इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने 10 मुहर्रम 61 हिजरी को अपना सब कुछ क़ुर्बान करके यह साबित कर दिया कि दीन, हक़ और उसूलों पर कभी समझौता नहीं किया जा सकता।
लेखकः मुहम्मद अयूब हसन साबरी
इंसानी तारीख़ में हज़ारों जंगें लड़ी गईं, बेशुमार हुक्मरान आए और मिट गए। बादशाहों के नाम तारीख़ के औराक़ से महव हो गए और अज़ीम सल्तनतों के आसार भी सफ़हा-ए-हस्ती से मिट गए, लेकिन 10 मुहर्रम-उल-हराम 61 हिजरी, बमुताबिक़ 10 अक्टूबर 680 ईस्वी को इराक़ की सरज़मीन कर्बला में पेश आने वाला एक वाक़िया आज भी चौदह सदियों बाद उसी ताज़गी, उसी दर्द और उसी हरारत के साथ दिलों में ज़िंदा है। वह अज़ीम वाक़िया हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और आपके बावफ़ा असहाब की शहादत का वाक़िया है।
आख़िर इस वाक़िए में ऐसी क्या ख़ुसूसियत थी जिसने इसे अमर कर दिया? वाक़िया-ए-आशूरा आज तक क्यों ज़िंदा है? इसके मुतअद्दिद तारीख़ी, अख़लाक़ी, फिक्री और रूहानी असबाब हैं।
कर्बला के ज़िंदा रहने की सबसे बड़ी वजह यह है कि यह हक़ और बातिल के दरमियान एक वाज़ेह और फ़ैसला-कुन मुआरका था। सन 60 हिजरी में मुआविया बिन अबूसुफ़ियान की वफ़ात के बाद उसके बेटे यज़ीद ने इक़्तिदार संभाला। मुआविया ने अपनी ज़िंदगी ही में ख़िलाफ़त के निज़ाम को मौरूसी बादशाहत में तब्दील करते हुए यज़ीद को अपना वली-ए-अहद मुक़र्रर कर दिया था। यज़ीद एक फ़ासिक़ ओ फ़ाजिर, ज़ालिम और दीन की खुल्लम-खुल्ला बेहुरमती करने वाला शख्स था। जब मदीना के गवर्नर ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से यज़ीद की बैअत का मुतालबा किया तो आपने फ़रमाया: "मुझ जैसा शख्स, इस जैसे शख्स की बैअत नहीं कर सकता।"
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम 28 रजब 60 हिजरी को ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हुए मदीना से मक्का तशरीफ़ ले गए। कूफ़ा के लोगों की जानिब से हज़ारों ख़ुतूत मौसूल होने पर आप 8 ज़िलहिज्जा को उम्मत की इस्लाह के मक़सद से कूफ़ा की तरफ़ रवाना हुए। रास्ते में मालूम हुआ कि कूफ़ा वालों ने बेवफ़ाई की है और हज़रत मुस्लिम बिन अकील अलैहिस्सलाम को शहीद कर दिया गया है। 2 मुहर्रम 61 हिजरी को आपका मुख़्तसर क़ाफ़िला कर्बला की बे-आब-ओ-गिया सरज़मीन पर पहुँचा। उम्र बिन साद की क़यादत में हज़ारों का लश्कर आपके मुक़ाबिल आ खड़ा हुआ। 7 मुहर्रम को आप, आपके अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम और साथियों पर पानी बंद कर दिया गया। मुज़ाकरात की तमाम राहें मसदूद कर दी गईं। बिल-आख़िर 10 मुहर्रम को जंग का आग़ाज़ हुआ।
कर्बला के अमर होने की दूसरी वजह इसकी बे-मिसाल क़ुर्बानी और मज़लूमियत है। तारीख़ में ऐसी क़ुर्बानी की मिसाल बहुत कम मिलती है। आशूरा की सुबह से अस्र तक एक-एक करके वफ़ादार जान-निसार शहीद होते गए। हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम मैदान में उतरे और जाम-ए-शहादत नूश किया। इसके बाद हज़रत क़ासिम बिन हसन अलैहिस्सलाम शहीद हुए। हज़रत अब्बास अलमदार अलैहिस्सलाम फुरात से पानी लाने गए और अपने दोनों बाज़ू क़ुर्बान करके शहादत पाई। हज़रत अली असग़र अलैहिस्सलाम, जो सिर्फ़ छः महीने के शीर-ख़्वार थे, प्यास की हालत में तीर का निशाना बने। आख़िर में हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम खुद मैदान में तशरीफ़ लाए और बे-मिसाल शुजाअत के साथ लड़ते हुए जाम-ए-शहादत नूश फ़रमाया। इसके बाद आपका सर-ए-मुबारक नेज़े पर बुलंद किया गया। 