Print this page

ज़ायोनीवाद और फ़िलिस्तीन का सवाल

Rate this item
(0 votes)
ज़ायोनीवाद और फ़िलिस्तीन का सवाल

इसराइल की राजनीति का एक महत्वपूर्ण और विचारणीय पहलू यह है कि वहाँ अरब नागरिकों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो प्राप्त है, लेकिन सत्ता के गठन के समय उनकी भागीदारी को अक्सर कड़े विरोध का सामना करना पड़ता है। अरब पार्टियाँ चुनावों में हिस्सा लेती हैं, जनता के वोट हासिल करती हैं और संसद तक पहुँचती हैं, लेकिन चुनावों में उनकी सफलता उन्हें सरकार में शामिल होने का अवसर दिलाने की गारंटी नहीं देती।

लेखक: मौलाना सय्यद करामत हुसैन जाफ़री

इसराइल की राजनीति का एक महत्वपूर्ण और विचारणीय पहलू यह है कि वहाँ अरब नागरिकों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो प्राप्त है, लेकिन सत्ता के गठन के समय उनकी भागीदारी को अक्सर कड़े विरोध का सामना करना पड़ता है। अरब पार्टियाँ चुनावों में हिस्सा लेती हैं, जनता के वोट हासिल करती हैं और संसद तक पहुँचती हैं, लेकिन चुनावों में उनकी सफलता उन्हें सरकार में शामिल होने का अवसर दिलाने की गारंटी नहीं देती। विशेष रूप से दक्षिणपंथी ज़ायोनी पार्टियों के एक बड़े वर्ग का राजनीतिक रवैया यह सवाल खड़ा करता है कि क्या इसराइल में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की अवधारणा सभी नागरिकों के लिए समान है?

इस स्थिति को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि इसराइल की अरब पार्टियाँ कौन-सी हैं, उनके सदस्य किस धर्म से संबंध रखते हैं, उनका राजनीतिक दृष्टिकोण क्या है और फ़िलिस्तीन के मुद्दे से उनका संबंध किस प्रकार का है। इसके बाद ही यह समझा जा सकता है कि इसराइली राजनीति में अरब पार्टियों को सत्ता से दूर रखने की कोशिशें किस बड़े राजनीतिक और वैचारिक विरोधाभास को उजागर करती हैं।

इसराइल की अरब पार्टियाँ: मुस्लिम, ईसाई या यहूदी?

सबसे पहले एक बुनियादी बात समझना आवश्यक है कि अरब एक राष्ट्रीय, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान है, जबकि मुस्लिम, ईसाई और यहूदी धार्मिक पहचान हैं। इन दोनों को एक-दूसरे का पर्याय समझना सही नहीं है।

इसराइल के अरब नागरिकों में अधिकांश मुसलमान हैं, लेकिन उनमें अरब ईसाई और द्रूज़ समुदाय के लोग भी शामिल हैं। इनमें से बहुत से लोग अपनी अरबी भाषा, संस्कृति और फ़िलिस्तीनी राष्ट्रीय पहचान से जुड़े हुए हैं। इसलिए इसराइल की अरब पार्टियों का उल्लेख करते समय यह समझना चाहिए कि उनकी राजनीति का मूल संबंध अरब नागरिकों और विशेष रूप से फ़िलिस्तीनी अरबों के अधिकारों एवं हितों से है, न कि केवल किसी एक धर्म से।

1948 में इसराइल की स्थापना के समय बड़ी संख्या में फ़िलिस्तीनी अपने घरों और पैतृक क्षेत्रों से बेदखल हुए या युद्ध के परिणामस्वरूप शरणार्थी बन गए, जबकि फ़िलिस्तीनी अरबों की एक बड़ी आबादी अपने क्षेत्रों में ही रह गई। इनमें मुसलमान और ईसाई दोनों शामिल थे। इनमें से बहुत से लोगों और उनकी पीढ़ियों को आज इसराइल की नागरिकता प्राप्त है, लेकिन उनकी फ़िलिस्तीनी पहचान भी बरकरार है।

यही वह आबादी है जिसके अधिकारों, समस्याओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए इसराइल की अरब पार्टियाँ सक्रिय रही हैं।

इसराइल की प्रमुख अरब पार्टियाँ कौन-सी हैं?

