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सूर ए क़द्र किस तरह इमाम ज़माना (अ) के जीवित होने की दलील पेश करता है?

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सूर ए क़द्र किस तरह इमाम ज़माना (अ) के जीवित होने की दलील पेश करता है?

सूरह क़द्र के अनुसार, फ़रिश्तों का तक़दीरों और मामलों के निर्धारण के लिए उतरना क़यामत तक जारी रहने वाली प्रक्रिया है। हर साल होने वाले इस नुज़ूल के लिए हर दौर में एक जीवित और मासूम इमाम का मौजूद होना आवश्यक है, जिन तक दुनिया के मामलों से संबंधित तक़दीरें पहुँचाई जाती हैं।

शिया अक़ीदे में इमाम-ए-अस्र (अज) के वर्तमान समय में जीवित होने का प्रमाण केवल एक गौण विषय नहीं, बल्कि अक़ीदा-ए-महदवियत का बुनियादी स्तंभ है। ज़मीन कभी भी जीवित हुज्जत-ए-ख़ुदा से ख़ाली क्यों नहीं रह सकती, इस सच्चाई को समझने के लिए सूरह क़द्र पर ग़ौर करना ज़रूरी है। इस क़ुरआनी दलील की व्याख्या के लिए क़ुरआन और हदीस के शोधकर्ता हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद रज़ा मुअद्दब से बातचीत की गई। प्रस्तुत है इस चर्चा का सार।

सवाल: इमाम ज़माना (अ) के जीवित होने को साबित करने के लिए सूरह क़द्र से दलील क्यों दी जाती है?

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम।

सूरह क़द्र उन सूरतों में से है, जिनसे इमाम ज़माना (अज) के अस्तित्व पर दलील पेश की जा सकती है। इस सूरह की एक आयत है:

“तَتَنَزَّلُ الْمَلَائِكَةُ وَالرُّوحُ فِيهَا بِإِذْنِ رَبِّهِمْ مِنْ كُلِّ أَمْرٍ” “उस रात फ़रिश्ते और रूह अपने परवरदिगार के हुक्म से हर काम के लिए उतरते हैं।”

रिवायतों में भी स्पष्ट किया गया है कि फ़रिश्ते इंसानों, जानवरों और पेड़-पौधों से संबंधित मामलों की तक़दीरें लेकर उतरते हैं और उन्हें हर दौर के इमाम के क़ल्ब पर नाज़िल करते हैं।

इसी वजह से इस आयत में फ़ेल मुज़ारेअ का इस्तेमाल किया गया है, जो जारी रहने वाली प्रक्रिया को दर्शाता है। इससे पता चलता है कि फ़रिश्तों का उतरना केवल अतीत तक सीमित नहीं था, बल्कि हर साल दोहराया जाता है।

सूरह क़द्र के बारे में वर्णित रिवायतों से भी यही बात समझ में आती है कि शबे क़द्र में फ़रिश्तों का नुज़ूल केवल पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ज़माने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सिलसिला हर साल जारी रहता है।

इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) से एक रिवायत नक़्ल हुई है, जिसमें फ़रमाया गया है कि अल्लाह तआला ने दुनिया की शुरुआत में ही शबे क़द्र को निर्धारित किया और उसी में पहले नबी तथा पहले वसी के अस्तित्व का फ़ैसला किया। अल्लाह ने यह भी तय किया कि हर साल एक ऐसी रात होगी, जिसमें अगले साल की उसी रात तक के मामलों की व्याख्या और तक़दीरें नाज़िल की जाएँगी।

जो व्यक्ति इस रात का इनकार करता है, वह वास्तव में अल्लाह के इल्म का इनकार करता है। क्योंकि नबी, रसूल और मुहद्दिसीन उस हुज्जत के माध्यम से मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं, जो इस रात उन्हें दी जाती है, इसके अतिरिक्त वह मार्गदर्शन भी होता है, जो जिबरईल (अ) सामान्य दिनों में लेकर आते हैं।

रावी ने सवाल किया कि क्या मुहद्दिसीन के पास भी जिबरईल या दूसरे फ़रिश्ते आते हैं? जवाब में बताया गया कि नबियों और रसूलों के मामले में इसमें कोई संदेह नहीं है। उनके अलावा भी ज़मीन की रचना के पहले दिन से लेकर दुनिया के अंत तक धरती वालों के लिए एक हुज्जत का होना आवश्यक है, जिसके पास अल्लाह तआला अपने प्रिय बंदों में से किसी के माध्यम से उस रात मामलों की व्याख्या और तक़दीरें पहुँचाता है।

रिवायत में आगे कहा गया है कि अल्लाह की क़सम, शबे क़द्र में जिबरईल और फ़रिश्ते हज़रत आदम (अ) के पास भी आदेश लेकर आए थे। हज़रत आदम (अ) का निधन भी उस समय हुआ, जब उनके लिए एक वसी मौजूद था। उनके बाद आने वाले सभी नबियों के पास भी शबे क़द्र में अल्लाह का आदेश आता रहा और प्रत्येक नबी को अपने बाद के वसी के बारे में निर्देश दिया जाता रहा। हज़रत आदम (अ) से लेकर पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स) तक प्रत्येक नबी को इस रात अपने उत्तराधिकारी को नियुक्त करने का आदेश दिया जाता था।

यह रिवायत अल-काफ़ी, जिल्द 1, पेज 251 में दर्ज है।

एक अन्य रिवायत में हज़रत अबूज़र (र) से वर्णित है कि उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स) से पूछा, “मुझे शबे क़द्र के बारे में बताइए। क्या यह रात केवल नबियों के ज़माने में होती थी, जब उन पर वही नाज़िल होती थी, और उनके दुनिया से चले जाने के बाद यह रात समाप्त हो गई, या क़यामत तक हर साल यह रात आती रहेगी?”

पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने जवाब दिया कि शबे क़द्र क़यामत तक बाक़ी रहेगी।

इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जब शबे क़द्र में फ़रिश्तों का नुज़ूल और मामलों की तक़दीर का सिलसिला क़यामत तक जारी रहेगा, तो हर दौर में एक जीवित इमाम का मौजूद होना भी आवश्यक है, जिन तक ये मामले पहुँचाए जाएँ। शिया अक़ीदे के अनुसार, हमारे दौर में यह जीवित हुज्जत इमाम महदी (अज) हैं।

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