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हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की हिजरत; क़ुम शियो का केंद्र कैसे बना?

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हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की हिजरत; क़ुम शियो का केंद्र कैसे बना?

हज़रत फ़ातिमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा की ईरान हिजरत केवल एक ऐतिहासिक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह उन लोगों की लंबी हिजरत का एक महत्वपूर्ण चरण थी, जो अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से प्रेम करते थे और अत्याचार तथा दमन के दौर में अपने ईमान और जान की रक्षा के लिए अलग-अलग क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे थे। हज़रत मासूमा (स) के क़ुम आगमन और वहीं निधन के बाद यह शहर अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की शिक्षाओं, ज्ञान और धार्मिक विचारों का ऐसा केंद्र बन गया, जिसकी प्रसिद्धि आज पूरी दुनिया में है।

 हज़रत फ़ातिमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा की ईरान हिजरत केवल एक ऐतिहासिक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह उन लोगों की लंबी हिजरत का एक महत्वपूर्ण चरण थी, जो अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से प्रेम करते थे और अत्याचार तथा दमन के दौर में अपने ईमान और जान की रक्षा के लिए अलग-अलग क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे थे। हज़रत मासूमा (स) के क़ुम आगमन और वहीं निधन के बाद यह शहर अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की शिक्षाओं, ज्ञान और धार्मिक विचारों का ऐसा केंद्र बन गया, जिसकी प्रसिद्धि आज पूरी दुनिया में है।

एक लंबे ऐतिहासिक सिलसिले की कड़ी

हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की क़ुम हिजरत को समझने के लिए उस समय के राजनीतिक और सामाजिक हालात को समझना ज़रूरी है। अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से प्रेम करने वाले लोगों का ईरान की ओर हिजरत का सिलसिला पहली सदी हिजरी से ही शुरू हो गया था। उमवी शासन के दौर में विशेष रूप से हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम और उनके परिवार से प्रेम रखने वाले बहुत से लोगों को इराक़ और शाम से दूर इलाक़ों में भेज दिया गया था। इस नीति का एक उद्देश्य अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के समर्थकों को उन केंद्रों से दूर करना था, जहाँ से वे शासन के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकते थे।

हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की हिजरत; क़ुम कैसे बना तशय्यु का केंद्र?

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के दौर में हज्जाज बिन यूसुफ़ के अत्याचार और दमन ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। बहुत से शिया और अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से प्रेम करने वाले लोगों ने अपनी जान और ईमान की रक्षा के लिए ईरान का रुख किया। इस तरह ईरान में अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से प्रेम रखने वाली आबादी धीरे-धीरे बढ़ती गई।

इसी सिलसिले में क़ुम को भी विशेष महत्व प्राप्त हुआ। अशअरी परिवार के कुछ लोग, जो अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से गहरी श्रद्धा रखते थे, यहाँ आकर बस गए। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि किसी पूरे क़बीले को एक ही राजनीतिक या धार्मिक विचारधारा का समर्थक मानना सही नहीं है। बड़े क़बीलों में अलग-अलग राजनीतिक और धार्मिक विचार पाए जाते थे।

हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की हिजरत; क़ुम कैसे बना तशय्यु का केंद्र?

क़ुम; शियो का केंद्र

ऐतिहासिक रिवायतों के अनुसार, अशअरी परिवार के कुछ लोग शुरुआत में इस्फ़हान की ओर जा रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने क़ुम में निवास कर लिया। इस बदलाव का एक संभावित कारण यह बताया जाता है कि उस समय क़ुम अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के अनुयायियों के लिए अधिक अनुकूल वातावरण रखता था, जबकि इस्फ़हान में अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के विरोधी कुछ समूहों का प्रभाव अधिक था।

समय बीतने के साथ क़ुम अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के ज्ञान और धार्मिक शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। इमाम मुहम्मद बाक़िर और इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिमस्सलाम के दौर में क़ुम के अनेक लोग अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के विद्यालय से जुड़े और ज्ञान तथा हदीस के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

क़ुम की यही धार्मिक पहचान बाद के दौर में भी बनी रही। अब्बासी शासन के लिए भी क़ुम ऐसा शहर था, जहाँ अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से प्रेम और शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की भावना मजबूत थी। ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि शासकों को यहाँ के लोगों के साथ व्यवहार करते समय विशेष सावधानी बरतनी पड़ती थी।

हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की हिजरत; क़ुम कैसे बना तशय्यु का केंद्र?

