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ईद ए ग़दीर: मासूमीन अलैहिमुस्सलाम की हदीसों की रौशनी में

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ईद ए ग़दीर: मासूमीन अलैहिमुस्सलाम की हदीसों की रौशनी में

ईद ए ग़दीर के बारे में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया,इस दिन (ईद-ए-ग़दीर) में किया गया एक नेक काम अस्सी (80) महीनों की इबादत के बराबर सवाब रखता है। उचित है कि इस दिन अल्लाह तआला का अधिक से अधिक ज़िक्र किया जाए, तथा हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम और आले मुहम्मद अलैहिमुस्सलाम पर खूब दरूद व सलाम भेजा जाए। साथ ही, इंसान को चाहिए कि इस दिन अपने घरवालों और परिवार पर खुलकर और उदारता के साथ ख़र्च करे

ईद ए ग़दीर के बारे में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया,इस दिन (ईद-ए-ग़दीर) में किया गया एक नेक काम अस्सी (80) महीनों की इबादत के बराबर सवाब रखता है। उचित है कि इस दिन अल्लाह तआला का अधिक से अधिक ज़िक्र किया जाए, तथा हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम और आले मुहम्मद अलैहिमुस्सलाम पर खूब दरूद व सलाम भेजा जाए। साथ ही, इंसान को चाहिए कि इस दिन अपने घरवालों और परिवार पर खुलकर और उदारता के साथ ख़र्च करे

(वसाइलुश-शिया, खंड 7, पृष्ठ 325, हदीस 6)

2. इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

ईद-ए-ग़दीर के दिन रसूल-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम ने अपने भाई, अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अलैहिस्सलाम) को लोगों के लिए हिदायत का निशान (मार्गदर्शक) और अपने बाद इमाम के रूप में परिचित कराया।

अबू इस्हाक़ ने अर्ज़ किया,मेरे माँ-बाप आप पर क़ुर्बान हों, आपने बिल्कुल हक़ फ़रमाया। मैं इसी उद्देश्य से आपकी ज़ियारत और मुलाक़ात के लिए उपस्थित हुआ हूँ। मैं गवाही देता हूँ कि आप लोगों पर अल्लाह तआला की हुज्जत (प्रमाण और प्रतिनिधि) हैं।
( वसाइलुश-शिया, खंड 7, पृष्ठ 324, हदीस 3)

3. इमाम अली रज़ा (अलैहिस्सलाम) ने फ़रमाया:

जो व्यक्ति ईद-ए-ग़दीर के दिन किसी मोमिन से मुलाक़ात करता है, अल्लाह तआला उसकी क़ब्र में सत्तर (70) नूर दाख़िल फ़रमाता है, उसकी क़ब्र को विस्तृत और आरामदायक बना देता है, और हर दिन सत्तर हज़ार फ़रिश्ते उसकी क़ब्र की ज़ियारत करते हैं तथा उसे जन्नत की शुभ सूचना (बशारत) देते हैं।

(इक़बालुल आमाल, पृष्ठ 778)

4. इमाम जाफ़र सादिक़ (अलैहिस्सलाम) ने फ़रमाया:

उचित है कि तुम भलाई और एहसान, रोज़ा, नमाज़, रिश्तेदारों से अच्छे संबंध (सिलए-रहमी) और अपने दीनी भाइयों से मुलाक़ात के माध्यम से अल्लाह तआला का क़ुर्ब हासिल करो। क्योंकि अंबिया  अलैहिमुस्सलाम जब अपने ख़लीफा मुक़र्रर(उत्तराधिकारी नियुक्त) करते थे, तो वे भी इसी तरह अमल करते थे और इन्हीं कार्यों की तालीम दिया करते थे।

( मिस्बाहुल-मुतहज्जिद, पृष्ठ 736)

5. इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

मस्जिद-ए-ग़दीर में नमाज़ पढ़ना मुस्तहब (सवाब का काम) है, क्योंकि यह वही स्थान है जहाँ पैग़म्बर-ए-इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम ने अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम को लोगों के सामने परिचित कराया और उन्हें अपना ख़लीफा (उत्तराधिकारी) और वली नियुक्त किया था।
यह वह पवित्र जगह भी है जहाँ अल्लाह तआला ने हक़ (सत्य) को स्पष्ट और ज़ाहिर किया। (वसाइलुश-शिया 3: 549)

6. इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

जो व्यक्ति ईद-ए-ग़दीर के दिन किसी भी समय दो रकअत नमाज़ पढ़े, तो उसे इसका सवाब मिलेगा। बेहतर यह है कि वह इसे ज़ुहर के समय के करीब पढ़े, क्योंकि उसी समय ग़दीर-ए-ख़ुम में इमाम अली अलैहिस्सलाम को इमामत के पद पर नियुक्त किया गया था।ऐसे व्यक्ति को इतना बड़ा सवाब मिलेगा कि जैसे वह स्वयं उस महान ग़दीर के इज्तिमा (सभा) में मौजूद रहा हो। (वसाइलुश-शिया 5: 225, हदीस 2)

7.इमाम जाफर सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

ग़दीर-ए-ख़ुम के दिन का रोज़ा पूरी दुनिया की उम्र भर के रोज़ों के बराबर सवाब रखता है। अगर कोई इंसान उतनी लंबी उम्र पाए जितनी दुनिया बाक़ी रहे, और वह पूरी उम्र रोज़े रखता रहे, तो उसे जो सवाब मिलेगा, वही सवाब ईद-ए-ग़दीर के एक दिन के रोज़े का है। (वसाइलुश-शिआ 7: 324, हदीस 4)

8. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने फ़रमाया

जो व्यक्ति मेरी तरह जीवन जीना चाहता है, मेरी तरह दुनिया से जाना चाहता है, और उस हमेशा रहने वाली जन्नत में बसना चाहता है जिसका मेरे रब ने मुझसे वादा किया है, उसे चाहिए कि वह अमीरुल मोमिनीन इमाम अली इब्न अबी तालिब (अलैहिस्सलाम) की विलायत और उनकी पैरवी को अपनाए। क्योंकि वे तुम्हें कभी हिदायत के रास्ते से नहीं हटाएंगे और न ही गुमराही में जाने देंगे।
(अल ग़दीर, 2, 278)

9. जनाब जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी (रज़ि.) से रिवायत है कि उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम को इमाम अली बिन अबी तालिब अलैहिस्सलाम से यह फरमाते हुए सुना:

“ऐ अली! तुम मेरे भाई हो, मेरे वसी (उत्तराधिकारी) हो, मेरे वारिस हो और मेरी उम्मत पर मेरे जीवन में भी और मेरे बाद भी मेरे ख़लीफ़ा हो। जो तुमसे मोहब्बत करेगा, वह मुझसे मोहब्बत करेगा; जो तुमसे दुश्मनी रखेगा, वह मुझसे दुश्मनी रखेगा; और जो तुम्हारा दुश्मन होगा, वह मेरा दुश्मन होगा।” (आमाली-ए-शैख़ सदूक़: 124, हदीस 5)

10. इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने फरमाया:

“इस्लाम पाँच बुनियादों पर क़ायम है: नमाज़, ज़कात, रोज़ा, हज और विलायत। और जितनी ज़ोर देकर विलायत के बारे में आदेश दिया गया है, उतना किसी और धार्मिक आदेश के बारे में नहीं दिया गया, खास तौर पर ग़दीर के दिन।” (अल-काफ़ी 2:21, हदीस 8)

11. इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने फरमाया:

“अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम की विलायत सभी नबियों के आसमानी सहीफों (ग्रंथों) में लिखी हुई है, और अल्लाह ने किसी भी रसूल को इस तरह नहीं भेजा कि वह हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की नुबूवत और इमाम अली अलैहिस्सलाम की विसायत (उत्तराधिकार) का इक़रार किए बिना भेजा गया हो।” (सफीनतुल बिहार 2:691)

12. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने फरमाया:

“अमीरुल मोमिनीन इमाम अली बिन अबी तालिब अलैहिस्सलाम की विलायत असल में अल्लाह की विलायत है। उनसे मोहब्बत करना अल्लाह की इबादत है, और उनकी पैरवी करना अल्लाह का तय किया हुआ फ़र्ज़ है। उनके दोस्त अल्लाह के दोस्त हैं और उनके दुश्मन अल्लाह के दुश्मन हैं। उनसे जंग करना अल्लाह से जंग करना है, और उनसे सुलह और दोस्ती करना अल्लाह से सुलह और दोस्ती करना है।” (आमाली-ए-शैख़ सदूक़: 32)