इसराइल की राजनीति में राअम, हदाश, तआल और बलद जैसी पार्टियाँ अरब नागरिकों के प्रतिनिधित्व के लिहाज़ से महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। इनके विचारों और राजनीतिक रणनीतियों में अंतर पाया जाता है।

राअम इस्लामी विचारधारा से प्रभावित एक अरब राजनीतिक पार्टी है, जिसके नेता मंसूर अब्बास रहे हैं। इस पार्टी की राजनीति में इसराइली व्यवस्था के भीतर रहकर अरब नागरिकों के लिए विकास बजट, शिक्षा, रोज़गार, आवास और अन्य बुनियादी सुविधाएँ हासिल करने पर ज़ोर दिया जाता है। राअम ने 2021 में इसराइल की गठबंधन सरकार के गठन में हिस्सा लेकर यह स्पष्ट किया कि अरब पार्टियाँ व्यावहारिक राजनीतिक भागीदारी के माध्यम से भी अपने उद्देश्यों को हासिल करने की कोशिश कर सकती हैं।

हदाश वामपंथी विचारधारा वाली एक राजनीतिक पार्टी है, जिसमें अरब और यहूदी दोनों कार्यकर्ता तथा राजनीतिक प्रतिनिधि शामिल रहे हैं। यह पार्टी सामाजिक समानता, मज़दूरों के अधिकार, अरब नागरिकों के समान अधिकारों और फ़िलिस्तीनियों के राष्ट्रीय अधिकारों का समर्थन करती है। इसका उदाहरण बताता है कि इसराइली राजनीति में सभी यहूदी एक जैसी विचारधारा नहीं रखते और कुछ यहूदी राजनीतिक कार्यकर्ता अरब पार्टियों के साथ मिलकर भी राजनीतिक संघर्ष करते हैं।

तआल अरब नागरिकों के अधिकारों और फ़िलिस्तीन के मुद्दे को अपनी राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान देती है। अहमद तिबी इस पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं। इस पार्टी की राजनीतिक भूमिका इसराइली संसद में अरब नागरिकों की समस्याएँ उठाने और फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करने से जुड़ी रही है।

बलद अरब राष्ट्रवादी और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा वाली पार्टी है, जो अरब-फ़िलिस्तीनी पहचान, राष्ट्रीय अधिकारों और राज्य में समानता की माँग पर ज़ोर देती है। इसकी राजनीति इसराइल की राष्ट्रीय पहचान और अरब नागरिकों की समान स्थिति से जुड़े बुनियादी सवाल उठाती है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि अरब पार्टियाँ केवल मुसलमानों पर आधारित नहीं हैं। इनके राजनीतिक दायरे में अरब मुसलमान और ईसाई शामिल हैं, जबकि कुछ संयुक्त पार्टियों में यहूदी भी भाग लेते हैं। इन पार्टियों के बीच धार्मिक, राष्ट्रीय और राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर मतभेद भी मौजूद हैं, लेकिन अरब नागरिकों के अधिकार इनके राजनीतिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

अरब पार्टियों को सरकार से बाहर रखने की राजनीति

इसराइल की चुनावी राजनीति का एक विचारणीय पहलू यह है कि संसद में अरब पार्टियों की मौजूदगी के बावजूद उन्हें सरकार बनाने की प्रक्रिया में हमेशा समान रूप से स्वीकार नहीं किया जाता।

