यह रवैया केवल एक शैक्षिक गलती नहीं है, बल्कि आम लोगों की धार्मिक चेतना को प्रभावित करने और उन्हें धार्मिक एवं फ़िक़्ही व्यवस्था से बदज़न करने की एक खतरनाक प्रवृत्ति है।
लेखक: मौलाना सैयद करामत हुसैन शऊर जाफ़री
आजकल कुछ गुमराह और बेईमान ज़ाकिरों तथा शायरों का एक अफ़सोसनाक रवैया देखने को मिल रहा है। वे अहलेबैत (अ) से वर्णित कुछ रिवायतों को अपने विशेष अंदाज़ में पेश करके सच्चे उलमा और महान मरजए तक़लीद को आलोचना का निशाना बनाते हैं। कुछ रिवायतों के शब्दों को उनके संदर्भ और पृष्ठभूमि से अलग करके इस तरह बयान करते हैं, मानो इमामों (अ) की आलोचना का असली निशाना आज के फ़क़ीह, मुज्तहिद और मरजए तक़लीद हों। इस तरह की बयानबाज़ी के परिणामस्वरूप आम मोमिनों के मन में मरजइयत और तक़लीद को लेकर संदेह पैदा होते हैं।
यह रवैया केवल एक शैक्षिक गलती नहीं है, बल्कि आम लोगों की धार्मिक चेतना को प्रभावित करने और उन्हें धार्मिक एवं फ़िक़्ही व्यवस्था से बदज़न करने की एक खतरनाक प्रवृत्ति है।
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि इमामों (अ) के दौर में बनी उमय्या और बनी अब्बास की सरकारें स्थापित थीं। उन दौरों में दरबारी क़ाज़ी, फ़क़ीह, मुज्तहिद और सरकारी मुफ़्ती भी मौजूद थे, जो अहलेबैत (अ) की इमामत को स्वीकार नहीं करते थे, उनकी शिक्षाओं से दूर रहते थे और शासकों को खुश करने या अपनी व्यक्तिगत राय एवं क़ियास के आधार पर धार्मिक फैसले सुनाते थे। चर्चा के अधीन रिवायतों में की गई आलोचना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का संबंध अधिकतर इसी वर्ग के रवैये से है। इसलिए ऐसी रिवायतों को आज के उन फ़क़ीहों और महान मरजए तक़लीद पर लागू करना, जो अपना पूरा जीवन क़ुरआन, रसूले इस्लाम (स) की सुन्नत और अहलेबैत (अ) की शिक्षाओं की रोशनी में धार्मिक आदेशों के निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए समर्पित करते हैं, स्पष्ट रूप से अन्याय है।
इज्तिहाद को क़ियास, फ़िक़ाहत को व्यक्तिगत राय और मरजइयत को अहलेबैत (अ) की मुखालफत करार देना एक गंभीर वैचारिक भ्रम है।
यहां उन ज़ाकिरों और शायरों से कुछ बुनियादी सवाल हैं:
क्या उन्हें फ़िक़्ह और उसूल में इतनी महारत हासिल है कि वे वर्षों के शैक्षिक शोध और इज्तिहाद के परिणामस्वरूप जारी होने वाले महान मरजए तक़लीद के फ़तवों को खारिज कर सकें?
क्या केवल कुछ रिवायतें पढ़ लेने से कोई व्यक्ति मुज्तहिद बन जाता है?
क्या मिम्बर पर बैठने, शायरी करने और भावनात्मक भाषण देने से किसी व्यक्ति को धार्मिक मामलों में फ़तवा देने का अधिकार मिल जाता है?
अफ़सोस की बात है कि कुछ लोग अपनी शैक्षिक सीमाओं का उल्लंघन करते हुए आम लोगों को तक़लीद से बदज़न करते हैं, महान मरजए तक़लीद का अपमान करते हैं और अपने इस रवैये को अहलेबैत (अ) की मोहब्बत का नाम देते हैं।
हालांकि अहलेबैत (अ) से मोहब्बत का अर्थ उनके स्थापित किए हुए धार्मिक तंत्र और उनकी फ़िक़्ही शिक्षाओं को कमज़ोर करना नहीं है। ज़ाकिर की ज़िम्मेदारी मिम्बर से धर्म की शिक्षा देना और शायर का काम अपनी शायरी के माध्यम से अहलेबैत (अ) की मोहब्बत को बढ़ावा देना है, न कि अपनी सीमित जानकारी के आधार पर फ़क़ीहों और महान मरजए तक़लीद के खिलाफ़ लोगों के मन में नफ़रत पैदा करना।
मरजइयत और तक़लीद कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जिसे किसी ज़ाकिर के भाषण या शायर के कुछ अशआर के ज़रिए संदेहास्पद बना दिया जाए। यह एक गंभीर फ़िक़्ही व्यवस्था है, जिसकी बुनियाद विद्वानों की ओर रुजू करने और शरई अहकाम की जांच-पड़ताल पर आधारित है।
जो लोग अहलेबैत (अ) के नाम पर आम लोगों को सच्चे उलमा से दूर करते हैं, उन्हें दूसरों पर आपत्ति करने से पहले अपनी शैक्षिक हैसियत, धार्मिक ज़िम्मेदारी और मिम्बर की गरिमा का एहसास करना चाहिए।
मिम्बर व्यक्तिगत प्रसिद्धि हासिल करने, दूसरों का मज़ाक उड़ाने और वैचारिक अराजकता फैलाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक धार्मिक अमानत है। इस अमानत का हक़ अदा करना हर ज़ाकिर, ख़तीब और शायर की ज़िम्मेदारी है।
अहलेबैत (अ) की मोहब्बत के नाम पर मरजइयत के प्रति नफ़रत फैलाना तशय्यु की सेवा नहीं है, बल्कि यह उसी विचारधारा की शैक्षिक और धार्मिक व्यवस्था को कमज़ोर करने के समान है, जिसकी मोहब्बत का दावा किया जाता है।













