अंसारुल्लाह की प्रगति: प्रतिरोधी मोर्चे का करिश्मा और ईरान की सफलताओं का ततिम्मा

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अंसारुल्लाह की प्रगति: प्रतिरोधी मोर्चे का करिश्मा और ईरान की सफलताओं का ततिम्मा

यमन में अंसारुल्लाह की हाल की रणनीतिक प्रगति को केवल एक आंतरिक युद्ध में मिली सैन्य सफलता के रूप में देखना, इसके कई महत्वपूर्ण पहलुओं की अंदेखी करने के बराबर होगा। अल-मुखा, जुबाब, हनीश द्वीप और मयून द्वीप जैसे क्षेत्रों पर नियंत्रण या प्रभावी मौजूदगी ने यमन के पश्चिमी तट को एक ऐसे भू-राजनीतिक क्षेत्र में बदल दिया है, जहां आंतरिक युद्ध के प्रभाव लाल सागर, अदन की खाड़ी, पूर्वी अफ्रीका और समुद्री यातायात, ऊर्जा तथा वैश्विक व्यापार तक पहुंच सकते हैं।

खास तौर पर मयून द्वीप का महत्व बहुत अधिक है, क्योंकि यह बाब अल-मंदब के पास स्थित है और इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर नियंत्रण के लिहाज से इसकी बड़ी भूमिका है। बाब अल-मंदब केवल एक समुद्री मार्ग नहीं है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण जीवनरेखाओं में से एक है। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी और अप्रत्यक्ष रूप से हिंद महासागर से जोड़ता है। इसी तरह इसके उत्तर में स्थित स्वेज नहर यूरोप और एशिया के बीच समुद्री व्यापार के लिए सबसे छोटे रास्तों में से एक उपलब्ध कराती है।

इसलिए इस क्षेत्र में किसी ऐसी ताकत की मजबूत मौजूदगी, जो समुद्री यातायात को प्रभावित करने की क्षमता रखती हो, उसे केवल एक क्षेत्रीय पक्ष नहीं रहने देती, बल्कि उसे वैश्विक स्तर का प्रभावशाली पक्ष बना देती है। इस संदर्भ में यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि अतीत में लाल सागर में अंसारुल्लाह की कार्रवाइयों के कारण बड़ी संख्या में जहाजों को लंबा समुद्री रास्ता अपनाना पड़ा था।

यहीं से अंसारुल्लाह की हाल की प्रगति का वास्तविक भू-राजनीतिक महत्व सामने आता है। यमन के पश्चिमी तट और बाब अल-मंदब के आसपास अपनी स्थिति मजबूत करके अंसारुल्लाह ने ऐसी रणनीतिक गहराई हासिल कर ली है, जिसके माध्यम से वह केवल यमन के युद्धक्षेत्र में ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के समुद्री और राजनीतिक संतुलन में भी प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है।

इस बदलाव पर सऊदी अरब की प्रतिक्रिया शायद इसकी अहमियत का सबसे स्पष्ट प्रमाण है। मोहम्मद बिन सलमान ने एक से अधिक बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से संपर्क करके उनसे अंसारुल्लाह के खिलाफ सीधे कार्रवाई करने का अनुरोध किया, लेकिन ट्रंप ने अंसारुल्लाह के साथ सीधे सैन्य टकराव से बचने का फैसला किया है। इसे कोई सामान्य फैसला नहीं माना जा सकता।

अमेरिका अच्छी तरह जानता है कि सीधे एक नया मोर्चा खोलने से संकट का दायरा यमन से बहुत आगे तक फैल सकता है, क्योंकि ईरान के साथ युद्ध में उसे लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके बावजूद वॉशिंगटन ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए अपने लगभग 100 और कुछ रिपोर्टों के अनुसार 200 सैन्य विशेषज्ञों को इस युद्ध में मदद के लिए सऊदी अरब भेज दिया है।

इसका मतलब साफ है कि अमेरिका अंसारुल्लाह के खतरे को इतना गंभीर मानता है कि वह सऊदी अरब को अकेला छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। हालांकि, वह ऐसी लड़ाई में सीधे उतरने के लिए भी तैयार नहीं है, जिसके नुकसान उसके शुरुआती अनुमान से कहीं अधिक हो सकते हैं।

इन बातों को ध्यान में रखते हुए अंसारुल्लाह की वास्तविक ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। जिस आंदोलन को वर्षों तक घेराबंदी में रखा गया और जिसे सैन्य तथा आर्थिक दबाव के जरिए पूरी तरह मैदान से बाहर करने की योजना बनाई गई थी, उसने आज रियाद को वॉशिंगटन के सामने मदद मांगने के लिए मजबूर कर दिया है।

स्थिति में यह बदलाव अपने आप में बहुत रणनीतिक महत्व रखता है। इससे पता चलता है कि अंसारुल्लाह अब ऐसा पक्ष नहीं है जिसके बारे में दूसरे लोग फैसले करते हैं, बल्कि वह खुद ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है कि दूसरे पक्षों को उसके व्यवहार और फैसलों को ध्यान में रखकर अपने फैसले करने पड़ते हैं।

इसी संदर्भ में प्रतिरोधी मोर्चे की अवधारणा भी अधिक स्पष्ट होती है। इस मोर्चे की मूल रणनीति केवल एक संयुक्त सैन्य मोर्चा बनाना नहीं है, बल्कि क्षेत्र के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों को एक-दूसरे से जुड़ी ऐसी रणनीतिक गहराई में बदलना है, जिससे विरोधी पर एक साथ कई मोर्चों का दबाव बनाया जा सके।