इसराइल की राजनीति में विशेष रूप से दक्षिणपंथी ज़ायोनी पार्टियों का एक वर्ग अरब पार्टियों के साथ गठबंधन सरकार बनाने का कड़ा विरोध करता रहा है। उनका मानना है कि फ़िलिस्तीनी राष्ट्रीय पहचान रखने वाली पार्टियों के साथ सत्ता में भागीदारी राज्य की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और सुरक्षा संबंधी अवधारणाओं के विपरीत हो सकती है। दूसरी ओर, अरब पार्टियों और उनके समर्थकों का कहना है कि इसराइल के नागरिक होने के नाते उन्हें भी देश के राजनीतिक फैसलों में प्रभावी भूमिका निभाने का अधिकार है।

यह मतभेद केवल सरकार बनाने या गिराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे यह सवाल जुड़ा है कि इसराइल में लोकतंत्र की सीमाएँ क्या हैं और क्या अरब नागरिकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को भी उसी सिद्धांत के तहत स्वीकार किया जाता है, जिसके अंतर्गत यहूदी नागरिकों के प्रतिनिधित्व को मान्यता दी जाती है।

यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि इसराइल की सभी यहूदी पार्टियाँ अरब पार्टियों का विरोध नहीं करतीं। कुछ यहूदी पार्टियों ने अलग-अलग समय पर अरब पार्टियों के साथ राजनीतिक सहयोग भी किया है। इसी तरह हर चुनाव में सभी पार्टियों का रवैया एक जैसा नहीं रहता। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि इसराइल की दोनों प्रमुख पार्टियाँ हर परिस्थिति में सभी अरब पार्टियों को सरकार से बाहर रखने पर सहमत रही हैं। हालाँकि, अरब पार्टियों के साथ राजनीतिक गठबंधन का विरोध, विशेष रूप से ज़ायोनी दक्षिणपंथी विचारधारा के कुछ वर्गों में, एक महत्वपूर्ण और लगातार दिखाई देने वाला राजनीतिक रुझान रहा है।

मूल सवाल यह है कि यदि अरब नागरिक चुनावों में हिस्सा लेते हैं, अपने प्रतिनिधियों को चुनकर संसद में भेजते हैं और राज्य के कानूनों का पालन करते हैं, तो उनकी राष्ट्रीय पहचान के आधार पर उनकी राजनीतिक भागीदारी को अस्वीकार्य क्यों समझा जाता है?

किसी राजनीतिक पार्टी को उसके घोषणापत्र या विशेष नीतियों के आधार पर सरकार में शामिल न करना एक राजनीतिक फैसला हो सकता है, लेकिन यदि किसी पूरी आबादी के प्रतिनिधित्व को केवल उसकी अरब या फ़िलिस्तीनी पहचान के कारण अस्वीकार कर दिया जाए, तो यह लोकतांत्रिक समानता के सिद्धांत के लिए एक गंभीर सवाल बन जाता है।

क्या इसराइल में अरब नागरिक दूसरे दर्जे के नागरिक हैं?

इस सवाल का जवाब देने के लिए भावनाओं के बजाय कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक तथ्यों को सामने रखना आवश्यक है।

इसराइल के अरब नागरिकों को मतदान करने, चुनाव लड़ने और संसद में प्रतिनिधित्व हासिल करने का कानूनी अधिकार प्राप्त है। अरब सांसद भी निर्वाचित होते रहे हैं। इस लिहाज़ से उन्हें राजनीतिक व्यवस्था में भागीदारी का अधिकार प्राप्त है।

लेकिन कानूनी अधिकारों की मौजूदगी और व्यावहारिक समानता एक ही बात नहीं है। अरब नागरिकों के क्षेत्रों में विकास सुविधाओं, ज़मीन, आवास, रोज़गार, अपराधों की रोकथाम और सरकारी संसाधनों के न्यायसंगत वितरण से जुड़ी समस्याएँ लंबे समय से चर्चा का विषय रही हैं। अलग-अलग दौर में इसराइली सरकारों की नीतियों और अरब नागरिकों के साथ व्यवहार की आलोचना भी होती रही है।

यह स्थिति एक बुनियादी सवाल पैदा करती है कि क्या किसी देश में नागरिकों को केवल मतदान का अधिकार देना पर्याप्त है, या उन्हें शिक्षा, रोज़गार, सुरक्षा, संसाधनों और राजनीतिक प्रभाव के क्षेत्रों में भी समान अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है?

लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि इस बात में भी है कि विभिन्न राष्ट्रीय, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान रखने वाले नागरिकों के अधिकार किस हद तक सुरक्षित हैं।

समस्या यहूदी धर्म नहीं, बल्कि ज़ायोनीवाद की राजनीतिक व्याख्या है

फ़िलिस्तीन के मुद्दे को समझने के लिए यहूदी धर्म और ज़ायोनीवाद के बीच अंतर को समझना बहुत आवश्यक है।

यहूदी धर्म एक प्राचीन धर्म है, जिसका इतिहास हज़ारों वर्षों पुराना है। इसके विपरीत, ज़ायोनीवाद एक आधुनिक राजनीतिक और राष्ट्रीय आंदोलन है, जो उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में संगठित रूप में सामने आया। इसका मूल उद्देश्य यहूदियों के लिए एक राष्ट्रीय मातृभूमि की स्थापना करना था। ज़ायोनीवाद के भीतर भी विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएँ मौजूद रही हैं। इसलिए प्रत्येक यहूदी को ज़ायोनी कहना या प्रत्येक ज़ायोनी को एक ही राजनीतिक विचारधारा का समर्थक समझना सही नहीं है।

यहूदी समुदाय के इतिहास और फ़िलिस्तीन से उसके धार्मिक एवं ऐतिहासिक संबंध को स्वीकार करना एक बात है, जबकि इस संबंध को फ़िलिस्तीनी जनता के अधिकारों को सीमित करने, उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा करने या उन्हें उनकी मातृभूमि से बेदखल करने के औचित्य के रूप में पेश करना बिल्कुल दूसरी बात है।

फ़िलिस्तीन में सदियों से मुसलमान, ईसाई और यहूदी आबाद रहे हैं। वहाँ ऐसे यहूदी परिवार भी मौजूद थे, जिनकी जड़ें इसी भूमि में थीं। दूसरी ओर, उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों और बीसवीं सदी में ज़ायोनी आंदोलन के प्रभाव में विभिन्न देशों से बड़ी संख्या में यहूदी फ़िलिस्तीन आए। उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों से शुरू हुआ यह प्रवास ब्रिटिश शासन के दौरान बढ़ा और इसराइल की स्थापना के आसपास की घटनाओं के साथ एक गंभीर राष्ट्रीय संघर्ष में बदल गया।

1948 के युद्ध के दौरान और उसके परिणामस्वरूप लगभग सात लाख फ़िलिस्तीनी अपने घरों से बेदखल हुए या शरणार्थी बन गए। फ़िलिस्तीनी इस ऐतिहासिक त्रासदी को 'नकबा' कहते हैं। इसके बाद फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों, उनकी वापसी के अधिकार, ज़मीन, राष्ट्रीय पहचान और आत्मनिर्णय के सवाल फ़िलिस्तीन विवाद के प्रमुख विषय बन गए।

इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में फ़िलिस्तीन के मुद्दे को सभी यहूदियों और मुसलमानों के बीच धार्मिक युद्ध के रूप में पेश करना वास्तविकता को सीमित कर देता है। असल मुद्दा यह है कि एक राष्ट्र की राष्ट्रीय आकांक्षाओं को पूरा करने की प्रक्रिया में दूसरे राष्ट्र के बुनियादी अधिकारों को किस हद तक स्वीकार किया जाता है।

फ़िलिस्तीन के मूल निवासी कौन हैं?

