ईश्वरीय आतिथ्य-2

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ईश्वरीय आतिथ्य-2

पैग़म्बरे इस्लाम कहते हैं कि रमज़ान के महीने में तुम्हारा सांस लेना तसबीह अर्थात ईश्वर का जाप ह और इसमें तुम्हारी नींद उपासना है। इस महीने में तुम्हारे कार्य ईश्वर के निकट स्वीकार्य हैं और तुम्हारी प्रार्थनाएं भी स्वीकार्य हैं। बस तुम सदभावना और पवित्र मन से अपनी बातों को ईश्वर के समक्ष रखो और ईश्वर से प्रार्थना करो कि वह इस महीने में तुम्हें रोज़ा रखने का सामर्थ्य प्रदान करे और पवित्र क़ुरआन का पाठ करने या उसे पढ़ने का तुम्हें अवसर प्रदान करे। दुर्भाग्यपूर्ण व्यक्ति वह है जिसके पापों को ईश्वर इस महीने में क्षमा न करे। इस महीने की भूख और प्यास से प्रलय के दिन की भूख और प्यास को याद करो और निर्धनों तथा वंचितों को दान दो। श्रोताओ, ईश्वर ने मनुष्य को हर स्थिति में अपनी ज़बान पर नियंत्रण रखने का आदेश दिया है। क्योंकि देखने में यह आता है कि अनियंत्रित ज़बान, मनुष्य के बड़े-बड़े पापों का कारण बनती है। कहते हैं कि किसी पाप पर ईश्वर किसी को उस समय तक दंडित नहीं करता जबतक उस पाप को मनुष्य व्यवहारिक रूप न दे दे। मनुष्य के मन में बहुत सी बातें आती हैं। अच्छी भी और बुरी भी। इनको मन से बाहर लाकर लोगों के बीच फैलाने का काम सबसे पहले ज़बान करती है। इसी प्रकार किसी बुरे कार्य के बारे में सुनने का काम कान करते हैं परन्तु उन्हें आगे बढ़ाने का काम जीभ द्वारा ही किया जाता है।

लड़ाई-झगड़ा, अपशब्द कहना, किसी का मज़ाक़ उड़ाना, किसी का दिल दुखाना आदि यह सारे ही कार्य ज़बान करती है। यह छोटी सी ज़बान बड़ी-बड़ी लड़ाइयों, शत्रुता और मन-मुटाव का कारण बन जाती है। इसीलिए रोज़े में ज़बान पर नियंत्रण रखने पर बहुत अधिक बल दिया गया है और शायद इसीलिए रोज़े की स्थिति में सोने को भी पुण्य माना गया है क्योंकि उस स्थिति में मनुष्य की ज़बान काम नहीं करती और वह अनेक पापों से बचा रहता है।

ज़बान की एक अन्य ख़तरनाक बुराई, ग़ीबत अर्थात किसी के पीठ पीछे बातें बनाना है। यह बुराई, लोगों की बातें इधर-उधर फैलने का कारण बनने के अतिरिक्त, अकारण ही लोगों की दृष्टि में किसी व्यक्ति का सम्मान कम होने का कारण बनती है। फिर कही गयी बातें यदि सच हों तो भी चूंकि किसी के बारे में उसके पीठ पीछे कहा गया है इसलिए यह पाप मानी जाती हैं और यदि झूठ हों तब तो उसका दंड और भी बढ़ जाता है। ग़ीबत को क़ुरआन में इतना बड़ा पाप कहा गया है कि जैसे किसी ने अपने मरे हुए भाई का मांस खाया हो।

झूठ बोलना और झूठी सौगंध खाना भी ज़बान का ही काम है। इस प्रकार ज़बान, अनेक संबन्धों के टूटने, शत्रुता उत्पन्न करने, घृणा बढ़ाने, लोगों को दुखी और अपमानित करने का काम करने के कारण ही शरीर का ख़तरनाक अंग मानी जाती है। आध्यात्मिक शिक्षाओं के अनुसार ज़बान ही परलोक में मनुष्य के सबसे अधिक दंडित किये जाने का कारण बनेगी। जबकि दूसरी ओर यही ज़बान यदि नियंत्रित रहकर सकारात्मक कार्य करने लगे तो रोज़े की स्थिति में ईश्वर की प्रशंसा करके ही नहीं बल्कि किसी को शिक्षा देकर, पढ़ाई में किसी की सहायता करके, किसी के अच्छे कार्य की प्रशंसा करके, किसी की पीड़ा को बांटकर, किसी दुखी को सांत्वना देकर, किसी निराश को आशा बंधाकर, किसी को बुराई से रोककर, किसी के टूटते संबन्धों को जोड़कर और इसी प्रकार के अन्य छोटे-छोटे परन्तु महत्वपूर्ण कार्य करके न केवल अपने मालिक का सम्मान बढ़ा सकती है, परिवार और समाज में शांति प्रवाह कर सकती है बल्कि परलोक में मनुष्य को ईश्वर के समक्ष लज्जित होने और दंडित होने से भी बचा सकती है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि एक महीने तक ज़बान को नियंत्रित रखने का अभ्यास, बचे हुए ग्यारह महीनों में मनुष्य के व्यक्तित्व को कितना महान बना सकता है।

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