मौलाना सय्यद महदी अब्बास जैदी ने अपने जुमे के ख़ुत्बे में फ़ातिमी जीवन के एक महत्वपूर्ण पहलू यानी घर और परिवार की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि क़ुरआने मजीद ने वैवाहिक जीवन के बुनियादी उद्देश्यों में से एक उद्देश्य सुकून को बताया है। इसका अर्थ यह है कि घर केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ इंसान को प्रेम, सम्मान और मानसिक शांति मिले।
मौलाना सय्यद महदी अब्बास जैदी ने अपने जुमे के ख़ुत्बे में फ़ातिमी जीवन के एक महत्वपूर्ण पहलू यानी घर और परिवार की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि क़ुरआने मजीद ने वैवाहिक जीवन के बुनियादी उद्देश्यों में से एक उद्देश्य सुकून को बताया है। इसका अर्थ यह है कि घर केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ इंसान को प्रेम, सम्मान और मानसिक शांति मिले।
आज हमारे घरों में पहले की तुलना में सुविधाएँ अधिक हैं, लेकिन क्या हमारे जीवन में सुकून भी बढ़ा है? कुछ घरों में संसाधनों की कोई कमी नहीं होती, फिर भी छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होते हैं। एक-दूसरे की बात नहीं सुनी जाती, अपनी गलती स्वीकार करना अपमान समझा जाता है और छोटी-छोटी शिकायतें दिलों के बीच दूरियाँ पैदा कर देती हैं।
ऐसी परिस्थितियाँ तब पैदा होती हैं, जब इंसान इस्लामी आदर्शों और सभ्यता को अपनाने के बजाय उन्हें अपने लिए अपमान और पिछड़ेपन का कारण समझने लगता है। उसे लगता है कि यदि वह इस्लामी नियमों और शिक्षाओं का पालन करेगा, तो समाज में पिछड़ा हुआ समझा जाएगा। जबकि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) और अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.) का पारिवारिक जीवन हमारे लिए एक महत्वपूर्ण आदर्श है।
घराने की फ़ातेमी बुनयाद
हज़रत अली (अ.) और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स.) का घर भौतिक सुख-सुविधाओं के लिहाज़ से कोई असाधारण घर नहीं था, लेकिन ईमान, प्रेम और ज़िम्मेदारी के मामले में वह एक आदर्श घराना था। अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.) से रिवायत है:
فَوَاللَّهِ مَا أَغْضَبْتُهَا وَلَا أَكْرَهْتُهَا عَلَى أَمْرٍ حَتَّى قَبَضَهَا اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ، وَلَا أَغْضَبَتْنِي وَلَا عَصَتْ لِي أَمْرًا
“ख़ुदा की क़सम! मैंने फ़ातेमा (स.) को कभी नाराज़ नहीं किया और न ही उन्हें किसी काम के लिए मजबूर किया, यहाँ तक कि अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल ने उन्हें अपने पास बुला लिया। उन्होंने भी मुझे कभी नाराज़ नहीं किया और न ही मेरे किसी आदेश की अवहेलना की।”
इस रिवायत से पारिवारिक जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है और वह है एक-दूसरे का सम्मान करना तथा एक-दूसरे का दिल दुखाने से बचना।
ग़ौर कीजिए कि सफल वैवाहिक जीवन के लिए केवल प्रेम का इज़हार पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने व्यवहार से भी प्रेम साबित करना आवश्यक है। यदि पति-पत्नी एक-दूसरे का सम्मान करें, एक-दूसरे की कठिनाइयों को समझें और मतभेद होने के बावजूद शालीनता बनाए रखें, तो घर में सुकून और शांति का माहौल पैदा होता है।
ज़िम्मेदारियों में सहयोग, सुखी जीवन का बुनयादी पहलू
हज़रत अली (अ.) और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स.) के पारिवारिक जीवन से संबंधित रिवायतों में घरेलू ज़िम्मेदारियों के बँटवारे का भी उल्लेख मिलता है। इन रिवायतों से हमें यह शिक्षा मिलती है कि घर की ज़िम्मेदारियाँ आपसी समझ-बूझ और सहयोग से निभाई जानी चाहिए।
घर के काम हों या घर से बाहर की ज़िम्मेदारियाँ, दोनों में मेहनत और समय लगता है। किसी एक की मेहनत को मामूली समझना उचित नहीं है। कभी-कभी घर में मतभेद इसलिए पैदा होते हैं कि एक व्यक्ति अपनी मेहनत को बहुत महत्वपूर्ण समझता है, लेकिन दूसरे की मेहनत को नज़रअंदाज़ कर देता है। जबकि घर एक साझा जीवन है।
जहाँ हर व्यक्ति केवल अपने अधिकारों की माँग करे और दूसरे की ज़िम्मेदारियों तथा कठिनाइयों को न समझे, वहाँ प्रेम कमज़ोर पड़ने लगता है। इसके विपरीत, जहाँ एक-दूसरे की मेहनत की क़द्र की जाती है, वहाँ रिश्ते मज़बूत होते हैं।
घर में अच्छे आचरण की परीक्षा
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) से रिवायत है:
خَيْرُكُمْ خَيْرُكُمْ لِأَهْلِهِ
“तुममें सबसे बेहतर वह है, जो अपने घरवालों के साथ सबसे अच्छा व्यवहार करता है।”
यह हदीस हमारे नैतिक आचरण का एक महत्वपूर्ण मापदंड बताती है। कुछ लोग घर से बाहर बहुत अच्छे व्यवहार वाले होते हैं। दोस्तों से नरमी से बात करते हैं और मेहमानों का सम्मान करते हैं, लेकिन घर में छोटी-सी बात पर ग़ुस्सा हो जाते हैं। जबकि घरवाले हमारे अच्छे व्यवहार और प्रेम के सबसे अधिक हक़दार हैं।
कभी-कभी हम यह समझते हैं कि घर में हर बात हमारी इच्छा के अनुसार होनी चाहिए, लेकिन वैवाहिक जीवन में केवल अपनी इच्छा चलाना सफलता नहीं है। वास्तविक सफलता यह है कि मतभेद होने के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान बना रहे। ग़ुस्सा आए तो ज़बान पर नियंत्रण रखा जाए, गलती हो जाए तो माफ़ी माँगने में संकोच न किया जाए और दूसरे की अच्छी बात को स्वीकार करने में कंजूसी न की जाए।
जब पारिवारिक रिश्तों में आपसी सहयोग और तालमेल होगा, तो घर में आज की तरह की भौतिक सुविधाएँ उपलब्ध न होने पर भी इंसान अपने आसपास सुकून और संतुष्टि महसूस करेगा। इसी कारण इस्लाम ने आपसी सहयोग और एक-दूसरे के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार को पसंदीदा अमल बताया है। एक-दूसरे का साथ देना चाहिए, क्योंकि प्रेम और सद्भाव से ही समाज का विकास होता है।
ख़ुत्बे के अंत में मौलाना सय्यद महदी अब्बास जैदी ने मरहूम मौलाना अकील तुराबी की सेवाओं का उल्लेख करते हुए उनके धार्मिक और सामाजिक योगदान से लोगों को अवगत कराया। उन्होंने मरहूम के लिए मग़फ़िरत की दुआ कराई। साथ ही मरजअ-ए-आलम-ए-तशय्यो आयतुल्लाहिल उज़्मा आगा वहीद ख़ुरासानी के स्वास्थ्य और शीघ्र स्वस्थ होने के लिए भी दुआ कराई।