इतिहास में कुछ फतवे अपने तत्काल धार्मिक और सामाजिक दायरे से आगे बढ़कर सामूहिक जागरूकता, राजनीतिक प्रतिरोध और आर्थिक स्वतंत्रता के प्रतीक बन जाते हैं। शिया जगत के महान धर्मगुरु और मरजा-ए-तक़लीद आयतुल्लाहिल उज़्मा मिर्ज़ा मुहम्मद हसन शीराज़ी (रह.) का तंबाकू के इस्तेमाल को हराम घोषित करने वाला ऐतिहासिक फतवा उन्नीसवीं सदी के ईरान की ऐसी ही एक घटना है। इसने विदेशी व्यापारिक एकाधिकार को चुनौती देने के साथ-साथ धार्मिक नेतृत्व, जनविश्वास और सामूहिक कार्रवाई की ताकत को भी उजागर किया।
लेखक: मौलाना सैयद अली हाशिम आबिदी
1890 में काजार शासन ने ब्रिटिश व्यापारी मेजर जेराल्ड टैलबोट से जुड़ी एक कंपनी को तंबाकू के व्यापार में व्यापक अधिकार प्रदान किए। इतिहास में इस समझौते को ‘तंबाकू रियायत’ या ‘रेजी कंसेशन’ के नाम से जाना जाता है। इसके तहत तंबाकू के उत्पादन, खरीद-बिक्री और निर्यात पर विदेशी कंपनी का असाधारण नियंत्रण स्थापित होना था। इस समझौते से ईरानी किसानों और व्यापारियों के हित प्रभावित हुए तथा देश की आर्थिक स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं बढ़ने लगीं। धीरे-धीरे उलमा, व्यापारियों और आम जनता का विरोध एक व्यापक आंदोलन में बदल गया।
समारा में रह रहे आयतुल्लाहिल उज़्मा मिर्ज़ा मुहम्मद हसन शीराज़ी (रह.) ने इस स्थिति में विदेशी एकाधिकार का विरोध किया। उन्होंने 3 दिसंबर 1891 को, जो हिजरी कैलेंडर के अनुसार 1 जमादिउल अव्वल 1309 था, यह ऐतिहासिक फतवा जारी किया:
“बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। आज से तंबाकू और तूतून का किसी भी रूप में इस्तेमाल इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) से युद्ध करने के समान है।”
इस फतवे ने विरोध को एक स्पष्ट और व्यावहारिक सामूहिक आंदोलन का रूप दे दिया। ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में लोगों ने तंबाकू का इस्तेमाल छोड़ दिया और उसकी खरीद-बिक्री से परहेज करने लगे। इस तरह एक सामान्य व्यापारिक वस्तु विदेशी एकाधिकार के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक बन गई। इस आंदोलन की वास्तविक ताकत केवल फतवे के शब्दों में नहीं, बल्कि उस पर अमल करने वाले अनुयायियों और आम लोगों की एकजुटता में थी।
इस फतवे का ऐतिहासिक प्रभाव उसके तत्काल परिणामों से कहीं अधिक व्यापक था। आयतुल्लाहिल उज़्मा मिर्ज़ा शीराज़ी (रह.) ईरान से बाहर इराक के समारा शहर में रह रहे थे, लेकिन उनकी आवाज़ ने भौगोलिक दूरी को अप्रासंगिक बना दिया। उलमा, व्यापारी और आम नागरिक एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट हो गए। इस घटना ने स्पष्ट किया कि जनता का विश्वास प्राप्त धार्मिक नेतृत्व आर्थिक और राजनीतिक मामलों में भी प्रभावी भूमिका निभा सकता है। साथ ही, इसने काजार शासन की नीतियों के विरुद्ध जनदबाव की ताकत को उजागर किया और विदेशी रियायतों के खिलाफ संगठित सामूहिक कार्रवाई का ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत किया।
जनविरोध और लगातार जारी बहिष्कार के कारण सरकार पर दबाव बढ़ता गया। अंततः दिसंबर 1891 में तंबाकू का एकाधिकार समाप्त कर दिया गया। इस सफलता ने विदेशी आर्थिक प्रभाव के विरुद्ध प्रतिरोध को नया महत्व दिया। तंबाकू आंदोलन को आधुनिक ईरान में राजनीतिक चेतना के विकास और 1905 से 1911 के संवैधानिक आंदोलन से पहले सामूहिक जागरूकता के महत्वपूर्ण चरणों में गिना जाता है। हालांकि, संवैधानिक आंदोलन के अपने अलग कारण और उद्देश्य थे, फिर भी तंबाकू आंदोलन ने उलमा, व्यापारियों और आम जनता के आपसी सहयोग की शक्ति को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू धार्मिक मार्गदर्शन और सामूहिक जिम्मेदारी के बीच संबंध भी है। कोई फतवा तभी ऐतिहासिक शक्ति हासिल करता है, जब समाज उसे समझकर सामूहिक कार्रवाई में बदल देता है। आयतुल्लाहिल उज़्मा मिर्ज़ा शीराज़ी (रह.) के फतवे ने लोगों को यह समझाया कि आर्थिक फैसले केवल व्यापार और मुनाफे तक सीमित नहीं होते, बल्कि उनका संबंध राष्ट्रीय स्वतंत्रता, सामाजिक अधिकारों और जनसम्मान से भी होता है।