फ़िलिस्तीन का इतिहास किसी एक धर्म के अधिकार का इतिहास नहीं, बल्कि विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों के लंबे ऐतिहासिक अस्तित्व का इतिहास है। फ़िलिस्तीनी मुसलमान, फ़िलिस्तीनी ईसाई और इस क्षेत्र से जुड़े यहूदी समुदाय भी इस इतिहास का हिस्सा रहे हैं।

इसलिए यह कहना सही नहीं है कि फ़िलिस्तीन के सभी यहूदी बाहर से आए हैं या सभी यहूदी फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों के विरोधी हैं। इसी तरह यह भी सही नहीं है कि फ़िलिस्तीन में किसी राष्ट्र के ऐतिहासिक संबंध को स्वीकार करने का अर्थ दूसरे राष्ट्र के अधिकारों से इनकार करना है।

फ़िलिस्तीनी जनता की बुनियादी माँग अपनी मातृभूमि, राष्ट्रीय पहचान, स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय के अधिकार से जुड़ी है। इन माँगों को स्वीकार करना यहूदी धर्म का विरोध नहीं, बल्कि न्याय के एक बुनियादी सिद्धांत की माँग है।

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है। किसी भूमि से ऐतिहासिक या धार्मिक संबंध होना और उस भूमि पर रहने वाले दूसरे राष्ट्र के अधिकारों को स्वीकार करना अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी हुई ज़िम्मेदारियाँ हैं।

यदि किसी राजनीतिक विचारधारा के तहत एक राष्ट्र के ऐतिहासिक दावे को दूसरे राष्ट्र के मौजूदा अधिकारों से अधिक महत्व दिया जाता है, तो उस विचारधारा की आलोचना करना उचित और आवश्यक है। आलोचना का निशाना धर्म या धर्म को मानने वाले सभी लोग नहीं, बल्कि वे राजनीतिक विचार और नीतियाँ होनी चाहिए, जो एक राष्ट्र के अधिकारों को दूसरे राष्ट्र के अधिकारों से ऊपर रखती हैं।

ज़ायोनीवाद और इसराइली राजनीति का बुनियादी विरोधाभास

इसराइल की अरब पार्टियों को सत्ता में शामिल करने या न करने का मामला इसी बड़े विरोधाभास का एक उदाहरण है।

एक ओर इसराइल स्वयं को लोकतांत्रिक राज्य कहता है और उसके अरब नागरिक चुनावों में हिस्सा लेते हैं। दूसरी ओर, अरब पार्टियों के साथ सरकार में सहयोग का विरोध यह सवाल पैदा करता है कि क्या अरब-फ़िलिस्तीनी पहचान रखने वाले नागरिकों को भी राज्य के भविष्य से जुड़े फैसलों में बराबर का भागीदार माना जाता है?

इसराइली राजनीति में कुछ ज़ायोनी पार्टियाँ राज्य की यहूदी राष्ट्रीय पहचान को सर्वोच्च प्राथमिकता देती हैं। उनके विचार में अरब पार्टियों को सत्ता में शामिल करने से राष्ट्रीय सुरक्षा या राज्य की विचारधारा के लिए समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। लेकिन आलोचकों के अनुसार, यही सोच इस खतरे को जन्म देती है कि राज्य की राष्ट्रीय पहचान को सभी नागरिकों की समान राजनीतिक भागीदारी से अधिक महत्व दिया जाने लगे।

यहाँ मतभेद का मूल आधार यह नहीं है कि एक पक्ष यहूदी है और दूसरा मुसलमान, बल्कि यह है कि राज्य की परिभाषा, राष्ट्रीय अधिकारों और राजनीतिक सत्ता में भागीदारी के सिद्धांत क्या होने चाहिए।

यदि अरब पार्टियों को उनकी नीतियों के आधार पर आलोचना का सामना करना पड़ता है, तो यह लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है। लेकिन यदि उन्हें केवल इसलिए अस्वीकार्य समझा जाए कि वे अरब-फ़िलिस्तीनी नागरिकों का प्रतिनिधित्व करती हैं, तो यह राजनीतिक समानता की अवधारणा के विपरीत होगा।

