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सत्ता, न्यायपालिका और लोकतंत्र: नई पीढ़ी के सवाल

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सत्ता, न्यायपालिका और लोकतंत्र: नई पीढ़ी के सवाल

सरकार के ख़िलाफ़ पहले भी आंदोलन हुए हैं, लेकिन या तो उन पर ध्यान नहीं दिया गया या उन्हें बदनाम करके ख़त्म कर दिया गया। किसान आंदोलन एक साल से अधिक समय तक चला, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसान नेताओं से मुलाक़ात तक नहीं की।

लेखक: आदिल फ़राज़

‘वोट चोरी’ के ख़िलाफ़ पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। जेन ज़ी (Gen Z) के साथ विपक्ष भी सड़कों पर उतरकर संघर्ष कर रहा है। सरकार की कथित तानाशाही के ख़िलाफ़ पहली बार इतने बड़े स्तर पर आंदोलन देखने को मिल रहा है। विपक्ष लगातार मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े की माँग कर रहा है। एसआईआर (SIR) के ख़िलाफ़ 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। कांग्रेस विरोध प्रदर्शन करते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुँची। यह एक ऐतिहासिक विरोध मार्च था, जिसकी गूँज निश्चित रूप से सत्ता के गलियारों के साथ सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुँची होगी।

सरकार के ख़िलाफ़ इससे पहले भी आंदोलन हुए हैं, लेकिन या तो उन पर ध्यान नहीं दिया गया या उन्हें बदनाम करके समाप्त कर दिया गया। किसान आंदोलन एक साल से अधिक समय तक चला, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसान नेताओं से मुलाक़ात तक नहीं की। इस आंदोलन के दौरान सैकड़ों लोगों की जान चली गई। किसान दिल्ली की सीमाओं पर भीषण गर्मी और कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे बैठे रहे, लेकिन सत्ता पर इसका कोई असर नहीं हुआ। यहाँ तक कि भारतीय शहरों में रहने वाली बड़ी आबादी किसानों को विपक्ष और व्यापारियों का मोहरा समझने लगी। ऐसा लगता था कि सरकार को विश्वास था कि देश का बहुमत उसके समर्थन में है, इसलिए किसानों के विरोध प्रदर्शन को लगातार नज़रअंदाज़ किया जाता रहा।

मोदी के शासनकाल में दूसरा बड़ा आंदोलन शाहीन बाग़ से शुरू हुआ। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के ख़िलाफ़ महिलाओं ने शाहीन बाग़ में धरना दिया। चूँकि यह आंदोलन मुसलमानों के अस्तित्व और पहचान से जुड़ा था, इसलिए सरकार और भगवा संगठनों ने इसे बदनाम करने की पूरी कोशिश की। शाहीन बाग़ की महिलाओं के बारे में तरह-तरह की बातें कही गईं। प्रदर्शनकारियों की तुलना ‘अर्बन नक्सल’ से की गई। प्रधानमंत्री ने लोगों के कपड़ों से दंगाइयों की पहचान करने की बात कही। भाजपा के मंत्रियों ने खुलेआम गोली मारने की धमकियाँ दीं।

इन तमाम घटनाओं पर न तो मानवाधिकार संगठनों ने प्रभावी ढंग से आवाज़ उठाई और न ही सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। मुक़दमों की सुनवाई के दौरान भी संविधान की अनदेखी किए जाने के आरोप लगे। इसी तरह बाबरी मस्जिद मामले के फ़ैसले में भी संविधान के बजाय आस्था को प्राथमिकता दिए जाने की आलोचना की गई थी।

कोविड महामारी के कारण शाहीन बाग़ आंदोलन समाप्त हो गया, लेकिन सरकार और उसके समर्थकों ने इसे असफल क़रार दिया। इसके बाद मुसलमानों की पहचान और उनके इबादतगाहों पर सुनियोजित हमलों की घटनाएँ सामने आने लगीं। भीड़ द्वारा हिंसा की घटनाएँ बढ़ती गईं। यहाँ तक कि रेलगाड़ियों और बसों में सफ़र करना भी सुरक्षित नहीं रहा। इन घटनाओं में सरकार और प्रशासन की भूमिका पर लगातार सवाल उठते रहे।

इन परिस्थितियों में युवाओं का एक वर्ग यह सोचने लगा कि ‘पंक्चर बनाने वाली क़ौम’ के साथ ऐसा ही व्यवहार होना चाहिए। लेकिन जब शिक्षा व्यवस्था पर चोट पहुँची और युवाओं को अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगा, तब पहली बार ऐसा आंदोलन उभरा जिसका संबंध किसी एक वर्ग, समुदाय या समूह से नहीं था। जब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने नई पीढ़ी की तुलना ‘कॉकरोच’ से की, तो नई पीढ़ी भी बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आई। इस आंदोलन का प्रभाव यह हुआ कि मोदी सरकार में पहली बार किसी मंत्री को अनिच्छा के बावजूद इस्तीफ़ा देना पड़ा।

