श्रीमति करमी ने इमाम हसन अस्करी (अ) की एक हदीस का उल्लेख करते हुए इमाम के कथन के अनुसार मोमिन और शिया की पांच निशानियां बताईं।
सावा स्थित विशेष धार्मिक मदरसा रैहानतुर्रसूल (स) की प्रमुख ख़ानम नजीबा खातून करमी ने इमाम हसन अस्करी (अ) की विलादत पर बधाई देते हुए अराक में हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के संवाददाता से बातचीत में इस महान इमाम की एक हदीस की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि इमाम हसन अस्करी (अ) ने फरमाया:
“मोमिन की पांच निशानियां हैं: पचास रकअत नमाज़, ज़ियारत-ए-अरबईन, दाहिने हाथ में अंगूठी पहनना, माथे को मिट्टी पर रखना और बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम को ऊंची आवाज़ में पढ़ना।”
करमी ने कहा कि पचास रकअत नमाज़ से मुराद रोज़ाना की 17 रकअत फ़र्ज़ नमाज़ के साथ नाफ़िला नमाज़ें हैं। नाफ़िला नमाज़ें फ़र्ज़ नमाज़ में होने वाली कमी और कमजोरी की भरपाई करती हैं। खास तौर पर रात के आखिरी हिस्से में पढ़ी जाने वाली नमाज़ यानी नमाज़-ए-शब बहुत लाभदायक है।
उन्होंने कहा कि इस तरह 51 रकअत नमाज़ पढ़ना शिया मुसलमानों की विशेष पहचान और पैगंबर (स) के मेराज की देन है।
सावे के विशेष धार्मिक मदरसा रैहानतुर्रसूल की प्रमुख ने कहा कि नमाज़ को “मोमिन का मेराज” कहने का कारण शायद यह है कि इसका आदेश मेराज के अवसर पर आया और नमाज़ इंसान को भी आध्यात्मिक रूप से मेराज तक पहुंचाती है।
करमी ने कहा कि हदीस में बताई गई दूसरी निशानियां भी शिया मुसलमानों की विशेष पहचान हैं। क्योंकि केवल शिया मिट्टी पर सजदा करने को महत्व देते हैं। इसी तरह गैर-शिया या तो “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम” नहीं पढ़ते या उसे धीमी आवाज़ में पढ़ते हैं।
उन्होंने कहा कि दाहिने हाथ में अंगूठी पहनना और इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत-ए-अरबईन को मुस्तहब मानना भी शिया मुसलमानों की विशेष पहचान है।
उन्होंने आगे कहा कि ज़ियारत-ए-अरबईन से मतलब चालीस मोमिनों की ज़ियारत करना नहीं है, क्योंकि यह बात केवल शिया मुसलमानों तक सीमित नहीं है। ज़ियारत-ए-अरबईन का महत्व केवल इस वजह से नहीं है कि यह ईमान की निशानियों में से एक है, बल्कि इस हदीस के अनुसार इसे फ़र्ज़ और मुस्तहब नमाज़ों के साथ महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
अंत में करमी ने कहा कि जिस तरह नमाज़ दीन और शरीअत का स्तंभ है, उसी तरह ज़ियारत-ए-अरबईन और कर्बला की घटना भी विलायत का स्तंभ है।













