माहे रमजान उल मुबारक की फज़ीलत

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माहे रमजान उल मुबारक की फज़ीलत

माहे रमज़ान में दुआ की कुबूलियत की संभावना बहुत अधिक होती है, यह गुनाहों की माफी का महीना है।यह महीना शिया मुस्लिमों के लिए इमामों के नक्शेकदम पर चलते हुए अपनी रूह को शुद्ध करने और खुदा की निकटता प्राप्त करने का सबसे बड़ा मौका है।

शिया मसलक (Fiqh-e-Jafaria) के अनुसार रमजान उल मुबारक आत्मशुद्धि, ईश्वर-चेतना (तकवा), और कुरान के अवतरण (Nuzul-e-Quran) का पवित्र महीना है।

इसमें रोजा सिर्फ भूखा रहना नहीं, बल्कि रूहानी तरक्की, इबादत और गुनाहों से तौबा का जरिया है। इस महीने की मुख्य फजीलत रात में इबादत, दुआ, और कदर की रातों में खुदा की रहमत हासिल करना है।

शिया मसलक में रमजान की मुख्य फजीलतें:कुरान का नजूल: शिया मान्यताओं में, यह महीना उस महीने के रूप में प्रतिष्ठित है जिसमें कुरान की पहली आयतें नाज़िल हुईं, इसे कुरान के मार्गदर्शन का महीना माना जाता है।रात की इबादत,आमाल, लंबी नमाज़ों और दुआओं (जैसे-दुआ-ए-इफ्तिताह, दुआ-ए-सहर) पर विशेष जोर दिया जाता है।

शब-ए-कद्र (Night of Destiny): रमजान के आखिरी 10 दिनों, विशेषकर 19, 21 और 23वीं रात (शब-ए-कद्र) को बहुत अहमियत दी जाती है, जिसमें 21वीं रात (इमाम अली (अ.स.) की शहादत) का खास महत्व है।

तकवा (परहेजगारी): रोजे का मुख्य उद्देश्य आत्म-अनुशासन विकसित करना और अल्लाह के प्रति समर्पण बढ़ाना है, जिससे इंसान रूहानी तौर पर पाक हो सके।इफ्तार और सवाब: रोजेदार को इफ्तार कराने का सवाब बहुत बड़ा माना गया है, जिसे नेक काम (इबादत) के रूप में देखा जाता है।

दुआ की कुबूलियत: इस पवित्र महीने में इबादत और दुआएं कबूल होने की संभावना बहुत अधिक होती है, यह गुनाहों की माफी का महीना है।संक्षेप में, यह महीना शिया मुस्लिमों के लिए इमामों के नक्शेकदम पर चलते हुए अपनी रूह को शुद्ध करने और खुदा की निकटता प्राप्त करने का सबसे बड़ा मौका है।

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