एसआईआर प्रक्रिया पर मुख्य आपत्ति यह है कि इससे ‘वोट चोरी’ को बढ़ावा मिलने की आशंका है। देश के विभिन्न राज्यों में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने की ख़बरें सामने आईं। पात्र मतदाताओं को भी कानूनी जटिलताओं का सामना करना पड़ा। विशेष रूप से दलितों और मुसलमानों के वोट हटाए जाने को लेकर चिंता व्यक्त की गई। लेकिन अफ़सोस की बात है कि मुस्लिम समुदाय की ओर से इस मुद्दे पर कोई प्रभावी विरोध सामने नहीं आया। मुस्लिम नेता और उलमा भी किसी उल्लेखनीय प्रदर्शन में दिखाई नहीं दिए।

इस मामले में मुस्लिम समुदाय में जागरूकता बढ़ाना भी बेहद ज़रूरी है। मुस्लिम नेताओं और उलमा के एक बड़े वर्ग के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तथा उसके सहयोगी संगठनों, जैसे मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, से जुड़े होने को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इसलिए उनके बयानों पर केवल भरोसा करने के बजाय उनके रुख़ और संबद्धताओं की गंभीरता से समीक्षा करना आवश्यक है। जहाँ उनके बयान या कार्य समुदाय के हितों के विपरीत दिखाई दें, वहाँ उनसे जवाबदेही की माँग की जानी चाहिए, ताकि समुदाय के हितों से समझौता करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सके।

10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन होना था, लेकिन पुलिस ने कई प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया। अभिजीत दीपके और उनके साथियों को विमान से उतरने तक नहीं दिया गया, जबकि ध्रुव राठी को उनके घर से हिरासत में लिए जाने की ख़बरें सामने आईं। विरोध प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली के मेट्रो स्टेशनों और सार्वजनिक परिवहन को बंद किए जाने से भी कई सवाल पैदा हुए। देश के विभिन्न राज्यों से दिल्ली आने वाली कई रेलगाड़ियाँ भी रद्द कर दी गईं। जंतर-मंतर पर 20 हज़ार से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की ख़बर सामने आई।

काश, इतनी बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को मणिपुर में भी तैनात किया गया होता, तो शायद जान-माल के नुक़सान को कम करने में मदद मिलती। यदि पहलगाम में भी ऐसे प्रभावी सुरक्षा इंतज़ाम किए गए होते, तो संभव है कि निर्दोष पर्यटकों की जान बचाई जा सकती थी।

बहरहाल, 10 अक्टूबर को देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। इसके बाद 11 अक्टूबर को अलग-अलग राज्यों में भी प्रदर्शन हुए। 12 अक्टूबर को विपक्ष ने बाराखंभा रोड से सुप्रीम कोर्ट तक पैदल मार्च किया और याचिका दायर करके एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती दी।

जेन ज़ी और विपक्ष को सुप्रीम कोर्ट से असाधारण उम्मीदें लगाने के बजाय इस वास्तविकता को भी ध्यान में रखना चाहिए कि लोकतांत्रिक संस्थाओं से न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया अक्सर लंबी और जटिल होती है। संभव है कि मुख्य न्यायाधीश ने भी विरोध प्रदर्शनों के महत्त्व और उनसे उठने वाले सवालों को महसूस किया हो, लेकिन केवल अदालती सुनवाई से इन समस्याओं के समाधान की उम्मीद नहीं की जा सकती।

जिन परिस्थितियों में नई पीढ़ी की तुलना ‘कॉकरोच’ से की गई, उन पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में युवाओं की चिंताओं को नज़रअंदाज़ करने के बजाय उनकी बात सुनना और उनके सवालों का जवाब देना ज़रूरी होता है।

विपक्ष ने मुख्य न्यायाधीश से मुलाक़ात का समय माँगा था, लेकिन उनके पास इस मुलाक़ात के लिए समय नहीं था। ऐसे हालात में कपिल सिब्बल का यह कहना कि ‘हमें सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा नहीं रहा’, न्यायिक संस्थाओं में जनता के विश्वास से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण सवाल उठाता है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उनसे अपना विश्वास बनाए रखने का आग्रह किया। यह स्थिति माँग करती है कि न्यायिक संस्थाओं की निष्पक्षता और उन पर जनता के भरोसे को मज़बूत बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ।

विपक्ष और जेन ज़ी को यह बात याद रखनी चाहिए कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष आवश्यक है। न्याय प्राप्त करने में जन-जागरूकता, संवैधानिक दायरे में विरोध प्रदर्शन और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जवाबदेही की माँग का बुनियादी महत्त्व है।

अदालतों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव हैं। लेकिन जब न्यायिक फ़ैसलों या कुछ पूर्व न्यायाधीशों की भूमिका पर सवाल उठते हैं, तो उनका जवाब पारदर्शिता, संवैधानिक सिद्धांतों और निष्पक्ष आचरण के ज़रिये ही दिया जा सकता है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोगोई और चंद्रचूड़ के कार्यकाल से संबंधित बहसों को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है।

लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रतिरोध से बड़ी कोई शक्ति नहीं है, बशर्ते यह प्रतिरोध संवैधानिक मूल्यों, जन-जागरूकता और शांतिपूर्ण संघर्ष से जुड़ा हो। जब तक नागरिक अपने अधिकारों के लिए आवाज़ नहीं उठाएँगे और सत्ता से जवाबदेही की माँग नहीं करेंगे, तब तक देश में शांति और न्याय की सर्वोच्चता स्थापित करना कठिन रहेगा।

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