मस्जिदों का खाली होना दुश्मन के प्रभाव का रास्ता खोलता है

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मस्जिदों का खाली होना दुश्मन के प्रभाव का रास्ता खोलता है

हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन हुज्जतुल्लाह शाहसनाई ने कहा कि मस्जिद केवल नमाज़ पढ़ने की जगह नहीं, बल्कि इंसान की आध्यात्मिक और सामाजिक तरबीयत का केंद्र है।

उन्होंने कहा कि मस्जिदों से युवाओं और किशोरों का दूर होना दुश्मन के सांस्कृतिक हमले की सफलता का संकेत है। पैग़म्बरे इस्लाम स.ल.व. के दौर में मस्जिद इबादत के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक और सैन्य मामलों के संगठन का भी केंद्र थी।

उन्होंने इमाम ख़ुमैनी और रहबरे इंक़लाब की उस बात का उल्लेख किया कि मस्जिदें इस्लामी समाज की मज़बूत चौकियाँ हैं। उनके अनुसार अगर आज मस्जिदें फिर से युवाओं से आबाद हो जाएँ तो समाज में अनेक बुराइयों और असामाजिक समस्याओं का मुकाबला किया जा सकता है।

शाहसनाई ने कहा कि दुश्मन आज मस्जिदों को सीधे नष्ट करने के बजाय युवाओं को मस्जिदों से दूर करके उन्हें कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। इसलिए अर्बईन के मौक़े पर मोअक्किबों और जुलूसों में दिखाई देने वाली धार्मिक ऊर्जा को मस्जिदों तक पहुँचाना ज़रूरी है।

उन्होंने “वली-ए-ख़ुदा से अमली बैअत” के पाँच पहलुओं में मुसलमानों के बीच रहमत, समय पर नमाज़, अल्लाह के लिए इख़लास और उसकी रज़ामंदी हासिल करना आदि को महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने यह भी कहा कि मस्जिदों की आबादी और सक्रियता समाज की दुनिया और आख़िरत दोनों की बेहतरी से जुड़ी है। इस्फ़हान प्रांत में 6,000 से अधिक मस्जिदों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यदि ये सभी सक्रिय हो जाएँ तो समाज में बहुत बड़ी सेवा और बरकत पैदा हो सकती है।

अंत में उन्होंने हया, पर्दा और पाकीज़गी की अहमियत पर ज़ोर देते हुए चेतावनी दी कि यदि समाज से हया और इफ़्फ़त खत्म हो जाए तो आधुनिक हथियार भी देश को दुश्मन के प्रभाव से नहीं बचा सकता।

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