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हज़रत ज़ैनब (स) ने तमाम मुसीबतों के बावजूद क्यों फ़रमाया: “मैंने सुंदरता के सिवा कुछ नहीं देखा”?

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हज़रत ज़ैनब (स) ने तमाम मुसीबतों के बावजूद क्यों फ़रमाया: “मैंने सुंदरता के सिवा कुछ नहीं देखा”?

हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा का मशहूर कथन “मा रअयतु इल्ला जमीला” यानी “मैंने सुंदरता के सिवा कुछ नहीं देखा”, उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद के उस सवाल का जवाब था, जिसमें उसने पूछा था, “तुमने अपने भाई के साथ अल्लाह के व्यवहार को कैसा पाया?” यह सवाल बनी उमय्या की उस विचारधारा और जबरिया फ़िरक़े की सोच से जुड़ा था, जो दुनिया में होने वाली हर घटना को सीधे अल्लाह की ओर मंसूब करता था।

हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा की विलादत के मुबारक अवसर पर उनकी एक अमर वाणी “मा रअयतु इल्ला जमीला” यानी “मैंने सुंदरता के सिवा कुछ नहीं देखा” पर दोबारा विचार करना, उनके इल्मी और अक़ीदती मक़ाम को बेहतर ढंग से समझने का अवसर है। इस विषय पर इतिहास के विशेषज्ञ हुज्जतुल इस्लाम अमीर हसन मुज़फ़्फ़रीज़ाद ने एक साक्षात्कार में इस जवाब के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया।

सवाल: इतनी सारी मुसीबतों और तकलीफ़ों का सामना करने के बावजूद, जिनके कारण हज़रत ज़ैनब (स) को “मुसीबतों की मिसाल” के रूप में याद किया जाता है, उन्होंने क्यों फ़रमाया कि “मैंने सुंदरता के सिवा कुछ नहीं देखा”?

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम।

हज़रत ज़ैनब कुबरा (स) के इस कथन “मा रअयतु इल्ला जमीला” के बारे में बात करते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि उन्होंने यह जवाब उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद के सवाल के उत्तर में दिया था। इसलिए सबसे पहले उसके सवाल को समझना ज़रूरी है।

उसने पूछा था: “कैफ़ा रअयति सुनअल्लाहि बि-अख़ीक़?” यानी “तुमने अपने भाई के साथ अल्लाह के व्यवहार को कैसा पाया?”

हज़रत ज़ैनब (स) ने जवाब दिया, “मा रअयतु इल्ला जमीला”, अर्थात “मैंने सुंदरता के सिवा कुछ नहीं देखा।”

इसका अर्थ यह है कि अल्लाह का काम, उसका व्यवहार और उसका फ़ेल सुंदरता से परिपूर्ण है। कर्बला में जो बुराइयाँ और अत्याचार हुए, वे लोगों और तुम जैसे ज़ालिमों के काम थे।

बनी उमय्या “जबर” नामक विचारधारा के अनुयायी थे और वे “जबरिया” नामक फ़िरक़े का समर्थन करते थे। जबरिया फ़िरक़े का मानना था कि दुनिया में जो कुछ भी होता है, वह सब अल्लाह का किया हुआ है।

इस सोच के अनुसार, अगर हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ) के बाद दूसरे लोग सत्ता में आ गए, तो क्या हमें यह कहना चाहिए कि यह सब अल्लाह का काम था और इस पर कोई सवाल नहीं उठाना चाहिए? या अगर इमाम हुसैन (अ) को शहीद कर दिया गया, तो यह कह देना चाहिए कि यह अल्लाह की इच्छा, उसकी मर्ज़ी और उसका काम था?

उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद के सवाल में भी यही सोच छिपी हुई थी। वह पूछ रहा था, “तुमने अल्लाह के काम को कैसा पाया?” मानो इमाम हुसैन (अ) को अल्लाह ने शहीद किया हो।

लेकिन हज़रत ज़ैनब कुबरा (स) ने जवाब दिया, “मैंने सुंदरता के सिवा कुछ नहीं देखा।” यानी अल्लाह का काम सुंदर है, जबकि कर्बला में जो बुराइयाँ और अत्याचार हुए, वे तुम जैसे लोगों के कृत्य थे।

यही बात शाम में भी देखने को मिलती है। वहाँ यज़ीद (लानतुल्लाह अलैह) ने इमाम सज्जाद (अ) से कहा था, “अलहम्दुलिल्लाहिल्लज़ी क़तला अबाक़” यानी “सभी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने तुम्हारे पिता को क़त्ल किया।” इस तरह उसने इमाम हुसैन (अ) की शहादत को अल्लाह की ओर मंसूब किया।

इसके जवाब में इमाम सज्जाद (अ) ने फ़रमाया:

“इन्नन्नासा क़तलू अबी” “लोगों ने मेरे पिता को क़त्ल किया।”

एक दूसरी रिवायत के अनुसार, इमाम (अ) ने फ़रमाया, “अल्लाह उन लोगों पर लानत करे, जिन्होंने मेरे पिता को क़त्ल किया।” यह जवाब वास्तव में जबर की विचारधारा का खंडन था।

इसलिए आशूरा और कर्बला का वाक़िया केवल दो राजनीतिक और सैन्य ताक़तों के बीच टकराव नहीं था, बल्कि यह दो अलग-अलग वैचारिक और अक़ीदती मोर्चों के बीच संघर्ष भी था।

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