हौज़ा ए इल्मिया हिंदुस्तान के एहया का अज़्म ज़रूरी है।

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दफ्तर-ए-नुमाइंदगी आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली हुसैनी सीस्तानी दाम-ज़िल्लुहू, बाब-उन-नजफ़ लखनऊ की निगरानी में, वेफ़ाक़ुल मदारिसिद दीनिया के एहतेमाम से, उलेमा, तुल्लाब और मोमिनीन-ए-लखनऊ की जानिब से मरज-ए-तक़लीद आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद मूसा शुबैरी ज़ंजानी रिज़वानुल्लाह अलैह की रेहलत पर हुसैनिया क़ाएमा ख़ातून, सज्जाद बाग़ में जलसा-ए-ताज़ियत व मजलिस-ए-तरहीम मुनअक़िद हुई।

लखनऊ। दफ्तर-ए-नुमाइंदगी आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली हुसैनी सीस्तानी दाम-ज़िल्लुहू, बाब-उन-नजफ़ लखनऊ की निगरानी में, वेफ़ाक़ुल मदारिसिद दीनिया के एहतेमाम से, उलमा, तुल्लाब और मोमिनीन-ए-लखनऊ की जानिब से मरज-ए-तक़लीद आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद मूसा शुबैरी ज़ंजानी रिज़वानुल्लाह अलैह की रेहलत पर हुसैनिया क़ाएमा ख़ातून, सज्जाद बाग़ में जलसा-ए-ताज़ियत व मजलिस-ए-तरहीम मुनअक़िद हुई।

जलसा-ए-ताज़ियत का आग़ाज़ मौलाना क़मरुल हसन ज़ैनबी ने तिलावत-ए-कुरआन-ए-करीम से किया।

जलसे से ख़िताब करते हुए आयतुल्लाहिल उज़मा सीस्तानी द०ज़ि० के नुमाइंदा हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद अशरफ अली अल-ग़रवी ने आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद मूसा शुबैरी ज़ंजानी र.अ. की रेहलत पर ताज़ियत पेश करते हुए उन्हें हौज़ा-ए-इल्मिया के अज़ीम असातीन, फ़क़ीह-ए-अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम, आलिम-ए-रब्बानी और साहिब-ए-ख़शियत व तक़वा क़रार दिया।

हौज़ा ए इल्मिया हिंदुस्तान के एहया का अज़्म ज़रूरी है।मौलाना सैयद अशरफ अली अल-ग़रवी

उन्होंने कहा कि एक आलिम-ए-रब्बानी के इंतिक़ाल से ऐसा इल्मी ख़ला पैदा होता है जो आसानी से पुर नहीं होता। आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानी इल्म-ए-रिजाल व दिरायत में महारत, फ़िक़्ह व उसूल में तबह्हुर, तवील तदरीसी ख़िदमात, सादगी और ख़ामोश इल्मी जद्दोजहद के लिए मुमताज़ मक़ाम रखते थे।

मौलाना अशरफ अल-ग़रवी ने आयतुल्लाहिल उज़मा सीस्तानी द०ज़ि० के ताज़ियती पैग़ाम का हवाला देते हुए उनके बुलंद इल्मी मक़ाम और हौज़ा-ए-इल्मिया में मुमताज़ हैसियत को उजागर किया।

उन्होंने कहा कि आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानी र.अ. की रेहलत, हौज़ा-ए-इल्मिया हिंदुस्तान की इल्मी सूरत-ए-हाल पर संजीदगी से ग़ौर करने और उसके एहया के अज़्म का मौक़ा है। हौज़ात की मज़बूती के लिए उलमा व तुल्लाब को बुज़ुर्ग उलमा की सीरत से रहनुमाई लेते हुए बुलंद इल्मी अहदाफ़, मुसलसल मेहनत और उलूम-ए-अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम से मज़बूत वाबस्तगी इख़्तियार करनी होगी।

हौज़ा ए इल्मिया हिंदुस्तान के एहया का अज़्म ज़रूरी है।मौलाना सैयद अशरफ अली अल-ग़रवी

उन्होंने ज़ोर दिया कि हौज़ा-ए-इल्मिया की तरक़्क़ी किसी बैरूनी मदद का इंतिज़ार करने के बजाए ख़ुद उलमा, तलबा और अहल-ए-हौज़ा की ज़िम्मेदारी है। आख़िर में उन्होंने इमाम-ए-ज़माना अ.ज., मराजे-ए-एज़ाम, हौज़ात-ए-इल्मिया, तुल्लाब और मरहूम के अहल-ए-ख़ाना की ख़िदमत में ताज़ियत व तस्लीयत पेश की।

हौज़ा ए इल्मिया हिंदुस्तान के एहया का अज़्म ज़रूरी है।मौलाना सैयद अशरफ अली अल-ग़रवी

मौलाना मकातिब अली ख़ान ने मरज-ए-आला आयतुल्लाहिल

उज़मा सैयद अली हुसैनी सीस्तानी द०ज़ि० और तमा मराजे-ए-एज़ाम व उलमा-ए-किराम की ख़िदमत में ताज़ियत पेश करते हुए कहा कि उनकी रेहलत से आलम-ए-तशय्यो में एक ऐसा इल्मी ख़ला पैदा हुआ है जिसका पुर होना आसान नहीं।

