सहारनपुर;एक मस्जिद, एक कुआँ, और ढेर सारे सवाल?

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सहारनपुर;एक मस्जिद, एक कुआँ, और ढेर सारे सवाल?

दोस्तों, सहारनपुर की उस मस्जिद का मामला सिर्फ एक इमारत गिराने भर का नहीं। यह हमारे इतिहास, हमारी विरासत, और हमारे न्याय पर उठते सवालों का मामला है।

सोचिए:
1)एक मस्जिद जो कम से कम 100-150 साल पुरानी थी, जिसके पास 1911 का बिजली बिल और वक्फ बोर्ड में रजिस्ट्रेशन जैसे दस्तावेज़ थे।

2) सबसे दिलचस्प बात,इस मस्जिद को गिराने के बाद वहां से एक पुराना कुआँ निकला, जिसे एएसआई (ASI) जाँचेगी। यानी इस जगह का इतिहास मस्जिद और कलेक्ट्रेट दोनों से भी पुराना हो सकता है।

3)अदालत ने "बेदखली" (eviction) का आदेश दिया था, "विरासत" (demolition) का नहीं – फिर बुलडोज़र क्यों चले?
4)अगर ज़मीन अंग्रेज़ों की थी (जैसा कि 1888-89 के रिकॉर्ड में है), तो अंग्रेज़ों ने अपने ज़माने में इस मस्जिद को क्यों नहीं रोका? ये सवाल क्यों नहीं पूछा जा रहा?

और सबसे बड़ा सवाल –
प्रशासन को 1888-89 का रिकॉर्ड तो सही लगा,
लेकिन मुस्लिम पक्ष के 1911 के बिजली बिल, 1926 के राजस्व रिकॉर्ड, और वक्फ बोर्ड के 70 साल पुराने पंजीकरण को "नाकाफी" करार दे दिया गया।

ये तो वही बात हो गई –
"कलम भी तुम्हारी, कागज़ भी तुम्हारा,
तुम झूठ को सच कर दो, काज़ी भी तुम्हारा!"

शिकायत किसी और की ज़मीन का मामला नहीं थी, बल्कि एक स्थानीय कार्यकर्ता (विकास त्यागी) ने सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्ज़े की बात कही – और अदालत ने उसे मान लिया।

लेकिन क्या सिर्फ एक रिकॉर्ड (1888-89) को आधार बनाकर, 100-150 साल पुरानी धार्मिक संरचना को बुलडोज़र से ढहा देना... क्या ये इंसाफ़ है?

जब एक पुराना कुआँ ही इस जगह की पुरानी पहचान बताता है, तो क्या ये मस्जिद सच में "अवैध" थी? या फिर ये ज़ुल्म सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि वो एक मस्जिद थी?

बताओ दोस्तों, क्या ये सच में न्याय है या महज़ किसी की भावनाओं के साथ खिलवाड़?

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