हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन मुहम्मद मुख्तारी ने कहां, हिजाब और शालीनता से जुड़े कानून की अनदेखी के प्रति चेतावनी देते हुए कहा कि दुश्मन की लड़ाई शिया और सुन्नी या फ़ारस और कुर्द से नहीं, बल्कि इस्लाम और ईरान के मूल अस्तित्व से है। इसलिए संविधान और विलायत-ए-फ़क़ीह के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर एकता बनाए रखना एक ऐसी आवश्यकता है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन मुहम्मद मुख्तारी, ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) और इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) के जन्मदिवस के साथ इन दिनों के संयोग का उल्लेख करते हुए तौहीद को नुबूवत और इमामत की सबसे बड़ी सौगात बताया।
उन्होंने कहा कि पैग़म्बरों को भेजे जाने का उद्देश्य इंसान को अल्लाह और ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ की हक़ीक़त से परिचित कराना है। यह केवल एक नारों वाला वाक्य नहीं, बल्कि अस्तित्व की व्यवस्था और सभी प्राणियों के उस बेनियाज़ परवरदिगार पर निर्भर होने की वास्तविकता का बयान है।
उन्होंने कहा कि तौहीद इंसान की सोच और व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए। यदि इंसान अल्लाह को सही रूप से पहचाने और उसी के अनुसार जीवन बिताए तो उसका फल ईमान, तक़वा, सुकून और उम्मीद के रूप में सामने आता है। इसके विपरीत, दौलत और ताक़त भी इंसान के वास्तविक सहारे की कमी को पूरा नहीं कर सकती।
हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन मुख्तारी ने ‘तौहीद और साम्राज्यवाद’ के टकराव को सबसे निर्णायक संघर्ष बताते हुए कहा कि इतिहास गवाह है कि ज़ालिम और साम्राज्यवादी ताक़तों पर भरोसा करने का परिणाम अपमान और तबाही के अलावा कुछ नहीं रहा।
उन्होंने सरकारी सप्ताह के अवसर पर शहीद राजाई, बहोनर और रईसी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि जनता की सेवा अधिकारियों के लिए ऐसा मूल्यवान अवसर है, जिसके माध्यम से वे इतिहास में स्थायी स्थान बना सकते हैं।
हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन मुख्तारी ने अपने भाषण के एक अन्य हिस्से में एकता को आज समाज की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता बताया। उन्होंने कहा कि दुश्मन की दुश्मनी शिया और सुन्नी या फ़ारस और कुर्द से नहीं है, बल्कि उसका निशाना इस्लाम और ईरान है। इसलिए संविधान, इस्लामी मूल्यों और विलायत-ए-फ़क़ीह के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर पवित्र एकता को बनाए रखना एक अनिवार्य आवश्यकता है।
उन्होंने साथ ही हिजाब और शालीनता के कानून की अनदेखी की आलोचना की और इसे ईमानदार जनता तथा शहीदों के परिवारों की इच्छा के विरुद्ध बताया।
उन्होंने कहा कि ईरानी राष्ट्र आशूरा की संस्कृति से प्रेरणा लेते हुए कभी अपमान स्वीकार नहीं करेगा और ‘हैहात मिन्नज़-ज़िल्लह’ (अपमान हमें स्वीकार नहीं) का नारा आज भी इस देश की गरिमा और स्वतंत्रता का मार्गदर्शक बना रहेगा।













