एकता और सामंजस्य सफलता की पहली शर्त है मजबूत रक्षा और वार्ता साथ-साथ चलनी चाहिए

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एकता और सामंजस्य सफलता की पहली शर्त है मजबूत रक्षा और वार्ता साथ-साथ चलनी चाहिए

आयतुल्लाहिल उज़्मा शेख़ जाफ़र सुब्हानी ने राष्ट्रपति कार्यालय के प्रमुख डॉ. मोहसिन हाजी मिर्ज़ाई से मुलाक़ात में राष्ट्रीय एकता और आपसी सामंजस्य को वर्तमान परिस्थितियों में सफलता की बुनियादी शर्त बताते हुए कहा कि इस्लाम न केवल दुश्मन के मुक़ाबले में शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त करने की शिक्षा देता है, बल्कि उपयुक्त परिस्थितियों में वार्ता का भी समर्थन करता है। इसलिए मजबूत रक्षा व्यवस्था और वार्ता, दोनों को साथ लेकर चलना चाहिए।

आयतुल्लाहिल उज़्मा शेख़ जाफ़र सुब्हानी ने राष्ट्रपति कार्यालय के प्रमुख डॉ. मोहसिन हाजी मिर्ज़ाई से मुलाक़ात के दौरान कहा कि यदि कोई राष्ट्र संकटों से बाहर निकलना चाहता है, तो उसे सबसे पहले एकता और सामंजस्य को बढ़ावा देना होगा।

उन्होंने क़ुरआन की आयत "وَاعْتَصِمُوا بِحَبْلِ اللّٰهِ جَمِيعًا وَ لَا تَفَرَّقُوا"  की व्याख्या करते हुए कहा कि जिस प्रकार कुएँ में गिरे हुए व्यक्ति को बाहर निकालने के लिए रस्सी की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार समस्याओं और संकटों से मुक्ति पाने के लिए राष्ट्रीय एकता और आपसी सहयोग अनिवार्य है।

आयतुल्लाह सुब्हानी ने राष्ट्रपति मसऊद पेज़ेश्कियान के लिए शुभकामनाएँ व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में देश की ज़िम्मेदारी संभाली है। इसलिए उन्हें पर्वत की भाँति दृढ़ रहना चाहिए, अल्लाह से सहायता माँगनी चाहिए और निराशा या पराजय की भावना को स्वयं पर हावी नहीं होने देना चाहिए।

वार्ता के विषय पर चर्चा करते हुए उन्होंने इमाम ख़ुमैनी का एक प्रसंग सुनाया और कहा कि हर मामले में इस्लामी शिक्षाएँ ही मापदंड होनी चाहिए। उनके अनुसार कुछ लोग वार्ता को पसंद नहीं करते, लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि इस्लाम इस विषय में क्या मार्गदर्शन देता है।

उन्होंने कहा कि इस्लाम एक ओर दुश्मन के मुक़ाबले में शक्ति और तैयारी का आदेश देता है, जबकि दूसरी ओर शांति और वार्ता का मार्ग भी खुला रखता है। उनके अनुसार वार्ता अपने आप में कोई नकारात्मक चीज़ नहीं है, बल्कि उसकी सफलता या असफलता उसके परिणामों पर निर्भर करती है। यदि वार्ता के माध्यम से देश की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय हितों और जनता की माँगों की रक्षा संभव हो, तो यह एक सकारात्मक कदम होगा; अन्यथा उचित निर्णय लिया जाना चाहिए।

आयतुल्लाह सुब्हानी ने ज़ोर देकर कहा कि सभी को वार्ता प्रक्रिया का समर्थन करना चाहिए, लेकिन अंतिम राय उसके परिणामों को देखकर ही बनाई जानी चाहिए। उनके अनुसार सबसे अच्छा रास्ता यह है कि देश एक ओर मज़बूत रक्षा क्षमता रखे और दूसरी ओर संवाद और वार्ता के द्वार भी खुले रखे, क्योंकि बहुत कुछ दूसरे पक्ष के व्यवहार पर निर्भर करता है।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने सुझाव दिया कि पिछले चार दशकों में विभिन्न ज़िम्मेदारियाँ निभाने वाले अनुभवी व्यक्तियों को भी परामर्श प्रक्रिया में शामिल किया जाए, क्योंकि उनके अनुभव और विचार देश और राष्ट्र के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

मुलाक़ात की शुरुआत में राष्ट्रपति कार्यालय के प्रमुख डॉ. मोहसिन हाजी मिर्ज़ाई ने सरकार की महत्वपूर्ण नीतियों, योजनाओं और हालिया युद्धकालीन परिस्थितियों के दौरान किए गए उपायों के बारे में विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की।

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