है।
हुज्जतुल इस्लाम मौसवीफर्द ने सूरह शम्स की आयतों का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह ने इंसान के नफ्स को बुराई और परहेजगारी की पहचान की क्षमता प्रदान की है। कुरआन में फरमाया गया है: «فَأَلْهَمَهَا فُجُورَهَا وَتَقْوَاهَا» अर्थात अल्लाह ने इंसान के नफ्स को उसकी बुराई और तकवा का ज्ञान प्रदान किया। इसके बाद फरमाया: «قَدْ أَفْلَحَ مَنْ زَكَّاهَا وَقَدْ خَابَ مَنْ دَسَّاهَا» अर्थात जिसने अपने नफ्स को पाक किया, वह सफल हुआ और जिसने उसे बुराइयों में डुबो दिया, वह असफल हुआ।
उन्होंने कहा कि इंसान के भीतर अक्ल और नफ्से अम्मारा के बीच लगातार संघर्ष चलता रहता है। जब अक्ल इच्छाओं पर हावी होती है तो इंसान न्याय और सच्चाई के रास्ते पर चलता है, लेकिन जब वह अपनी इच्छाओं का गुलाम बन जाता है तो धीरे-धीरे उसकी नैतिक पहचान और गलत कार्यों पर पछतावा करने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
उन्होने कहां,अमेरिका और इजराइली शासन के अपराधों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब इंसान अपनी ईश्वरीय प्रकृति, अक्ल और नैतिक विवेक से दूरी बना लेता है तो वह निर्दोष लोगों पर अत्याचार और उनके नरसंहार को देखकर भी अपनी जिम्मेदारी महसूस नहीं करता।
उन्होंने स्पष्ट किया कि बहुत से लोग अपने गलत कार्यों को बखूबी जानते हैं, लेकिन समस्या जानकारी की कमी नहीं, बल्कि अपनी जानकारी पर अमल न करना और इच्छाओं के आगे झुक जाना है।
उन्होंने समाज में नैतिक चेतना और इंसानी फितरत को जीवित रखने पर जोर देते हुए कहा कि अल्लाह ने इंसान को सत्य पहचानने, उस पर अमल करने और अपनी गलतियों का आत्म-मूल्यांकन करने की तीन महत्वपूर्ण क्षमताएं दी हैं। यदि ये तीनों क्षमताएं सक्रिय रहें तो इंसान सत्य को पहचानकर उस पर अमल करेगा और गलती होने पर पश्चाताप व तौबा के जरिए अपने रास्ते को सुधार सकेगा।