उन्होंने मरहूम को अज़ीम मरज-ए-तक़लीद, बुलंद-पाया फ़क़ीह, मुत्तक़ी, साहिब-ए-अख़लाक़ और मुमताज़ उस्ताद क़रार दिया और हज़रत मासूमा स.अ. के हरम में उनकी नमाज़-ए-जमाअत और क़ुम में उनकी तदरीसी ख़िदमात को ख़िराज-ए-तहसीन पेश किया।

मौलाना मुस्तफ़ा अली ख़ान अदीब-उल-हिंदी ने इमाम-ए-ज़माना अ.ज., मराजे-ए-एज़ाम, हौज़ात-ए-इल्मिया, मोमिनीन और मरहूम के ख़ानदान की ख़िदमत में ताज़ियत पेश की। उन्होंने मरहूम की इल्मी ख़िदमात, तवील तदरीसी ज़िंदगी, तक़वा और हरम-ए-हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ. व मदरसा फ़ैज़िया में नमाज़-ए-जमाअत का ज़िक्र करते हुए कहा कि एक अज़ीम आलिम की रेहलत ऐसा ख़ला पैदा करती है जो आसानी से पुर नहीं होता।

उन्होंने कहा कि यह मौक़ा हौज़ा-ए-इल्मिया हिंदुस्तान की सूरत-ए-हाल पर ग़ौर और उसकी तजदीद-ए-हयात का है। हमें अपने मदारिस को मज़बूत, मेयारी और जदीद तक़ाज़ों से हम-आहंग करने के लिए ख़ुद अमली कोशिश करनी होगी। बुलंद अहदाफ़ तय करके हौज़ात की तरक़्क़ी के लिए जद्दोजहद करना ही ऐसे बुज़ुर्ग आलिम की याद का हक़ीक़ी तक़ाज़ा है।

जामिया सुल्तानिया लखनऊ के उस्ताद मौलाना सैयद मोहम्मद मूसा रिज़वी ने कहा कि आलिम-ए-दीन के इंतिक़ाल से ऐसा इल्मी ख़ला पैदा होता है जो आसानी से पुर नहीं होता।

उन्होंने बताया कि आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानी र.अ. ने आयतुल्लाह सैयद हुसैन बुरूजरदी र.अ., आयतुल्लाह सैयद मोहम्मद हुज्जत कूह-कमरी र.अ., आयतुल्लाह सैयद सदरुद्दीन सद्र र.अ., आयतुल्लाह मोहक़्क़िक़ दामाद र.अ. और इराक़ में आयतुल्लाह सैयद अबुल क़ासिम ख़ूई र.अ. व आयतुल्लाह सैयद मोहसिन हकीम र.अ. जैसे जलील-उल-क़द्र असातज़ा से कस्ब-ए-फ़ैज़ किया और फ़िक़्ह व उसूल में दर्स-ए-ख़ारिज दिया।

हौज़ा ए इल्मिया हिंदुस्तान के एहया का अज़्म ज़रूरी है।मौलाना सैयद अशरफ अली अल-ग़रवी

आख़िर में मजलिस-ए-तरहीम हुई जिसे प्रिंसिपल हौज़ा-ए-इल्मिया हज़रत ग़ुफ़रानमआब र.अ., मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने ख़िताब किया। उन्होंने कहा कि मरहूम का इल्म-ए-रिजाल में तख़स्सुस, फ़िक़्ह व उसूल में बुलंद मक़ाम, तहक़ीक़ी ख़िदमात, तक़वा, सादगी और शोहरत से बे-नियाज़ी क़ाबिल-ए-तक़लीद है। उनकी इल्मी तसानीफ़ और तहक़ीक़ी आसार अहल-ए-इल्म के लिए गिरां-क़द्र सरमाया हैं, जिन्हें नई नस्ल तक मुन्तक़िल करना ज़रूरी है।

उन्होंने उलमा व तुल्लाब को आइम्मा-ए-अहल-ए-बैत अ.मु.स. की इल्मी रिवायत को आगे बढ़ाने और हौज़ात-ए-इल्मिया को मज़बूत बनाने की दावत दी।

जलसा-ए-ताज़ियत में निज़ामत के फ़राइज़ मौलाना सैयद अली हाशिम आब्दी ने अंजाम दिए। इस मौके पर मौलाना सैयद अज़हर हुसैन (भोपाल), मौलाना सैयद मोहम्मद हुसैन रिज़वी, मौलाना सैयद मोहम्मद अब्बास वाएज़, मौलाना सैयद मुंतज़िर मेहदी नजफ़ी, मौलाना शब्बीर अली क़ुम्मी, मौलाना नजफ़, मौलाना सैयद अहसन नवाब, मौलाना तंज़ीम हैदर, मौलाना हसन अब्बास मारूफ़ी, मौलाना सैयद अमीर अब्बास समेत दीगर उलमा व मोमिनीन ने शिरकत की।

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