माहे रमज़ान में दुआ करना अल्लाह तआला तक पहुंचाने का बेहतरीन ज़रिया है

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माहे रमज़ान में दुआ करना अल्लाह तआला तक पहुंचाने का बेहतरीन ज़रिया है

हौज़ा ए इल्मिया फातेमा ज़हेरा स.ल की प्रमुख मरयम रिज़वी ने कहां, कि माहे मुबारक रमज़ान में दुआ करना रूहानी बुलंदी का अहम ज़रिया है।

हौज़ा ए इल्मिया फातेमा ज़हेरा स.ल उर्मिया की प्रमुख मरयम रिज़वी ने कहां, माहे रमज़ान की आमद की मुबारकबादी पेश करते हुए इस मुबारक महीने के बुनियादी आमाल की तशरीह की।उन्होंने माहे रमज़ान के तीन अहम मराकिज़ बयान किए:

रोज़ा, तिलावत-ए-क़ुरआन और दुआ।

उनका कहना था कि रोज़ा दिल में नर्मी पैदा करता है और इंसान को इस महीने की फयूज़ात से इस्तिफ़ादा के लिए रूहानी तौर पर तैयार करता है। उन्होंने दूसरे अहम मरकज़ के तौर पर तदब्बुर के साथ क़ुरआन की तिलावत पर ज़ोर दिया।

रिज़वी ने आगे रमज़ान में दुआ की अहमियत बयान करते हुए कहा कि दुआ हर दौर में ताकीद की गई है, ख़ुसूसन माहे मुबारक रमज़ान में जब ख़ुदा से राब्ता क़ायम करने का रूहानी माहौल ज़्यादा फ़राहम होता है।

प्रमुख मदरसा-ए-इल्मिया फ़ातिमा ज़हरा (स) सलमास ने दुआ के तीन अहम मक़ासिद बयान किए:

पहला मक़सद: अपनी आरज़ुओं की दरख़्वास्त।
उन्होंने कहा कि अगर कुछ ख़्वाहिशात पूरी न भी हों, तब भी दुआ करना अपने आप में अज्र का बाइस है। ख़ज़ाना-ए-इलाही नामहदूद है, और इंसान हर बुलंद और तवील आरज़ू ख़ुदा से मांग सकता है।

दूसरा मक़सद: मारिफ़त-ए-इलाही का हुसूल।उन्होंने कहा कि अबू हमज़ा सुमाली की दुआ और मुनाजात-ए-शाबानिया जैसी दुआओं के मज़ामीन में ग़ौर-ओ-फ़िक्र करने से इंसान ख़ुदा की गहरी पहचान हासिल कर सकता है।

तीसरा मक़सद: ख़ुदा पर अपनी इनहिसार और एहतियाज का एहसास:

रिज़वी ने ताक़ीद की कि इंसान हर हाल में ख़ुदा का मोहताज है, और यहाँ दुआ सिर्फ़ वसीला नहीं बल्कि ख़ुद एक मक़सद है। यानी अपनी ज़रूरत और इनकिसारी को बारगाह-ए-इलाही में पेश करना अपने आप में ज़ाती क़दर रखता है।यह रूहानी तक़रीब तलबा की गर्मजोशी भरी शिरकत और क़ुरआन-ए-करीम की जमई तिलावत के साथ जारी रही।

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