11 मुहर्रम को ख़ेमों को आग लगा दी गई और अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम की ख़वातीन और बच्चों को असीर बनाकर पहले कूफ़ा और फिर शाम ले जाया गया। ऐसी अज़ीम मज़लूमियत को इंसानी ज़मीर कभी फ़रामोश नहीं कर सकता।
वाक़िया-ए-कर्बला के ज़िंदा रहने की तीसरी वजह इसका अबदी और आलमगीर पैग़ाम है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "हैहात मिन्ना ज़िल्ला", यानी ज़िल्लत को क़ुबूल करना हमसे बहुत दूर है। आपके सामने दो रास्ते थे; एक यह कि यज़ीद की बैअत करके ज़ाहिरी सुकून और आसाइश इख़्तियार कर लेते, और दूसरा यह कि हक़ की ख़ातिर हर क़ुर्बानी पेश कर देते। आपने हक़ का रास्ता इख़्तियार किया। यही पैग़ाम आज भी दुनिया भर के मज़लूमों को ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डट जाने का हौसला देता है। इसी लिए जब भी कोई क़ौम ज़ुल्म ओ इस्तिबदाद के ख़िलाफ़ क़ियाम करती है तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सीरत से रहनुमाई हासिल करती है।
चौथी वजह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का अज़ीम मक़सद है। आपने फ़रमाया: "मैं फ़साद और सरकशी के लिए नहीं निकला, बल्कि अपने नाना की उम्मत की इस्लाह के लिए निकला हूँ।" अगर उस दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ख़ामोशी इख़्तियार कर लेते और यज़ीद की बैअत कर लेते तो इस्लाम की हक़ीक़ी तालीमात मसख़ हो जातीं। आपने अपने मुक़द्दस ख़ून से इस्लाम की असली रूह और उसकी क़द्रों को महफ़ूज़ कर दिया। इसी हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करते हुए अहल-ए-इल्म ने कहा है कि इस्लाम की बक़ा में कर्बला का बुनियादी किरदार है।
पाँचवीं और निहायत अहम वजह इस वाक़िए का मुसलसल ज़िंदा रहना है। मोरक्खिनों ने इसे तफ़सील से क़लमबंद किया, उलमा और खुतबा ने हर साल मुहर्रम में इसे बयान किया, शोरा ने मरसियों और नौहों के ज़रिए इसकी याद ताज़ा रखी और माओं ने अपनी नस्लों को कर्बला का पैग़ाम मुंतक़िल किया। जब कोई क़ौम अपने अज़ीम वाक़िआत को मुसलसल याद रखती है तो वह तारीख़ का हिस्सा नहीं बल्कि ज़िंदा हक़ीक़त बन जाते हैं।
इस से यह नतीजा निकलता है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने 10 मुहर्रम 61 हिजरी को अपना सब कुछ क़ुर्बान करके यह साबित कर दिया कि दीन, हक़ और उसूलों पर कभी समझौता नहीं किया जा सकता। कर्बला आज भी इंसानियत से यह सवाल करती है: क्या तुम ज़ुल्म देखकर ख़ामोश रहोगे? क्या तुम हक़ के लिए क़ुर्बानी देने का हौसला रखते हो? क्या तुम्हारी ज़िंदगी उसूलों पर क़ाएम है या मफ़ादात पर?
जब तक दुनिया में ज़ुल्म, जबर और नाइंसाफ़ी मौजूद रहेगी, लोग इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से हिम्मत, हौसला और इस्तिक़ामत हासिल करते रहेंगे। इसी लिए वाक़िया-ए-आशूरा आज भी ज़िंदा है और क़यामत तक ज़िंदा रहेगा।
अस्सलामु अलैका या अबा अब्दिल्लाहिल हुसैन अलैहिस्सलाम