हज़रत मासूमा (स) की ईरान हिजरत

इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में हज़रत फ़ातिमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के ईरान आगमन को देखा जा सकता है। कुछ ऐतिहासिक रिवायतों के अनुसार, इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम ने अपनी बहन को मर्व आने का निमंत्रण दिया था। उस समय मामून अब्बासी ऊपरी तौर पर अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से निकटता और प्रेम का प्रदर्शन कर रहा था, लेकिन उसके व्यवहार के संबंध में शिया ऐतिहासिक रिवायतों में गंभीर आपत्तियाँ मिलती हैं।

हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की हिजरत; क़ुम कैसे बना तशय्यु का केंद्र?

हज़रत मासूमा (स) अपने भाइयों और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ ईरान की ओर रवाना हुईं। इस कारवां के आगमन ने अब्बासी शासन के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया, क्योंकि यदि मामून वास्तव में अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के साथ अच्छे व्यवहार का दावा करता था, तो अलवी परिवार के लोगों के साथ भी सम्मानजनक व्यवहार किया जाना चाहिए था।

रिवायतों के अनुसार, यह कारवां रास्ते में अब्बासी शासन के अधिकारियों के हमले का शिकार हुआ और कई लोग शहीद हो गए। हज़रत मासूमा (स) ने भी इस यात्रा के दौरान बहुत से कष्ट और कठिनाइयाँ झेलीं और अंततः क़ुम पहुँचीं।

कुछ शोधकर्ता इस घटना को इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की उस रणनीति के संदर्भ में भी देखते हैं, जिसके माध्यम से मामून के दिखावटी दावों और उसके वास्तविक व्यवहार के बीच का अंतर लोगों के सामने स्पष्ट हुआ।

इमाम सादिक़ (अ) की नज़र में क़ुम का स्थान

हज़रत मासूमा (स) के क़ुम आगमन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से जुड़ी एक प्रसिद्ध रिवायत में क़ुम को अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम का हरम बताया गया है। रिवायत में है:

«إِنَّ لِلَّهِ حَرَماً وَهُوَ مَكَّةُ، وَلِرَسُولِهِ حَرَماً وَهُوَ الْمَدِينَةُ، وَلِأَمِيرِ الْمُؤْمِنِينَ حَرَماً وَهُوَ الْكُوفَةُ، وَلَنَا حَرَماً وَهُوَ بَلَدُ قُمَّ...»

अर्थात अल्लाह का एक हरम मक्का है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम का हरम मदीना है, अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम का हरम कूफ़ा है और हम अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम का हरम क़ुम है।

इसी रिवायत में फ़ातिमा नाम की एक महिला के क़ुम में दफ़्न होने का भी उल्लेख मिलता है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि यह रिवायत उस समय से पहले की है, जब इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम और हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) दुनिया में तशरीफ़ भी नहीं लाई थीं। इसी कारण इस रिवायत को हज़रत मासूमा (स) के स्थान और क़ुम के भविष्य में प्राप्त होने वाले महत्व से जोड़ा जाता है।

हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की हिजरत; क़ुम कैसे बना तशय्यु का केंद्र?

क़ुम और हज़रत मासूमा (स) का संबंध

हज़रत मासूमा (स) के क़ुम आगमन ने इस शहर को एक नई आध्यात्मिक और शैक्षिक पहचान दी। आपने थोड़े समय तक क़ुम में निवास किया और फिर वहीं आपका निधन हुआ तथा आपको इसी शहर में दफ़्न किया गया। जहाँ आपका मज़ार बना, वह बाद में शिया जगत के सबसे महत्वपूर्ण ज़ियारती केंद्रों में शामिल हो गया।

इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम से संबंधित रिवायतों में भी हज़रत मासूमा (स) की ज़ियारत की विशेष फ़ज़ीलत बयान हुई है। एक रिवायत में आपके मज़ार की ज़ियारत के लिए «عارفاً بحقها» का अर्थ बयान किया गया है, अर्थात उनके स्थान और पद की पहचान के साथ ज़ियारत करना। यह अभिव्यक्ति आम तौर पर मासूम इमामों अलैहिमुस्सलाम की ज़ियारत के संबंध में इस्तेमाल होने वाली अभिव्यक्तियों से मिलती-जुलती है और हज़रत मासूमा (स) के उच्च स्थान को दर्शाती है।

हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम के साथ हज़रत मासूमा (स) भी उन महान हस्तियों में शामिल हैं, जिनके लिए مأثور ज़ियारतनामा उपलब्ध है। ज़ियारतनामे में यह दुआ भी शामिल है:

«يَا فَاطِمَةُ اشْفَعِي لِي فِي الْجَنَّةِ»

अर्थात, ऐ फ़ातिमा! जन्नत में मेरी शफ़ाअत कीजिए।

इल्मी स्थान और धार्मिक बसीरत

हज़रत मासूमा (स) की शख्सियत केवल एक महान इमामज़ादी तक सीमित नहीं थी। ऐतिहासिक रिवायतों में उनके इल्मी स्थान और धार्मिक بصीरत से संबंधित घटनाएँ भी मिलती हैं। एक प्रसिद्ध रिवायत के अनुसार, कुछ शिया अपने धार्मिक सवाल लेकर इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के घर पहुँचे, लेकिन इमाम (अ) उस समय घर में मौजूद नहीं थे। हज़रत मासूमा (स), जो उस समय कम उम्र की थीं, ने उन सवालों के जवाब दिए।

जब वे लोग वापस जा रहे थे तो रास्ते में उनकी मुलाकात इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम से हुई और उन्होंने हज़रत मासूमा (स) द्वारा दिए गए जवाब इमाम (अ) के सामने पेश किए। रिवायत के अनुसार, इमाम (अ) ने उन जवाबों को सुनकर फ़रमाया: «فَداها أَبوها» अर्थात, उनके पिता उन पर क़ुर्बान हों।

यह घटना, यद्यपि एक ऐतिहासिक रिवायत के रूप में बयान हुई है, हज़रत मासूमा (स) के असाधारण इल्मी स्थान और अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की ओर से उनके सम्मान और प्रतिष्ठा को दर्शाती है।

हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की हिजरत; क़ुम कैसे बना तशय्यु का केंद्र?

क़ुम; ज्ञान और धार्मिक शिक्षाओं का केंद्र

हज़रत मासूमा (स) की दफ़्न के बाद क़ुम का महत्व लगातार बढ़ता गया। उनका रौज़ा अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से संबंध रखने वाले लोगों के लिए एक आध्यात्मिक केंद्र बन गया और धीरे-धीरे क़ुम एक बड़े इल्मी शहर में बदल गया। आज हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम दुनिया भर के छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए इस्लामी ज्ञान का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।

इस तरह हज़रत मासूमा (स) की हिजरत को केवल एक ऐतिहासिक यात्रा के रूप में देखना इस घटना के पूरे महत्व को बयान नहीं करता। यह हिजरत उस ऐतिहासिक सिलसिले की एक महत्वपूर्ण कड़ी थी, जिसके परिणामस्वरूप ईरान में अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की शिक्षाओं को मजबूत आधार मिला और बाद में क़ुम ने शिया जगत में एक प्रमुख स्थान हासिल किया।

हज़रत फ़ातिमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा की ज़िंदगी, हिजरत, क़ुम में उनका प्रवास और वहीं उनकी दफ़्न ने इस शहर की पहचान को हमेशा के लिए अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के नाम से जोड़ दिया। इसी कारण आज क़ुम केवल एक शहर नहीं, बल्कि दुनिया भर के शियाने अहलेबैत के लिए ज्ञान, ज़ियारत और धार्मिक शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

हालाँकि हज़रत मासूमा (स) के जीवन से संबंधित कुछ ऐतिहासिक घटनाओं, विशेष रूप से उनकी मृत्यु की परिस्थितियों, विवाह न करने के कारणों और यात्रा के कुछ चरणों के बारे में अलग-अलग रिवायतें मिलती हैं। इसलिए इन मामलों को निश्चित ऐतिहासिक तथ्यों के बजाय ऐतिहासिक रिवायतों और संभावनाओं के रूप में बयान करना अधिक उचित है।

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