आधुनिक दौर में सर्वोच्च धार्मिक प्राधिकारी आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली हुसैनी सीस्तानी (दम ज़िल्लुहू) का दाएश के खिलाफ जारी रक्षात्मक फतवा भी धार्मिक नेतृत्व और सामूहिक जिम्मेदारी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। जून 2014 में इराक में दाएश के हमलों और तेजी से बिगड़ती स्थिति के बीच जारी इस फतवे ने नागरिकों को देश की रक्षा के लिए आगे आने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद बड़ी संख्या में स्वयंसेवक रक्षा प्रयासों में शामिल हुए और दाएश के खिलाफ प्रतिरोध को मजबूती मिली।
हालांकि, दोनों फतवों की ऐतिहासिक परिस्थितियों और उद्देश्यों में बुनियादी अंतर था। आयतुल्लाहिल उज़्मा मिर्ज़ा शीराज़ी (रह.) का फतवा विदेशी व्यापारिक एकाधिकार के खिलाफ बहिष्कार से संबंधित था, जबकि आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली हुसैनी सीस्तानी (दम ज़िल्लुहू) का फतवा सशस्त्र आतंकवाद के खतरे के सामने इराक और उसके नागरिकों की रक्षा के संदर्भ में जारी किया गया था। पहले फतवे ने आर्थिक वर्चस्व के खिलाफ जनप्रतिरोध को मजबूती दी, जबकि दूसरे ने रक्षा के दायित्व और नागरिकों की सुरक्षा को प्रमुखता दी। इन दोनों घटनाओं की तुलना का उद्देश्य उनके तरीकों को एक समान बताना नहीं, बल्कि यह समझना है कि अलग-अलग परिस्थितियों में धार्मिक नेतृत्व किस प्रकार समाज को सामूहिक जिम्मेदारी की ओर प्रेरित कर सकता है।
आज मध्य पूर्व को ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य तनाव, आर्थिक प्रतिबंधों तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात से जुड़े खतरों जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन परिस्थितियों का प्रभाव केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, तेल की कीमतों, व्यापार और आम नागरिकों की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ता है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया में तेल की आपूर्ति के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। यहां लंबे समय तक यातायात बाधित रहने से वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा पर निर्भर देशों के लिए गंभीर परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं। ऐसे हालात में आर्थिक दबाव और सैन्य संघर्षों का आकलन करते समय मानव जीवन की रक्षा, नागरिकों के हितों और शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आयतुल्लाहिल उज़्मा मिर्ज़ा शीराज़ी (रह.) के ऐतिहासिक फतवे की प्रासंगिकता आज भी इस सवाल में निहित है कि समाज अपने सामूहिक हितों की रक्षा के लिए किस प्रकार एकजुट हो सकते हैं। इस घटना ने साबित किया कि जनविश्वास, स्पष्ट उद्देश्य और संगठित सामूहिक कार्रवाई किसी शक्तिशाली आर्थिक हित को भी चुनौती दे सकती है। इसका सबक अतीत की नकल करना नहीं, बल्कि हर दौर की परिस्थितियों को समझते हुए विवेक, जिम्मेदारी और न्याय के सिद्धांतों पर अमल करना है।
आयतुल्लाहिल उज़्मा मिर्ज़ा शीराज़ी (रह.) के फतवे ने एक व्यापारिक एकाधिकार के खिलाफ बहिष्कार को ऐतिहासिक जनआंदोलन में बदल दिया। इसकी वास्तविक विरासत केवल एक समझौते का रद्द होना नहीं, बल्कि यह चेतना है कि सामूहिक अधिकारों की रक्षा केवल शासकों के फैसलों पर निर्भर नहीं करती। जागरूक और एकजुट समाज भी इतिहास की दिशा बदल सकता है।