म्यांमार में उम्मत की एकता सम्मेलन: विद्वानों ने आपसी पहचान, सम्मान और साझा हितों में सहयोग पर जोर दिया

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म्यांमार में उम्मत की एकता सम्मेलन: विद्वानों ने आपसी पहचान, सम्मान और साझा हितों में सहयोग पर जोर दिया

हाजी वान श्यू ने कहा कि शिया मुसलमान अहले-बैत-ए-रसूल (स) को जो विशेष महत्व देते हैं, हमें भी उससे सीख लेनी चाहिए।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए यूनियन ऑफ मुस्लिम यूथ म्यांमार के प्रतिनिधि अल्हाज तुन नाइंग ऊन ने कहा कि पैगंबर-ए-अकरम (स) का उद्देश्य एक एकजुट उम्मत का गठन करना था। इसलिए हमें भेदभाव और विभाजन को खत्म करके एक-दूसरे के करीब आना चाहिए। यह एकता केवल बातों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए।
इस्लामिक रिसर्च एसोसिएशन ‘ओया’ के अध्यक्ष मेंग श्वे ने कहा कि हमारे बीच कई समानताएं मौजूद हैं। उन्होंने सहाबा-ए-रसूल का उदाहरण देते हुए कहा कि पुराने समय में सीमित संसाधनों के बावजूद वे एक-दूसरे के करीब और एकजुट रहते थे। इसलिए हमें भी उनसे सीख लेकर एकजुट होना चाहिए।
मुगल शिया जामा मस्जिद के उपाध्यक्ष और म्यांमार के शिया मुस्लिम केंद्र के उपाध्यक्ष हाजी क्याव सो ने कहा कि हमारी मस्जिदें सभी मुसलमानों के लिए खुली हैं। हर मुसलमान स्वतंत्र रूप से वहां आ सकता है और अपने धार्मिक कार्य तथा कर्तव्यों को पूरा कर सकता है।
जामिया अल-मुस्तफा के प्रतिनिधि हुज्जतुल इस्लाम डॉ. हिबतुल्लाह सद्र सादात ज़ादेह ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए दो महत्वपूर्ण विषयों, यानी इस्लामी एकता के महत्व तथा पैगंबर-ए-अकरम (स) के गुणों और नैतिक आदर्शों पर चर्चा की।
उन्होंने कहा कि आज पूरी इस्लामी दुनिया दुश्मनों के हमलों का निशाना बनी हुई है। इसलिए हमें पहले से कहीं अधिक एकता की आवश्यकता है।
उन्होंने पैगंबर-ए-अकरम (स) के आदर्श जीवन, उनकी विनम्रता, समाज के विभिन्न वर्गों, विशेष रूप से कमजोर वर्गों के साथ उनके अच्छे व्यवहार और लोगों के प्रति उनकी सहानुभूति का भी उल्लेख किया।
उम्मत की एकता पर आयोजित सम्मेलन के अंत में एक संयुक्त घोषणा जारी की गई। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि पैगंबर-ए-अकरम (स) के जन्मोत्सव के कार्यक्रम मुसलमानों के बीच प्रेम, भाईचारे, आपसी सम्मान और सहयोग को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इसलिए इन कार्यक्रमों में शिया और सुन्नी विद्वानों, धार्मिक नेताओं, बुद्धिजीवियों, युवाओं और समाज के प्रतिनिधियों की संयुक्त भागीदारी आवश्यक है।
घोषणा में आगे कहा गया कि मतभेद वाले मुद्दों पर चर्चा के दौरान निंदा, अपमान, नफरत फैलाने वाले और भड़काऊ शब्दों के इस्तेमाल तथा एक-दूसरे की पवित्र हस्तियों के अनादर से बचना चाहिए।
संयुक्त घोषणा में आपसी पहचान, सम्मान और साझा हितों के क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया।

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