ईरान, यमन, लेबनान, इराक और फिलिस्तीन के बीच भले ही भौगोलिक दूरी हो, लेकिन प्रतिरोध की विचारधारा उन्हें एक साझा राजनीतिक और वैचारिक सोच से जोड़ती है। इस व्यापक विचार में अंसारुल्लाह की ताकत यमन को केवल एक देश नहीं रहने देती, बल्कि उसे लाल सागर के दक्षिणी द्वार पर प्रतिरोध के एक महत्वपूर्ण रणनीतिक केंद्र में बदल देती है।

अमेरिका के लिए यह स्थिति इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि पश्चिमी एशिया में वॉशिंगटन की ताकत का एक महत्वपूर्ण आधार स्वतंत्र समुद्री यातायात, ऊर्जा की आपूर्ति और अपने सहयोगियों तक तेजी से पहुंच है। बाब अल-मंदब में प्रतिरोधी मोर्चे की बढ़ती क्षमता अमेरिकी समुद्री रणनीति के लिए एक अतिरिक्त चुनौती पैदा करती है, खास तौर पर ऐसे समय में जब फारस की खाड़ी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य पहले से ही गंभीर भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र बने हुए हैं।

अगर बाब अल-मंदब और होर्मुज़ दोनों पर एक साथ दबाव बनता है, तो ऊर्जा और वैश्विक व्यापार के लिए खतरे कहीं अधिक व्यापक हो सकते हैं।

इजरायल के लिए यह मामला और भी संवेदनशील है। लाल सागर एशिया और पूर्वी अफ्रीका की दिशा में इजरायल के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। गाजा संकट के दौरान अंसारुल्लाह ने पहले भी कई महीनों तक लाल सागर में इजरायल से आने या इजरायल जाने वाले जहाजों की आवाजाही पर रोक लगाई थी।

इस तरह यमन का मोर्चा इजरायल के लिए केवल एक दूर स्थित युद्धक्षेत्र नहीं रह गया है, बल्कि उसके समुद्री संपर्क, समुद्री व्यापार, क्षेत्रीय पहुंच और संभावित घेराबंदी जैसी स्थिति से जुड़ा हुआ मुद्दा बन चुका है।

अंसारुल्लाह की ताकत को केवल मिसाइलों, ड्रोन या उसके भौगोलिक स्थान तक सीमित करना इस पूरी तस्वीर के एक बड़े हिस्से को नजरअंदाज करना होगा। इस आंदोलन की वास्तविक ताकत उस प्रतिरोध की सोच में है, जिसके तहत लंबे युद्ध, घेराबंदी, आर्थिक दबाव और लगातार सैन्य खतरों को प्रतिरोध खत्म होने का कारण नहीं, बल्कि उसके संकल्प और दृढ़ता की परीक्षा माना जाता है।

यही सोच यमन के सीमित संसाधनों वाले एक पक्ष को वर्षों के युद्ध के बावजूद अपना राजनीतिक और सैन्य ढांचा बनाए रखने में मदद करती रही है। इस दृढ़ता के पीछे अंसारुल्लाह की आस्था और विश्वास की महत्वपूर्ण भूमिका है।

उसके राजनीतिक और धार्मिक विचारों में प्रतिरोध सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि अत्याचार के सामने स्वतंत्रता की रक्षा और फिलिस्तीन के साथ एकजुटता व्यक्त करने का माध्यम है। यही वैचारिक तत्व युद्ध को केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि उसे एक लंबे नैतिक और आस्थागत संघर्ष का रूप देता है।

इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो अंसारुल्लाह के लिए दृढ़ता का मतलब केवल दुश्मन को हराना नहीं, बल्कि दबाव के बावजूद अपने फैसले और अपने इरादे पर कायम रहना भी है। इस तरह अंसारुल्लाह की हाल की प्रगति पश्चिमी एशिया में बदलते शक्ति संतुलन का एक महत्वपूर्ण संकेत है।

अगर आज हुर्मुज़ स्ट्रेट और बाब अल-मंदब की बात की जाए, तो क्षेत्रीय शक्ति के समीकरण में दोनों की निर्णायक भूमिका है। हुर्मुज़ स्ट्रेट में ईरान के पास दबाव बनाने का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साधन है, जबकि अंसारुल्लाह आंदोलन भी बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य में ऐसी स्थिति तक पहुंच चुका है कि इस जलमार्ग के यमनी हिस्से पर उसका प्रभावी नियंत्रण है।

केवल इन दोनों स्थानों से यह स्पष्ट होता है कि क्षेत्र में शक्ति का भौगोलिक केंद्र अरब देशों की राजधानियों, वॉशिंगटन या तेल अवीव में ही तय नहीं होता। प्रतिरोधी मोर्चे के विरोधियों के लिए यमन में होने वाले बदलावों का संदेश स्पष्ट है: प्रतिरोध अब कोई अस्थायी मामला नहीं है, जिसे कुछ हमलों या प्रतिबंधों के जरिए खत्म किया जा सके। बल्कि यह मोर्चा क्षेत्रीय शक्ति संरचना का एक महत्वपूर्ण और स्थायी हिस्सा बन चुका है। इस वास्तविकता को क्षेत्र की राजशाही सरकारें और क्षेत्र से बाहर की ताकतों के साथ मिलकर काम करने वाले देश जितनी जल्दी समझ लें, उतना ही बेहतर होगा।

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