इसलिए फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर चर्चा करते समय यह देखना आवश्यक है कि कौन-सी पार्टी किस नीति का समर्थन करती है, किसने किस फैसले में क्या भूमिका निभाई और सत्ता में भागीदारी के संबंध में उसका व्यावहारिक रवैया क्या रहा है। राजनीतिक पार्टियों का विश्लेषण इसी आधार पर होना चाहिए, न कि धार्मिक पहचान के आधार पर सभी को एक ही श्रेणी में रख दिया जाए।

अरब पार्टियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती

इसराइल की अरब पार्टियों को एक साथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अपने नागरिकों की रोज़मर्रा की समस्याओं का समाधान करना है, सामाजिक और आर्थिक समानता के लिए संघर्ष करना है, फ़िलिस्तीनी राष्ट्रीय पहचान की रक्षा करनी है और ऐसी राजनीतिक व्यवस्था में अपनी भूमिका निभानी है, जिसमें राज्य की यहूदी राष्ट्रीय पहचान को बुनियादी संवैधानिक और राजनीतिक स्थान प्राप्त है।

इन पार्टियों के भीतर भी मतभेद हैं। राअम की व्यावहारिक राजनीति और सरकार में भागीदारी की रणनीति, हदाश, तआल और बलद के कुछ वैचारिक दृष्टिकोणों से अलग है। कुछ पार्टियाँ इसराइली व्यवस्था के भीतर रहकर सुधारों को प्राथमिकता देती हैं, जबकि कुछ राज्य की राष्ट्रीय परिभाषा और फ़िलिस्तीनी अधिकारों के सवाल पर बुनियादी बदलावों की समर्थक हैं।

इन मतभेदों के बावजूद, यदि ये पार्टियाँ नागरिक समानता, राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक न्याय और फ़िलिस्तीनियों के जायज़ राष्ट्रीय अधिकारों जैसे साझा उद्देश्यों पर एकजुट होकर काम कर सकें, तो उनकी राजनीतिक शक्ति बढ़ सकती है।

लेकिन यह भी एक वास्तविकता है कि संसद में सीटें हासिल करना और फ़िलिस्तीन के मुद्दे का बुनियादी समाधान निकालना दो अलग-अलग बातें हैं। अरब पार्टियाँ स्थानीय स्तर पर अपने नागरिकों के लिए सुविधाएँ हासिल करने में सफल हो सकती हैं, लेकिन फ़िलिस्तीनियों की स्वतंत्रता, कब्ज़े वाले क्षेत्रों की स्थिति और आत्मनिर्णय जैसे मुद्दों के समाधान के लिए व्यापक राजनीतिक बदलाव आवश्यक हैं।

मुस्लिम दुनिया के लिए क्या सबक है?

इसराइल की अरब पार्टियों की राजनीति मुस्लिम दुनिया के सामने भी कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है।

क्या राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम है या इसका उपयोग वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी किया जा सकता है? क्या अलग-अलग धार्मिक और वैचारिक विचार रखने वाले लोग साझा सामाजिक उद्देश्यों के लिए मिलकर काम कर सकते हैं? और क्या किसी राजनीतिक पार्टी की सफलता का मूल्यांकन उसके नारों के बजाय उसके व्यावहारिक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए?

अरब पार्टियों का उदाहरण बताता है कि एक ही राष्ट्रीय या भाषाई पहचान रखने वाले लोगों के धर्म, राज्य और राजनीति के बारे में अलग-अलग विचार हो सकते हैं। इसलिए किसी पूरे समाज या राजनीतिक समूह के बारे में एक जैसा फैसला देना उचित नहीं है।

इसी तरह राजनीतिक भागीदारी को ही सफलता का एकमात्र पैमाना भी नहीं बनाया जा सकता। असल सवाल यह है कि इस भागीदारी से नागरिकों के अधिकारों, राजनीतिक स्वतंत्रता और बुनियादी न्याय में कितनी वृद्धि हुई।