13. इमाम जाफ़र सादिक अलैहिस्सलाम अपने वालिद (पिता) इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम से रिवायत करते हैं कि उन्होंने फरमाया:

“अल्लाह का दुश्मन शैतान (इबलीस) चार बार जोर से रोया और चीख मारी: पहला दिन जब उस पर लानत की गई, दूसरा दिन जब उसे ज़मीन पर उतारा गया, तीसरा दिन जब नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम को नबी बनाया गया (यौमे बेअसत), और चौथा दिन ईद-ए-ग़दीर का दिन था।” (क़ुरबुल-इसनाद: 10)

14. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम से रिवायत है कि अल्लाह तआला फरमाता है:

“अली बिन अबी तालिब (अलैहिस्सलाम) की विलायत मेरा मज़बूत क़िला है। जो भी इस क़िले में दाख़िल हो जाता है, वह मेरे अज़ाब (जहन्नम की आग) से सुरक्षित हो जाता है।” (जामिउल-अख़बार: 52, हदीस 7)

15. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने फरमाया:

“ऐ अली! मैं इल्म का शहर हूँ और तुम उसका दरवाज़ा हो, और शहर में दाख़िल होने के लिए दरवाज़े से ही आना पड़ता है। तुम मेरी उम्मत के इमाम हो और मेरे बाद उनके ख़लीफ़ा हो। खुशक़िस्मत है वह व्यक्ति जो तुम्हारी आज्ञा का पालन करे, और बदनसीब है वह जो तुम्हारी नाफ़रमानी करे। कामयाब है वह जो तुम्हारी विलायत और मोहब्बत अपनाए, और घाटे में है वह जो तुमसे दुश्मनी रखे।” (जामिउल-अख़बार: 52, हदीस 9)

16. इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फरमाया:

“इस्लाम की बुनियाद तीन चीज़ों पर क़ायम है: नमाज़, ज़कात और विलायत। इनमें से कोई एक भी दूसरी दो के बिना सही और स्वीकार नहीं होती।” (अल-काफ़ी, भाग 2, पृष्ठ 18)

17. इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फरमाया:

“ऐ हफ़्स! यह बड़ी हैरत की बात है कि अमीरुल मोमिनीन इमाम अली बिन अबी तालिब अलैहिस्सलाम के हक़ में दस हज़ार गवाह मौजूद थे, फिर भी वे अपना हक़ वापस न ले सके; जबकि एक साधारण आदमी केवल दो गवाहों के आधार पर अपना हक़ हासिल कर लेता है।” (बिहारुल अनवार, खंड 37, पृष्ठ 140)

18. रसूल-ए-ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने ग़दीर के दिन अपने ख़ुत्बे में फरमाया:

अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम अल्लाह की किताब (क़ुरआन) की तफ़्सीर करने वाले और लोगों को अल्लाह की ओर बुलाने वाले हैं। सुन लो! हलाल और हराम के अहकाम (आदेश) इतने अधिक हैं कि मैं इस एक अवसर पर उन सबको न गिना सकता हूँ और न ही एक-एक का विवरण दे सकता हूँ।

इसलिए मुझे आदेश दिया गया है कि मैं तुमसे यह वचन और बैअत लूँ कि तुम अमीरुल मोमिनीन अली (अलैहिस्सलाम) और उनके बाद आने वाले इमामों (अलैहिमुस्सलाम) के बारे में अल्लाह की ओर से पहुँचाए गए मेरे संदेश को स्वीकार करोगे।
ऐ लोगो! क़ुरआन में गहराई से विचार करो, उसकी आयतों को समझो, उसकी मुहकम आयतों में चिंतन करो और केवल मुतशाबिह आयतों के पीछे न पड़ो।

अल्लाह की क़सम! क़ुरआन के आदेशों, निषेधों और उसकी वास्तविक तफ़्सीर को तुम्हारे लिए कोई स्पष्ट नहीं कर सकता, सिवाये उस हस्ती के जिसका हाथ मैंने पकड़ा हुआ है और जिसे मैंने आज तुम्हारे सामने परिचित कराया है।” (अर्थात अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम)
(वसाइलुश-शीआ, खंड 18, पृष्ठ 142, हदीस 43)

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