बहरैन में कड़े सुरक्षा इंतज़ामों और सरकारी धमकियों के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स.अ.) की शहादत के सिलसिले में अज़ादारी के जुलूस निकाले गए। इन जुलूसों में लोगों ने अहले-बैत अ.स.की शिक्षाओं और धार्मिक परंपराओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। कठिन सुरक्षा परिस्थितियों के बावजूद अय्याम-ए-फ़ातिमिया के अवसर पर आयोजित इन कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी ने धार्मिक रस्मों के प्रति उनकी आस्था को प्रदर्शित किया।
बहरौन में कड़े सुरक्षा इंतज़ामों और सरकारी धमकियों के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में हज़रत फ़ातिमा ज़हेरा (स.अ.) की शहादत के सिलसिले में अज़ादारी के जुलूस निकाले गए। इन जुलूसों में लोगों ने अहले-बैत अ.स. की शिक्षाओं और धार्मिक परंपराओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।
बहरीन के विभिन्न इलाकों, विशेष रूप से अल-बदीअ हाईवे पर सुरक्षा कड़ी किए जाने के बावजूद अज़ादारी के जुलूस आयोजित किए गए। लोगों ने सुरक्षा प्रतिबंधों और लगातार मिल रही धमकियों के बावजूद अहले-बैत (अ.स.) की याद में मजलिसों और अज़ादारी का सिलसिला जारी रखा।
दूसरी ओर, 8 नवंबर को ‘यौम-ए-ग़ज़ब’ मनाने की अपीलों के साथ बहरीन में विरोध-प्रदर्शनों की गतिविधियों में भी तेज़ी देखी जा रही है। इस सिलसिले में समाहीज, सितरा और जेनूसान सहित विभिन्न शहरों की दीवारों पर क्रांतिकारी नारे लिखे गए। साथ ही, आले ख़लीफ़ा सरकार की जेलों में बंद राजनीतिक कार्यकर्ताओं के प्रति एकजुटता व्यक्त करने वाले संदेश भी लिखे गए।
इसी तरह, अल-नुवैदरात शहर के शहीदों की तस्वीरों वाला एक बड़ा बैनर अज़ादारी के जुलूस के रास्ते में लगाया गया। वहीं, अल-मरख शहर की सड़कों पर हमद बिन ईसा आले ख़लीफ़ा का नाम भी लिखा गया।
एक रिपोर्ट के अनुसार, इन गतिविधियों के माध्यम से बहरीन में जन-विरोध और राजनीतिक कैदियों के प्रति एकजुटता व्यक्त करने का सिलसिला जारी है।