फ़िलिस्तीन के मामले में भी सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए। फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों का समर्थन किसी धर्म से नफ़रत करने के समान नहीं है और यहूदियों के धार्मिक या ऐतिहासिक संबंध को स्वीकार करने का अर्थ फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों से इनकार करना नहीं है। वास्तविक न्याय वही है, जो दोनों बातों को एक साथ स्वीकार करे और किसी एक राष्ट्र के अधिकारों को दूसरे राष्ट्र के अधिकारों का हनन करने का आधार न बनने दे।

फ़िलिस्तीन का मुद्दा धर्म से अधिक अधिकारों और न्याय का मामला है

इसराइल की अरब पार्टियों की राजनीति का अध्ययन हमें इस निष्कर्ष तक पहुँचाता है कि फ़िलिस्तीन का मुद्दा केवल यहूदियों और मुसलमानों के बीच धार्मिक मतभेद का मामला नहीं है, बल्कि यह ज़मीन, राष्ट्रीय पहचान, स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, समानता और सत्ता के बँटवारे से जुड़ा एक जटिल मुद्दा है।

राअम इस्लामी रुझान के साथ व्यावहारिक राजनीतिक भागीदारी का उदाहरण पेश करती है। हदाश अरब और यहूदी सहयोग तथा सामाजिक समानता पर ज़ोर देती है। तआल अरब नागरिकों के अधिकारों और फ़िलिस्तीन के मुद्दे को उठाती है, जबकि बलद अरब राष्ट्रीय पहचान और राज्य में समानता की माँग को प्रमुखता देती है।

इन पार्टियों की विचारधाराएँ अलग-अलग हैं, लेकिन इनकी राजनीतिक मौजूदगी एक बुनियादी सवाल खड़ा करती है: क्या कोई राज्य अपने सभी नागरिकों को उनकी धार्मिक और राष्ट्रीय पहचान से अलग रखते हुए समान राजनीतिक अधिकार देने के लिए तैयार है?

इसी सवाल के साथ फ़िलिस्तीन विवाद का बड़ा नैतिक पहलू भी सामने आता है। किसी राष्ट्र का ऐतिहासिक संबंध, धार्मिक आस्था या राष्ट्रीय स्मृति उसे दूसरे राष्ट्र के अधिकार समाप्त करने का असीमित अधिकार नहीं देती। फ़िलिस्तीनियों को स्वतंत्रता, सुरक्षा और आत्मनिर्णय का अधिकार मिलना चाहिए और यहूदी नागरिकों के जायज़ अधिकारों तथा सुरक्षा को भी स्वीकार किया जाना चाहिए।

इसलिए फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर आलोचना का वास्तविक निशाना यहूदी धर्म या सभी यहूदी नहीं, बल्कि वे राजनीतिक नीतियाँ और विचारधाराएँ होनी चाहिए, जो कब्ज़े, बेदखली, भेदभाव या किसी राष्ट्र की राष्ट्रीय पहचान को दबाने का कारण बनती हैं। इसी तरह किसी भी राजनीतिक पार्टी का मूल्यांकन उसके धर्म या राष्ट्रीयता के बजाय उसकी विचारधारा और व्यावहारिक भूमिका के आधार पर किया जाना चाहिए।

फ़िलिस्तीन का असली सवाल यह नहीं है कि कौन मुसलमान है, कौन ईसाई और कौन यहूदी; बल्कि असली सवाल यह है कि किसके अधिकारों को स्वीकार किया जा रहा है, किसके अधिकारों का हनन हो रहा है और क्या सभी के साथ समान न्याय किया जा रहा है?

जब तक इस सवाल का जवाब न्याय, समानता और मानवीय गरिमा के आधार पर नहीं दिया जाता, तब तक चुनाव, राजनीतिक गठबंधन और संसदीय बदलाव अपनी अहमियत के बावजूद फ़िलिस्तीन के बुनियादी मुद्दे का पूर्ण समाधान नहीं दे सकते।

Read 5 times