दुश्मन के घुसपैठ के तरीकों को पहचानना क्रांति के इतिहास का एक महत्वपूर्ण सबक है

Rate this item
(0 votes)
दुश्मन के घुसपैठ के तरीकों को पहचानना क्रांति के इतिहास का एक महत्वपूर्ण सबक है

राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ने कहा कि दुश्मन हमेशा अलग-अलग तरीकों से समाज और देश की व्यवस्थाओं में घुसपैठ करने की कोशिश करता रहा है। ईरानी क्रांति का इतिहास बताता है कि दुश्मन की घुसपैठ और उसकी योजनाओं को समझने के लिए सही समझ, जागरूकता और इतिहास का गहरा अध्ययन ज़रूरी है।

राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ने कहा कि दुश्मन हमेशा अलग-अलग तरीकों से समाज और देश की व्यवस्थाओं में घुसपैठ करने की कोशिश करता रहा है। ईरानी क्रांति का इतिहास बताता है कि दुश्मन की घुसपैठ और उसकी योजनाओं को समझने के लिए सही समझ, जागरूकता और इतिहास का गहरा अध्ययन ज़रूरी है।

हाज हसन ज़ारेई, जो आठ साल के युद्ध के पूर्व सैनिक और कमांडर रहे हैं, ने हौज़ा न्यूज़ के संवाददाता से बातचीत में आठ साल के पवित्र रक्षा युद्ध की यादों को सम्मानपूर्वक याद करते हुए कहा कि इस युद्ध के इतिहास का अध्ययन केवल युद्ध शुरू होने के समय से नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसे सही तरीके से समझने के लिए युद्ध शुरू होने से पहले की राजनीतिक और सुरक्षा परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि पवित्र रक्षा के दौर को कई हिस्सों में बांटा जा सकता है। इनमें युद्ध से पहले की घटनाएं, अंतरिम सरकार का रवैया, दुश्मन का हमला, सैनिकों के सैन्य अभियान, ख़ुर्रमशहर की आज़ादी, उसके बाद के घटनाक्रम और अंत में युद्धविराम प्रस्ताव को स्वीकार करना शामिल है। इन सभी चरणों में महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं।

राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ने कहा कि युद्ध शुरू होने से पहले ईरान को कुर्दिस्तान, गोनबदकावूस, बंदर अंज़ली, बंदर तुर्कमन और सीस्तान व बलूचिस्तान जैसे इलाकों में विभिन्न समस्याओं और असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा था। अलग-अलग सरकार विरोधी समूह देश में अशांति पैदा करने और नई स्थापित इस्लामी व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद दुश्मनों को उम्मीद थी कि नई व्यवस्था ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सकेगी और कुछ महीनों के दबाव तथा आपसी मतभेद पैदा करके क्रांति को खत्म किया जा सकता है। लेकिन इस्लामी गणराज्य की स्थापना और जनता की भागीदारी के कारण उनकी उम्मीदें वास्तविक परिस्थितियों से अलग साबित हुईं।

ज़ारेई ने कहा कि उस समय क्रांति के रास्ते को लेकर कुछ विचारों में मतभेद भी मौजूद थे। इमाम ख़ुमैनी (रह.) क्रांति की इस्लामी पहचान और देश की स्वतंत्रता पर जोर देते थे। उन्होंने इस्लामी क्रांति को केवल राष्ट्रवादी सोच के दायरे में सीमित करने की अनुमति नहीं दी।

पवित्र रक्षा युद्ध के पूर्व सैनिक ने आगे कहा कि उस दौर का एक महत्वपूर्ण मुद्दा सेना की स्थिति थी। ऐसे समय में जब देश को एक मजबूत और संगठित रक्षा व्यवस्था की ज़रूरत थी, सैनिकों की सेवा अवधि कम करने और सैनिकों के तैनाती स्थानों में बदलाव जैसे फैसले किए गए। उनके अनुसार, इन फैसलों का सेना के एक हिस्से की एकता और तैयारी पर प्रभाव पड़ा।

उन्होंने कहा कि इसी दौरान दुश्मनों और सरकार विरोधी समूहों ने सेना को समाप्त करने की कोशिश की। लेकिन इमाम ख़ुमैनी (रह.) ने सेना को बनाए रखने और उसमें सुधार व सफाई पर जोर दिया। उनका मानना था कि देश और क्रांति की रक्षा के लिए सशस्त्र बलों को बनाए रखना जरूरी है।

ज़ारेई ने याद दिलाया कि युद्ध शुरू होने से पहले देश के कुछ इलाकों में सशस्त्र गुटों और सरकार विरोधी समूहों से मुकाबला जारी था। देश की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए सैनिकों और क्रांतिकारी ताकतों को कई तरह की चुनौतियों और खतरों का सामना करना पड़ा।

उन्होंने दुश्मन की घुसपैठ के मुद्दे के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि दुश्मन हमेशा अलग-अलग रास्तों से देश की व्यवस्थाओं में घुसपैठ करने की कोशिश करता रहा है। कभी-कभी कोई ऐसी बात या विचार ऐसे लोगों की जुबान से सामने आ सकता है, जिनके पीछे की असली वजह और उद्देश्य लोगों के लिए स्पष्ट न हो। इसलिए दुश्मन की योजनाओं को समझना और सही समझ व जागरूकता बनाए रखना बेहद ज़रूरी है।

Read 1 times