मोमेनीन दुआ-ए-फ़रज को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ

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मोमेनीन दुआ-ए-फ़रज को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ

इस्लामी क्रांति के शहीद नेता हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने फ़रमाया है कि दुआ «अल्लाहुम्मा कुन लेवलीयेक» सिर्फ एक दुआ नहीं है, बल्कि इमाम ज़माना हज़रत इमाम महदी (अ) से संबंध और संपर्क का प्रभावकारी साधन है।

इस्लामी क्रांति के शहीद नेता हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने फ़रमाया है कि दुआ «अल्लाहुम्मा कुन लेवलीयेक» सिर्फ एक दुआ नहीं है, बल्कि इमाम ज़माना हज़रत इमाम महदी (अ) से संबंध और संपर्क का प्रभावकारी साधन है।

हज़रत आयतुल्लाह शहीद ख़ामेनेई (र) ने दुआ-ए-फ़रज की अहमियत बयान करते हुए कहा कि मोमेनीन जब «अल्लाहुम्मा कुन लेवलीयेक» की तिलावत करते हैं, तो दरअसल वे अपने इमाम-ए-ज़माना (अ) से संपर्क स्थापित करते हैं और स्वयं को आपकी इनायत और दुआ के दायरे में ले आते हैं।

उन्होंने कहा कि दुआ-ए-फ़रज का पढ़ना मात्र शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि इमाम-ए-अस्र (अ) से दिली संबंध मजबूत करने का एक साधन है। इस दुआ के माध्यम से मनुष्य अपने ज़माने के इमाम (अ) के लिए दुआ करता है और इसके परिणामस्वरूप इमाम की दुआओं से भी फ़ैयाब होता है।

शहीद नेता ने अपने एक बयान में फरमाया: "जब आप «अल्लाहुम्मा कुन लेवलीयेक» पढ़ते हैं, तो हक़ीकत में अपने इमाम-ए-ज़माना (अ) से संपर्क स्थापित करते हैं, क्योंकि अइम्मा (अ) ने फरमाया है कि हमारे लिए दुआ करो, हम भी तुम्हारे लिए दुआ करेंगे।"

उन्होंने ज़ोर दिया कि मोमेनीन को चाहिए कि वे दुआ-ए-फ़रज को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ और हज़रत वली-ए-अस्र (अ) की नुसरत, सलामती और ज़ुहूर के लिए ख़ुलूस-ए-दिल से दुआ करें।

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