हरम ए हज़रत मासूमा स.अ. के वक्ता हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मीर शिफ़ीई ने मुसलमानों के लिए हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) की शिक्षाओं और विचारों से परिचित होने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि ख़ुत्बा-ए-फ़दकिया का अध्ययन और उसकी व्याख्या बेहद ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि हज़रत ज़हरा (स.अ.) की शख्सियत का परिचय केवल उनके फ़ज़ाइल और गुणों के बयान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके विचारों, तर्कों और ऐतिहासिक मौक़िफ़ को भी मुसलमानों के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि अहलेबैत अ.स. की सीरत को सही ढंग से समझा जा सके।
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मीर शिफ़ई ने पवित्र हरम के इमाम ख़ुमैनी हॉल में अपने संबोधन के दौरान क़ुरआने करीम की शिक्षा और व्याख्या में पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि क़ुरआन को सही ढंग से समझने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम स.अ.व.की सुन्नत और सीरत की ओर रुजू करना आवश्यक है।
पैग़म्बर की ज़िम्मेदारी केवल आयतों की तिलावत करना नहीं थी, बल्कि लोगों को क़ुरआन की शिक्षा देना, उसकी व्याख्या करना और उसके अर्थों को स्पष्ट करना भी उनकी ज़िम्मेदारी में शामिल था।
उन्होंने आयत «وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ» का हवाला देते हुए कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) ने अपनी पूरी रिसालत के दौरान आयतों की तिलावत के साथ-साथ क़ुरआन के अहकाम और शिक्षाओं को भी लोगों के सामने स्पष्ट किया। उन्होंने लोगों को बताया कि अल्लाह की आयतों का वास्तविक उद्देश्य और अर्थ क्या है। इसलिए यह कहना कि हमारे लिए केवल अल्लाह की किताब काफ़ी है और पैग़म्बर की व्याख्याओं की आवश्यकता नहीं, पैग़म्बर की क़ुरआनी ज़िम्मेदारी के विपरीत है।
हुज्जतुल इस्लाम मीर शिफ़ीई ने कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) केवल आयतों की व्याख्या ही नहीं करते थे, बल्कि कई अवसरों पर उनके वास्तविक उदाहरण और मिस्दाक़ भी लोगों के सामने पेश करते थे, ताकि अहलेबैत (अ.स.) का स्थान और उनके प्रति उम्मत की ज़िम्मेदारी स्पष्ट हो सके। उन्होंने घटना-ए-ग़दीर का उल्लेख करते हुए कहा कि पैग़म्बर ने मौला अली (अ.स.) का परिचय कराकर आयत-ए-तब्लीग़ के संदेश को व्यवहारिक रूप से स्पष्ट किया और फ़रमाया:
«مَنْ كُنْتُ مَوْلَاهُ فَهَذَا عَلِیٌّ مَوْلَاهُ»
जिसका मैं मौला हूं, उसके ये अली मौला हैं।
उन्होंने अहलेबैत (अ.स.) के परिचय के संबंध में आयत-ए-ततहीर का उल्लेख करते हुए कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) जब भी अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) के घर के सामने से गुज़रते, तो आयत-ए-ततहीर की तिलावत करते थे।
इस तरह अपने अमल के ज़रिए मुसलमानों को बताते थे कि इस आयत में अहलेबैत से कौन लोग मुराद हैं। इसी तरह घटना-ए-मुबाहिला में हज़रत अली (अ.स.), हज़रत फ़ातिमा (स.अ.), इमाम हसन (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) को अपने साथ ले जाना भी क़ुरआनी आयतों की व्यवहारिक व्याख्या का एक उदाहरण था।
पवित्र हरम के वक्ता ने आगे आयत-ए-विलायत का उल्लेख करते हुए कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) को आयत «إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا» का मिस्दाक़ बताकर उनकी विलायत और स्थान को लोगों के सामने स्पष्ट किया।
इसी तरह हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) के घर को उन घरों में शामिल बताया, जिनके बारे में अल्लाह ने आदेश दिया है कि उनमें उसका नाम बुलंद किया जाए। पैग़म्बर (स.अ.व.) ने अपनी ज़िंदगी के अंतिम दिनों में भी इस घर के सम्मान और स्थान पर विशेष ज़ोर दिया।
उन्होंने हज़रत फ़ातिमा ज़हेरा (स.अ.) के एक ख़ुत्बे का हवाला देते हुए कहा कि पैग़म्बर (स.अ.व.) ने अपनी ज़िंदगी के अंतिम दिनों में लोगों को एक बार फिर क़ुरआन और अपने अहलेबैत की पैरवी की वसीयत की थी। उन्होंने हज़रत अली (अ.स.) का हाथ पकड़कर इस बात पर ज़ोर दिया कि आप क़ुरआन के साथ हैं और क़ुरआन आप के साथ है। यह वसीयत स्पष्ट करती है कि क़ुरआन को अहलेबैत (अ.स.) से अलग नहीं किया जा सकता और धार्मिक शिक्षाओं को समझने के लिए दोनों को एक साथ देखना आवश्यक है।
हुज्जतुल इस्लाम मीरशिफ़ई ने अपने संबोधन के एक अन्य हिस्से में ख़ुत्बा-ए-फ़दकिया को हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) के विचारों, मौक़िफ़ और तर्कों को समझने का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज़ बताया। उन्होंने कहा कि इस ख़ुत्बे के एक हिस्से में हज़रत ज़हरा (स.अ.) ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) के निधन के बाद पैदा हुई परिस्थितियों और रास्ते में आए बदलावों के संबंध में क़ुरआन की आयतों से तर्क पेश किए।
आपने सवाल उठाया कि क्या लोगों ने अल्लाह का यह फ़रमान नहीं सुना कि पैदा करना और चयन करना उसी के अधिकार में है? आपने विरासत और अल्लाह के निर्धारित अहकाम का उल्लेख करते हुए उस समय के व्यवहार को क़ुरआन की कसौटी पर परखा और पैग़म्बर (स.अ.व.) की वसीयतों को नज़रअंदाज़ किए जाने पर आलोचना की।
अंत में उन्होंने दोहराया कि मुसलमानों को हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) की शिक्षाओं और विचारों से परिचित कराने के लिए ख़ुत्बा-ए-फ़दकिया का अध्ययन और उसकी व्याख्या अत्यंत आवश्यक है। हज़रत ज़हरा (स.अ.) की शख्सियत को केवल उनके फ़ज़ाइल बयान करके नहीं समझा जा सकता, बल्कि उनके भाषणों, क़ुरआनी तर्कों और ऐतिहासिक मौक़िफ़ को भी समाज के सामने लाना होगा। इससे अहलेबैत (अ.स.) की सीरत और उनकी शिक्षाओं की गहरी समझ विकसित होगी।













